सेवा पर मनमानी रुकेगी...
   Date08-Jun-2022

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होटलों और रेस्तरांओं में उपभोक्ताओं से वसूले जाने वाले मनमाने सेवा शुल्क विवाद पर सरकार ने मजबूत कानूनी तंत्र बना कर उसे लागू करवाने का जो फैसला किया है, वह उचित और सराहनीय कदम है... ऐसा इसलिए जरूरी हो गया था क्योंकि यह विवाद लंबे समय से चला आ रहा है और अब तक इस मामले में कोई ऐसा स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं बना जो इस मसले से जुड़े विवादों का समाधान पेश करता हो... पर अब सरकार ने साफ कर दिया है कि होटलों और रेस्तरांओं में उपभोक्ताओं से सेवा शुल्क के नाम पर जो मनमानी रकम वसूली जाती है, वह गैरकानूनी और गलत है... इसलिए अब ऐसा कानूनी ढांचा तैयार किया जाएगा जो सेवा शुल्क और इससे जुड़े विवादों का हल देगा और संबंधित कानूनी प्रावधानों को सख्ती से लागू भी करवाएगा... हालांकि होटल और रेस्तरां संगठन अभी भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि सेवा शुल्क वसूलना गैरकानूनी है... दरअसल, यह विवाद इतना लंबा खिंचना ही नहीं चाहिए था... कायदे से तो जब यह मामला पहली बार सामने आया था, तभी सरकार को इस पर गंभीर रुख अख्तियार करते हुए इसे गैरकानूनी घोषित करना चाहिए था और कड़े निर्देश जारी करने चाहिए थे कि ग्राहकों से सेवा शुल्क न वसूला जाए, वरना ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी... अब भी तो सरकार ने सेवा शुल्क वसूलने को साफ-साफ शब्दों में गैरकानूनी करार दिया... हैरानी की बात यह है कि जब-जब भी यह मामला उठा, सरकार यह तो कहती रही कि सेवा शुल्क वसूलने का कोई कानूनी आधार नहीं है, लेकिन उसने कभी इसे खारिज भी नहीं किया... ऐसे में न केवल भ्रम की स्थिति बनी रही, बल्कि होटल और रेस्तरां मालिकों को भी शह मिलती रही और वे ग्राहकों से सेवा शुल्क के नाम पर खासा पैसा वसूलते रहे... पर सेवा शुल्क वसूलने वाले होटलों और रेस्तरांओं पर कभी कोई ऐसी कार्रवाई की पहल नहीं हुई जिससे यह अवैध वसूली रुक पाती... इसलिए अब उम्मीद की जानी चाहिए कि उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय जल्द नया कानूनी तंत्र तैयार कर इस समस्या से निपटेगा... भारत में पिछले दो दशकों में होटल और रेस्तरां उद्योग तेजी से बढ़ा है... खासतौर से शहरी संस्कृति में बाहर खाना खाने और मंगाने का चलन भी तेजी से बढ़ा है। देश में पांच लाख से ज्यादा रेस्तरां हैं जो अपने-अपने संगठनों से जुड़े हैं। इससे यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि होटलों में खानपान के लिए जाने वालों को किस तरह से लूटा जा रहा है... होटलों-रेस्तरांओं में दरअसल जो भुगतान किया जाता है, उसमें उत्पाद का मूल्य और सरकार की ओर लगाए गए वैट और केंद्रीय शुल्क ही होते हैं, जो कानूनी रूप से वैध हैं... इसमें सेवा शुल्क कहीं नहीं है...
दृष्टिकोण
वृक्षों की सेहत का सवाल...
हरित दिल्ली का नारा बहुत पुराना है... यहां के प्राधिकरणों को इस बात पर नाज भी है कि यहां के हरे-भरे पेड़ दिल्ली की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं... मगर इस हफ्ते सौ की रप्तार से हवा क्या चली कि इसने इन पेड़ों की सेहत का पर्दाफाश कर दिया... उस तूफान में जितने पेड़ गिरे, शायद उतने एक दिन में कभी नहीं गिरे होंगे... अब नगर निगम को चिंता सताने लगी है कि जिन पेड़ों को उसने विरासत का दर्जा दे रखा है, वे भी नष्ट हो जाएंगे... पिछले सात सालों में करीब तीन सौ विरासत वाले वृक्ष इसी तरह जमींदोज हो चुके हैं... इसलिए अब एक बार फिर विचार होने लगा है कि इन पेड़ों की सेहत कैसे सुधारी जाए... पेड़ों के गिरने, उखडऩे और टूटने की वजहें तलाशी जा रही हैं... हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब दिल्ली के पेड़ों की सेहत को लेकर मंथन शुरू हुआ है... करीब सात-आठ साल पहले इसे लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने नगर निगम को आदेश दिया था कि पेड़ों के चारों ओर कम से कम चार फीट जगह छोडऩा जरूरी है... यानी उनके तने के आसपास पक्की जमीन नहीं होनी चाहिए... तब आनन-फानन पेड़ों के आसपास की पक्की जगह खोद डाली गई थी... मगर फिर वही रवैया दिखने लगा है... आंधी तूफान में मजबूत पेड़ों की शाखें भी टूट जाती हैं... मगर दिल्ली की समस्या केवल तूफान से जुड़ी नहीं है... यहां सामान्य से जरा तेज हवा चलने पर भी पेड़ टूट जाते हैं... शहरी क्षेत्रों में पेड़ों का गिरना बड़े हादसों और नुकसान का सबब बनता है... इस तरह पेड़ गिरने से दिल्ली में हर साल अनेक गाडिय़ां टूट जाती हैं, तो कई इमारतों को नुकसान पहुंचता है... कई बार लोग भी घायल हो जाते या जान तक गंवा बैठते हैं... इसलिए पेड़ों का गिरना न केवल पर्यावरण की दृष्टि से, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी बड़ी चुनौती है...