महाराष्ट्र को नया सियासी आयाम...
   Date01-Jul-2022

vishesh lekh
महाराष्ट्र में सत्ता के लिए चल रही खींचतान राजनीतिक मैदान से निकलकर अदालत की परिधि में आकर एक नए दौर में प्रवेश कर गई... उसी का नतीजा रहा कि महा विकास अघाड़ी सरकार के नेता शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को बहुमत परीक्षण से बचने की राहत नहीं मिली और अंतत: बुधवार रात्रि को उन्हें बहुमत परीक्षण के पूर्व ही इस्तीफा देना पड़ा... यह शिवसेना से बगावत करने वाले एकनाथ शिंदे गुट के लिए बड़ी जीत रही... लेकिन यह भाजपा के लिए भी राजनीतिक रणनीति के मान से एक बड़ी जीत माना जा सकता है... क्योंकि भाजपा ने बिना कोई हस्तक्षेप किए एक तीर से महाराष्ट्र में कई निशाने साधकर भाजपा को न केवल सत्ता में लाने सफलता में पाई है, बल्कि कांग्रेस-राकांपा के साथ शिवसेना को भी एक तगड़ा झटका दिया है... इस राजनीतिक उलटफेर का पूरे महाराष्ट्र में ही नहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव के मान से भी व्यापक असर होने वाला है... क्योंकि भाजपा ने अब अपने पत्ते खोलते हुए न केवल शिवसेना को बल्कि शिवसेना से बगावत कर चुके धड़े को सरकार का सर्वेसर्वा बनाकर न केवल कांग्रेस की राजनीतिक जमीन खत्म करने की योजना बना ली है, बल्कि शिवसेना भी एक परिवार के दायरे से मुक्त होकर भाजपा की विचारधारा के साथ आगे बढऩे को मजबूर होगी... यानी आने वाले समय में महाराष्ट्र में भाजपा और राकांपा के बीच ही मुख्य मुकाबला होगा... शिवसेना के बागी भाजपा के मुख्य सहयोगी की भूमिका में ही नजर आएंगे... एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद देकर भाजपा ने न केवल मुंबई में बल्कि पूरे महाराष्ट्र में एक बेहतर संदेश देने का प्रयास किया है... और उससे भी बढ़कर भाजपा ने मुख्यमंत्री रहे देवेन्द्र फडऩवीस को एकनाथ शिंदे के सहयोग के लिए उपमुख्यमंत्री बनाकर वे सारे सत्ता समीकरण भी साध लिए है, जिनसे आने वाले समय में ढाई साल तक सफल सरकार संचालन में कोई समस्या नहीं आना है... इस पूरे राजनीतिक पटकथा के रूप में मोदी-शाह और नड्डा की त्रिमूर्ति को देखा जाता है... लेकिन एकनाथ शिंदे की यह बगावत रणनीति भी महाराष्ट्र में नए राजनीतिक मिथक गढऩे का आधार बना चुकी है... क्योंकि सत्ताधारी गठबंधन महाविकास आघाडी की एक अहम घटक शिवसेना के भीतर हुई बगावत के बाद से यह स्थिति बनी हुई थी कि मौका मिलते ही दोनों पक्ष नया दांव चल रहे थे... हालांकि बुधवार को कोर्ट के फैसले के पूर्व तक ऐसी तस्वीर उभर कर सामने नहीं आई है कि भविष्य में राज्य की सत्ता किसके हाथ में रहेगी... लेकिन कोर्ट के फ्लोर टेस्ट के आदेश के बाद सारे समीकरण बागी गुट के साथ ही भाजपा की रणनीति के अनुसार आगे बढ़ते चले गए और शिंदे के मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा के बाद तो भाजपा ने करीब दो सप्ताह से चल रहे इस राजनीतिक उठापटक के घटनाक्रम को नया आयाम दे दिया...
दृष्टिकोण
सामाजिक सुरक्षा की पहल...
संगठित-असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोगों को सामाजिक सुरक्षा के मान से एक ऐसा सुरक्षा आवरण मिलना ही चाहिए, जो उनके जीवन निर्वाह का एक मजबूत आधार बन सके... सेवा क्षेत्र में काम करने वाले अस्थायी कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा को लेकर नीति आयोग की चिंता वाजिब है... आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को सुझाव दिया है कि सेवा क्षेत्र में काम कर रहे लाखों लोगों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए... आयोग की यह पहल महत्त्वपूर्ण इसलिए है कि देश में करोड़ों लोग छोटी-मोटी अस्थायी नौकरियों और काम धंधों में लगे हैं... ऐसे लोगों की आमद भी ज्यादा नहीं है... बड़ी संख्या में लोग दिहाड़ी पर काम कर रहे हैं... काम के घंटे और जोखिम भी कम नहीं हैं और सबसे बड़ी चिंता की बात यह कि इन कामगारों के पास पेंशन, चिकित्सा सुविधा या ऐसी ही अन्य सुविधा के नाम पर किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं है... ऐसे में नियोक्ता इन्हें कभी भी हटा देते हैं... कोई बीमा सुविधा भी नहीं... दुख-बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में कहीं कोई चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती... जरूरत पडऩे पर छुट्टी भी नहीं मिल पाती... जहां मिल जाती है वहां वेतन काट लिया जाता है... नौकरी पक्की नहीं होती, इसलिए पेंशन या ग्रेच्युटी का तो कोई मतलब ही नहीं रह जाता... जाहिर है, ऐसे मुश्किल हालात और असुरक्षा में नौकरी कर पाना आसान नहीं होता... ऐसे में नीति आयोग का ध्यान अगर करोड़ों लोगों के कल्याण पर गया है, तो यह सराहनीय भी है... भारत में ऐसे कामगारों की आबादी तेजी से बढ़ रही है जिनके पास पक्की नौकरी नहीं है... यह हालत सिर्फ सेवा क्षेत्र में ही नहीं, दूसरे क्षेत्रों में भी है... वैसे भी असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग हैं जो बेहद कम पैसे में काम करते हैं और सरकारी कल्याण योजनाओं तक उनकी पहुंच भी नहीं होती...
इसलिए किसी तरह का काम या नौकरी करने वाले की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना एक कल्याणकारी सरकार का उत्तरदायित्व भी है। लेकिन विडंबना यह कि आबादी का बड़ा हिस्सा बिना सामाजिक सुरक्षा के जीने को मजबूर है।
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नीति आयोग ने रिपोर्ट में साफ कहा है कि सेवा क्षेत्र में काम करने वाले अस्थायी कर्मचारियों को बिना पैसा काटे छुट्टी, बीमारी के दौरान छुट्टी, चिकित्सा सुविधा, बीमा और सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले पेंशन और ग्रेच्युटी जैसे लाभ दिए जाने चाहिए। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आयोग ने यह सुझाव ऐसे वक्त में दिया है जब सरकारें आर्थिक बोझ का हवाला देते हुए कर्मचारियों पर किए जाने वाले ऐसे जरूरी खर्चों में न केवल कटौती कर रही हैं, बल्कि इन्हें बंद करने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।
गौरतलब है कि अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का बड़ा योगदान है। पर्यटन और होटल उद्योग जैसे कई दूसरे क्षेत्र भी इससे जुड़े हैं। पिछले कुछ सालों में तो सेवा क्षेत्र का दायरा बढ़ा है। कोरोना महामारी के दौरान दो वर्षों के भीतर रोजगार के नए क्षेत्र भी सामने आए। इनमें सबसे ज्यादा घरों में खाने-पीने की चीजों से लेकर हर तरह के सामान की आपूर्ति करने वाले भी शामिल हैं।
ओला, उबर जैसी कंपनियों ने परिवहन के क्षेत्र में काम जमाया और लाखों लोगों को रोजगार दिया। शहरों में इस तरह का रोजगार ज्यादा बढ़ा है। एक बात यह भी कि इस तरह के रोजगारों में शिक्षित नौजवान भी कम नहीं हैं। नीति आयोग का अनुमान है कि इस दशक के अंत तक देश में ऐसे कामगारों की संख्या ढाई करोड़ तक पहुंच जाएगी। ऐसे में इतनी बड़ी आबादी अगर बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के नौकरी करने को मजबूर होगी, तो यह लोगों को सामाजिक-आर्थिक लिहाज से बड़े जोखिम में धकेलने जैसे होगा।