भगवान के नाम का जाप सर्वोपरि उपासना
   Date01-Jul-2022

dharmdhara
धर्मधारा
भ गवान् नाम-जप सर्वोपरि व्रत है, सर्वोपरि उपासना है। सच्चे भाव से किया गया जप सभी परिस्थितियों में, सभी जगह और सभी समय में कल्याणप्रद है। तप शरीर की साधना है तो जप वाणी की उपासना है। जैसे शरीर के संयमन और नियमन के अनेक प्रकार है, उसी प्रकार जप के भी अनेक भेद एवं उपभेद है। ध्वनि के विचार से भगवान के नाम का जपरूपी भेद कीर्तन है, जिसमें व्यक्तिगत रूप में अथवा सामूहिक रूप में राग-लय तथा तालसमन्वित वाद्य स्वरों से स्वर मिलाकर नाम का कीर्तन किया जाता है। भगवान् कहते हैं - 'हे नारद! जहां मेरे भक्त मेरा गान करते हैं, वहां ही मैं उपस्थित रहता हूं।Ó अस्तु, जप में ईष्ट देव को अपने मध्य बुलाने की अद््भुत शक्ति का समावेश रहता है।
युगल दम्पति मनु-शतरूपा की साधना में तप और जप का मणिकांचन संयोग है। एक पैर पर खड़े एवं समीर-आहार लेते हुए उनके रोम-रोम से प्रति श्वास-प्रश्वास पर श्रीहरि का नाम निकल रहा था। वे शरीर से पूर्ण रूप से स्थिर, निश्चल तथा दण्डवत् खड़े हुए थे। उनके मौन, एकाग्र एवं अविरल जप ने परम प्रभु को निज दर्शन देने के लिए विवश कर दिया था। श्रीहरि की अमृतमयी वाणी ने ज्यों ही उनके श्रवणरन्ध्र से हृदय में प्रवेश किया त्यों-ही दोनों तत्काल हष्ट-पुष्ट, पूर्ववत् शरीर-सौष्ठवयुक्त एवं आभा प्रभा से आलोकित हो उठे। जप के इस स्वरूप ने ब्रह्म-दर्शन को सुलभ बना दिया। वरदान के उपलक्ष्य में भगवान् से प्रसन्न होकर उनका पुत्र बनना स्वीकार कर लिया। यह जप तपरूपी व्रतोपासना का ही प्रतिफल था। पंचवर्षीय बालक ध्रुव ने निर्जन वन में प्रभु के नाम का निरंतर जप कर उनका पावन साक्षात्कार प्राप्त किया और आकाशीय नक्षत्रों के मध्य अटल स्थान पाया। भक्त प्रहलाद ने श्रीहरि के नाम का स्वयं जप किया और विश्व में उनका प्रचार-प्रसार भी किया।