सहकारिता में सामने आया अनुभव का सत
   Date02-Jul-2022

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नीलमेघ चतुर्वेदी
सौवां आईसीए-विश्व सहकारी वर्ष भारतीय सहकारी आंदोलन के सदंर्भ में उपलब्धियां ले आया है। ये हैं, सहकारिता में डीबीटी, पैक्स परिसीमन तथा कम्प्यूटरीकरण, सहकारी नीति लाने की घोषणा, केंद्रीय सहकारी विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा, सहकारी बैंकों में अधिकतम आवास कर्ज सीमा 30 लाख से बढ़ाकर 60 लाख करना। सहकार से समृद्धि की ओर बढ़ते भारतीय सहकारी आंदोलन का नेतृत्व ऐसे व्यक्तित्व के हाथ में है, जो अहमदाबाद जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष पद से सहकारी अनुभव ले, देश के पहले सहकारिता मंत्री बने। सहकारी नेतृत्व अब प्रोफेशनल है। जिस प्रकार भारतीय विदेश नीति का डंका विश्व में बजा, उसी तरह आत्मनिर्भर भारत में अब सहकारी योगदान चमकेगा।
एक समय अहमदाबाद का जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, अमानत संग्रहण के संदर्भ में एशिया में प्रथम आया था। जिस धरती से अमूल अवधारणा संपूर्ण भारत ही नहीं, अपितु आस-पास के देशों में पहुंची, उसी गुजरात ने सहकारिता में भी परचम लहराएं हैं। गुजरात का अनुभवी सत (कांसंट्रेट) अब बोलने लगा है। आजादी के 75 साल बीत गए। सहकारिता को कभी ग्रामीण विकास मंत्रालय तो कभी कृषि मंत्रालय का विभाग बना दिया गया। पृथक मंत्रालय संबंधी मांगों की अनदेखी होती रही। पिछले साल 6 जुलाई को केंद्रीय अधिसूचना के जरिये पृथक केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय का गठन हुआ। इसके बाद वे सभी समस्याओं हल होने की ओर अग्रसर हैं, जिनकी चर्चा ढाई-तीन दशक से हो रही थी। प्राथमिक कृषि सहकारी साख संस्था (पैक्स) की व्यवसाय विकास योजना बनाने संबंधी अनेक समितियों की अनुशंसाएं समय-समय पर सामने आईं। परंतु वांछित लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सका। अब 65 हजार से अधिक पैक्स कम्प्यूटरीकृत होने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में नोडल बिजनेस सर्विस सेंटर के रूप में भी उभरेंगी। सीधे लाभ हंस्तांरण योजना (डीबीटी) से जहां सहकारी हितग्राहियों को आसानी होगी, वहीं सहकारिता का गौरव विस्तारित होगा। अभी तक सरकार की हर योजना को जमीन पर उतारने में सहकारिता का योगदान रहता आया है, किंतु योजनाओं का लाभ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के जरिये ही खातों में आता था। भारत में प्रत्येक रंग की क्रांति में सहकारी योगदान है। भारत ने विश्व सहकारी आंदोलन को इफ्को और अमूल जैसे विश्व सहकारिता के गौरव दिए हैं। यहां आबादी का प्रत्येक छठा व्यक्ति सहकारिता से जुड़ा है। सहकारिता की सतरंगी उपलब्धियों को देख यह स्पष्ट है कि बेहतर विश्व के निर्माण में सहकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण हो चली है। यह इस वर्ष के विश्व सहकारिता दिवस की विषय वस्तु भी है। सहकार से समृद्धि की दिशा में कृषि सहकारिता की बुनियाद पैक्स की मजबूती के प्रयासों का मंगलाचरण हो चुका है। नई सहकारी नीति और सहकारी विश्वविद्यालय की घोषणा की व्यग्रता से इस वर्ष विश्व सहकारी दिवस दिवस कुछ विशेषता लिए है। कारण, इंटरनेशनल को-ऑपरेटिव एलाएंस द्वारा विश्व सहकारी वर्ष समारोह का शताब्दी वर्ष होना। आईसीए की स्थापना तो अगस्त 1895 में हुई। इसका शताब्दी समारोह भी वर्ष 1995 में मेनचेस्टर (ब्रिटेन) में मनाया गया। आईसीए स्थापित हुए 127 वर्ष हो चुके हैं। भारत इसका संस्थापक सदस्य है। आईसीए के नेतृत्व में जुलाई 1923 के प्रथम शनिवार को विश्व सहकारी दिवस मनाने की शुरुआत हुई। दो विश्व युद्धों की विभीषिका झेलने के बाद भी सहकारी दर्शन और भावना का अस्तित्व बना रहा और अभी भी इंंद्रधनुषी आभामंडल के साथ इसकी चमक है। यह चमक सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुम्बकम् की भारतीय अवधारणा की सुदृढ़ता की परिचायक है। शांतिपूर्ण सह अस्तित्व तथा सक्षम के बने रहने के डार्विन के सिद्धांत के बीच द्वंद में सह अस्तित्व की भावना की विजय है। पूंजीवाद और समता समाज की अवधारणा में समता की जीत है। विश्व सहकारी वर्ष तो आईसीए के नेतृत्व में वर्ष 1923 से मनाया जा रहा है, किंतु इस विश्व संस्थान के मेनचेस्टर शताब्दी समारोह में संयुक्त राष्ट्र ने भी संयुक्त राष्ट्र विश्व सहकारी वर्ष मनाने का मंगलाचरण किया। इस गणना से यह 27वां संयुक्त राष्ट्र विश्व सहकारी वर्ष है। वर्ष 2012 में सहकारिता की महिमा को सम्मानित करते हुए हुए संयुक्त राष्ट्र ने 'सहकारी दशकÓ घोषित किया। यह दशक का समापन काल भी है। आईसीए और संयुक्त राष्ट्र दोनों इस लोक आंदोलन के छबि निखार के लिए सजग हैं। साथ ही सजग हैं, विश्व के सहकारी सभासद, सहकारी संस्थाएं और सहकारी कार्मिक। ये सभी मिलजुलकर प्रतिकूल परिस्थितियों में सहकारिता के ध्वज को ऊंचा उठाए हुए हैं। विश्व में साम्यवाद टूटन की ओर है। पूंजीवाद के अपने गुण-दोष हैं। लोक उपक्रम क्षेत्र के चिंतन की अपनी सीमा रेखाएं हैं। ऐसे में सही मायनों में सार्वजनिक क्षेत्र सहकारी क्षेत्र ही है, जिसमें सभी की सहभागिता है। ऐसा क्षेत्र जब विश्व दिवस समारोहण का शताब्दी तिलक करे तो यह गौरव का विषय है। सहकारी दर्शन पर अतीत में जितने आक्रमण हुए, यह उतना ही मुखर और मजबूत होता गया। यही सहकारिता की विशेषता है। इस वर्ष विश्व सहकारी दिवस की विषय वस्तु 'सहकारिता बेहतर विश्व निर्माताÓ है। इसका कारण भी आईने की तरह साफ है। सहकारी प्रणाली अन्य प्रणालियों से कुछ हटकर है। इसके कार्य संचालन के विश्व में सर्वमान्य सिद्धांत हैं। पहचान है। मूल्य हैं। ये सभी इतने पारदर्शी हैं कि सहकारी प्रणाली अपनी अलग पहचान स्थापित कर चुकी है। इसमें निवेश पर सीमित प्रतिफल है। मुनाफे का बड़ा भाग उसी समुदाय और पर्यावरण को समर्पित होता है, जिसमें यह कार्यरत है। सहकारी शेयरों का कारोबार सार्वजनिक और निजी कंपनियों की तरह स्टॉक एक्सचेंज में नहीं होता। एक सभासद या एक प्रत्यायुक्त को एक ही मत देने का प्रावधान है, जबकि कंपनी क्षेत्र में जितने शेयर उतने ही मत। इस प्रकार सहकारिता सही अर्थों में लोकतांत्रिक प्रणाली है। के बीच स्पष्ट पहचान है।
भारत में पहली मर्तबा पृथक मंत्रालय-इस विश्व सहकारी दिवस पर भारत में हो रहे सहकारी परिवर्तनों की समीक्षा सामयिक है। भारत विश्व सहकारी आंदोलन का सबसे बड़ा और विविधिकृत सदस्य है। देश की स्वाधीनता को 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। स्वाधीन भारत का अमृत उत्सव मनाया जा रहा हैै। इस दौरान 6 जुलाई 2021 का दिन भारतीय सहकारी आंदोलन के लिए ऐतिहासिक दिवस बना। केंद्र सरकार ने पृथक से सहकारिता मंत्रालय गठन की घोषणा की और केंद्रीय गृहमंंत्री अमित शाह को देश का प्रथम सहकारिता मंत्री मनोनीत किया। तब तक सहकारिता भारी भरकम कृषि मंत्रालय का मात्र एक विभाग था। केंद्र का यह निर्णय भारतीय सहकारिता आंदोलन की सफलता का परिचायक है। इसी के साथ नव मनोनीत केंद्रीय सहकारिता मंत्री ने कृषि सहकारी आंदोलन की बुनियाद प्राथमिक कृषि सहकारी साख संस्थाओं की सुध ली। इनके परिसीमन, पैक्स को अन्नादाता किसान के निवास समीप पहुंचाने, कम्प्यूटरीकरण और अन्य बदलावों की घोषणा की। साथ ही एक क्रांतिकारी घोषणा राष्ट्रीय सहकारी नीति प्रभावशील करने संबंधी की गई। इसी के तहत राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की गई। ये सभी मांगे लंबे समय समय से अनदेखी की शिकार थीं। सबसे ताजा घोषणा सहकारिताओं को भी प्रत्यक्ष लाभ (डीबीटी) हस्तांतरण से जोडऩे की है। केंद्र सरकार के 52 मंत्रालय द्वारा संचालित 300 से अधिक योजनाओं के फायदे सीधे लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) द्वारा हितग्राहियों तक पहुंचाए जा रहे हैं। यदि सहकारी प्रणाली के जरिये ऐसा होता है तो सहकार से समृद्धि की अवधारणा अधिक तीव्रता के साथ आत्मनिर्भर भारत के निर्धारित लक्ष्य की ओर बढ़ेगी।
सहकारी विश्वविद्यालय-सहकारी विश्वविद्यालय के लिए तो संस्थागत सहयोग राशि का एक बड़ा भाग लगभग 15 वर्ष पहले एकत्रित किया जा चुका है। पर सहकारिता की सुध सरकारों ने नहीं ली। ऊर्जा विवि, रेलवे, फोरेंसिंक, चिकित्सा, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों के लिए विवि प्रारंभ किए गए, किंतु मानित (डिम्ड) सहकारी विवि यानी वैकुंठ भाई मेहता (वेम्निकाम) राष्ट्रीय सहकारी प्रबंध संस्थान को विवि में प्रोन्नात करने की सुध नहीं ली गई। अब सहकारिता का समय बदला है। रहिमन चुपवै बैठि के देख दिनन को फेर, जब नीके दिन आएंगे, तनिक न लागै देर।
मध्यप्रदेश की सहकारी नीति अंतिम दौर में -यह बात साफ है कि सहकारिता के दिन भी पलटने लगे हैं। केंद्र का अनुसरण कर मध्यप्रदेश सरकार ने राज्य की सहकारी नीति का प्रारूप तैयार किया। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने इसे केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह को भेंट किया। अब शीघ्र ही मध्यप्रदेश की सहकारी नीति भी घोषित होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सहकारिता मामलों के विशेषज्ञ हैं)