जल संरचना की अनिवार्य आवश्यकता
   Date02-Jul-2022

dharmdhara
धर्मधारा
वर्षा के प्रारंभ होने की खबर लोगों को भीषण गर्मी के प्रकोप से राहत देने वाली होती है व साथ में वर्षा जल संचयन की ओर ध्यान भी आकर्षित करती है। देशभर में व्याप्त भयंकर जल संकट की स्थिति से उबरने के लिए वर्षा के जल की बूंद-बूंद को बचाने का समय आ चुका है। दरअसल, पहले गांवों में वर्षा का जल संचयन परंपरा का एक अभिन्न अंग हुआ करता था। लोग पानी की बर्बादी को पाप समझते थे, लेकिन तीव्र गति से हो रहे नगरीकरण की चपेट में गांवों के आने के कारण वर्षा के जल संचयन की प्रवृत्ति भी अब हवा में उड़ती नजर आने लगी है। गौरतलब है कि दुनिया के सर्वाधिक बारिश होने वाले क्षेत्रों में भारत भी है, यहां हर वर्ष बर्फ पिघलने और वर्षा जल के रूप में औसतन 4000 अरब घनमीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि यह देश वर्षा जल के 1869 अरब घनमीटर (मतलब सिर्फ 46 प्रतिशत) पानी का उपयोग कर पाता है। बाकी 54 प्रतिशत पानी व्यर्थ में बहकर नदी-नालों के द्वारा समुद्र में चला जाता है। मणिपुर से भी छोटे इजराइल जैसे देशों में जहां वर्षा का औसत 25 सेमी से भी कम है, वहां भी जीवन चल रहा है। वहां जल प्रबंधन तकनीक अति विकसित होकर जल की कमी का आभास नहीं होने देती, अपितु कृषि से कई बहुमूल्य उत्पादों का निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है, तो यह कार्य भारत क्यों नहीं कर सकता? बारिश के पानी को विभिन्न ोतों व प्रकल्पों में सुरक्षित व संग्रहित रखना व करना वर्षा जल संचयन कहलाता है। वर्षा जल संचयन वर्षा जल के भंडारण को संदर्भित करता है, ताकि जरूरत पडऩे पर बाद में इसका उपयोग किया जा सके। इस तरह व्यापक जलराशि को एकत्रित करके पानी की किल्लत को कम किया जा सकता है। भारत में पेयजल संकट एक प्रमुख समस्या है। भूमिगत जल का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और इस वजह से पीने के पानी की कमी बढ़ रही है। सिकुड़ती हरित पट्टी इसका मुख्य कारण है।