भावना बिना सब सूना
   Date01-Jul-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
ज्ञा न के बिना धर्म अन्धा, कर्म के बिना लूला-लंगड़ा तथा भक्ति के बिना निष्प्राण होता है। वही व्यक्ति पूर्णतया धार्मिक है, जिसके जीवन में इन तीनों का ही समग्र विकास होता है। महाराजा अज के यहाँ यज्ञायोजन था। एक दिन महर्षि वसिष्ठ जब प्रधान पुरोहित का कार्य-भार संभालने जा रहे थे तो मार्ग में उन्हें एक मंडी नामक व्यक्ति मिला। व्यथित हृदय से वह अपना दुखड़ा रोने लगा - 'देव, मैंने श्रमशीलता में कोई कसर शेष नहीं रखी। मैंने सदा अच्छा आचरण किया है। अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया है। फिर भी मैं अपने में अपूर्णता पाता हूं। मेरा हृदय सूना-सूना है।Ó मुनिवर बोले - 'तात! तुमने कर्म और ज्ञान की तो उपासना की है, किन्तु भाव पक्ष की अपेक्षा की है। यह उसी का परिणाम है कि तुम ऊने तथा सूने हो। अब तुम स्नेह बांटो। बदले में दस गुना पाओंगे। सब जीवधारियों में अपने आत्मा के दर्शन करो। इससे तुम्हारा जीवन व्यापक होगा। तुम्हें आनन्द मिलेगा, संतोष प्राप्त होगा।Ó शीतल वचन सुनकर मण्डी को दिशा मिल गई। वह अर्जित ज्ञान, धन, स्नेह बांटने लगा और उसकी अपूर्णता समाप्त हो गई, वह सच्चा धार्मिक हो गया।