श्रद्धा का फल
   Date02-Jul-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
सिख संप्रदाय के चौथे गुरु श्री रामदासजी के अनेक शिष्य थे। सभी की अपनी-अपनी विशेषताएं थीं। उन्हीं शिष्यों में से एक थे-गुरु अर्जुन देव। अर्जुन देव ने गुरु से दीक्षा लेकर आश्रम में प्रवेश किया तो उन्हें बर्तन मांजने का काम सौंपा गया। वे सवेरे से शाम तक बर्तन मांजते या आश्रम के अन्य कार्य करते। अन्य शिष्य धर्मचर्चा और गुरु पूजा में लगे रहते तो भी अर्जुन देव गुरु के आदेशानुसार अपने नियत कर्म में लगे रहते। गुरु के अवसान का समय आया। गुरु अपना घोषणा-पत्र लिखकर गए थे। सभी अपनी बड़ी-बड़ी योग्यताओं के कारण सोचते थे कि उन्हें ही उत्तराधिकारी मिलेगा, परंतु घोषणा-पत्र खुलने पर उसमें अर्जुन देव को उत्तराधिकारी माना गया। सुनने वालों ने आश्चर्य किया कि इस सबसे कम योग्यता वाले व्यक्ति को यह पद कैसे मिला? समाधान करने वालों ने समझाया कि सेवा, श्रद्धा और अनुशासन यही शिष्य की सबसे बड़ी योग्यता है। अर्जुन देव सिख धर्म के पांचवें गुरु हुए और उन्होंने अपनी श्रद्धा के बल पर सिख धर्म की महती सेवा की।