खालिस्तान के झंडाबरदार सिमरनजीत सिंह मान
   Date30-Jun-2022

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डॉ.ब्रह्मदीप अलूने
पृ थकतावाद और अतिवाद के समर्थक देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था का एक अहम हिस्सा बनने में सफल हो जाएं तो निश्चित ही यह राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकते। दरअसल पंजाब की संगरूर लोकसभा क्षेत्र से हुए आम चुनावों में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सिमरनजीत सिंह मान की जीत से खालिस्तान की समस्या के फिर से उभरने की समस्या पुन: गहरा गई है। सिमरनजीत सिंह मान पंजाबी अस्मिता को खालिस्तान से जोड़कर सिख अतिवाद को बढ़ावा देते रहे हैं। मान की राजनीति का आधार ही खालिस्तान की बुनियाद पर टिका हुआ है और उन्होंने अपनी जीत पर इसका खुलकर इजहार करते हुए इस जीत को भिंडरावाले की जीत बताया। भिंडरावाले खालिस्तान समर्थक एक ऐसा चरमपंथी था, जिसे ऑपरेशन ब्लू स्टार की कार्रवाई में सेना ने मार गिराया था। सिमरनजीत सिंह मान भिंडरावाले को अपना हीरो मानते हैं। संगरूर लोकसभा उपचुनाव जीतने के बाद जनता का शुक्रिया अदा करते हुए सिमरनजीत सिंह मान ने खालिस्तान का भी जिक्र किया। उन्होंने साफ कहा कि इस जीत का असर विश्वा राजनीति पर पड़ेगा, लोगों का साहस ऊंचा है और वे चुप नहीं बैठेंगे। जाहिर है मान वैश्विक स्तर पर भारत विरोधी उन संस्थाओं को संकेत दे रहे थे, जो पाकिस्तान, ब्रिटेन और कनाडा से खालिस्तान की मुहिम को लगातार हवा दे रही हैं।
यह भी दिलचस्प है कि खालिस्तान की मांग को लेकर पंजाब का आम सिख सहमत नहीं है। खालिस्तानी चाहते हैं कि राजकाज और धार्मिक नेतृत्व ये दोनों काम गुरुद्वारे ही करें, जबकि आम सिख इससे इत्तेफाक नहीं रखते, उनके लिए गुरुद्वारे श्रद्धाभक्ति और आस्था का प्रतीक हैं तथा वे मानते हैं कि राजनीति के लिए धार्मिक स्थल का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इस साल 6 जून को ऑपरेशन ब्लू स्टार के 37वें साल पूरे होने के मौके पर अकाल तख्त साहिब में खालिस्तानियों ने हमेशा की तरह प्रदर्शन किए, इस दौरान उन्होंने खालिस्तान समर्थक बैनर थामकर खालिस्तान हमारा अधिकार जैसे नारे लगाए। दरअसल भारत में तकरीबन तीन करोड़ आबादी सिखों की है और देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की उनकी त्याग और बलिदान की परंपरा का कोई मुकाबला नहीं किया जा सकता। सिख मूलत: पंजाब में रहते हैं और पंजाब की सीमा पाकिस्तान से लगी हुई है। भारत से आमने-सामने की लड़ाई में बुरी तरह मात खाने वाले पाकिस्तान ने भारत से लडऩे के लिए मनोवैज्ञानिक युद्ध का सहारा लिया। इस दौरान पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक ने भारत के खिलाफ अलगाववाद को भड़काने की कोशिशों के तहत् खालिस्तान का मुद्दा उभारा था, जो बाद में हिंसक बन गया था।
पिछले तीन दशकों से पंजाब शांत है, लेकिन खालिस्तान को उभार देने की वैश्विक कोशिशों में कभी कमी नहीं आई। अब सिमरनजीत सिंह मान के तेवर और अकाली दल की अतिवादी राजनीति का असर पंजाब की विविधता पर पड़ सकता है और इसके संकेत भी मिलने लगे हैं। खासकर पंजाब की सत्ता में इस साल आम आदमी पार्टी के आने के बाद वर्ग संघर्ष और खालिस्तान समर्थन की कई घटनाएं लगातार सामने आई हैं। यहां पर सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त के तीखे तेवर भी समस्या को बढ़ाने वाले दिख रहे हैं। अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह सिखों को लायसेंसी हथियार रखने, ख़ालिस्तान का समर्थन करने और सिखों को खुलेआम हथियारों की ट्रेनिंग जैसे विवादास्पद बयान दे चुके हैं। मान के सांसद बनने के बाद खालिस्तानी समर्थकों के हौसले बुलंद होंगे और यह भारत की आंतरिक सुरक्षा की चुनौती को बढ़ा सकता है। खालिस्तान समर्थित आतंकवादी गुट बब्बर खालसा इंटरनेशनल यानी बीकेआई सिख अलगाव को बढ़ावा देने के लिए पूरी दुनिया में प्रभावशील है। इस आतंकी गुट का कनाडा पर गहरा प्रभाव है और वे इस देश में राजनीतिक तौर पर भी ताकतवर माने जाते हैं। यही नहीं, अपने रसूख का इस्तेमाल कर बीकेआई खालिस्तान का समर्थन देने वाली ताकतें को यहां से संचालित भी करती है। उत्तरी अमेरिकी देश कनाडा पृथकतावादी सिख होमलैंड खालिस्तान के समर्थकों के लिए महफूज ठिकाना रहा है। कनाडा में लिबरल पार्टी की सत्ता में देश का रक्षामंत्री हरजीत सज्जन को बनाया जा चुका है। उनके पिता खालिस्तान के कथित समर्थक वल्र्ड सिख ऑर्गेनाइजेशन के सदस्य थे। कनाडा के सिख खालिस्तानी आतंकवादी गुट बब्बर खालसा इंटरनेशनल को 1985 में एयर इंडिया की फ्लाइट 182 कनिष्क में विस्फोट सहित भारत में हुए कुछ बड़े आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। कनिष्क विमान हमले में 329 लोग मारे गए थे। इसके बाद इस संगठन ने पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या समेत कई राजनेताओं और निर्दोष लोगों को निशाना बनाया है। इसके समर्थक उत्तरी अमेरिका, यूरोप, दक्षिण एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक फैले हैं।
कनाडा में हर साल बैैसाखी जैसे मौकों पर आयोजित समारोहों में सिख चरमपंथियों को शहीद का दर्जा देकर उन्हें याद किया जाता है। यहां पर कई आयोजनों में खालिस्तान के नारे लगते हैं। पाकिस्तानी प्रभाव से दिग्भ्रमित खालिस्तान के चरमपंथी दुनियाभर में सिख होमलैंड के पक्ष में प्रदर्शन करते रहे हैं। कनाडा में काम करने वाली पृथकतावादी ताकतें ऐसे प्रयास कर रही हैं कि वे कनाडा में ख़ालिस्तान समर्थन सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र पंजाब के पक्ष में एक जनमत संग्रह कराएं। अगस्त महीने में दुनियाभर में बसने वाला भारतीय समुदाय अपना स्वतंत्रता दिवस उत्साहपूर्ण तरीके से मनाता है, वहीं खालिस्तानी समर्थक इस मौके पर भारत विरोध का झंडा बुलंद करते हैं। खालिस्तान समर्थकों ने इसके पहले 2020 के लिए खालिस्तान के पक्ष में जनमत संग्रह को लेकर एक रैली भी निकाली थी, जिसमें भारत विरोधी नारे लगाए गए थे। लंदन में करीब 60 फीसदी विदेशी मूल के हैं और इन्हें पाकिस्तान गुमराह करता रहा है।
पाकिस्तान खालिस्तान को जिंदा रखने के लिए अपनी जमीन का बेजा इस्तेमाल करने से कभी परहेज नहीं करता। वह विदेशों में रहने वाले खालिस्तानी समर्थकों को भारत विरोध के लिए उकसाने की नीति पर चलता रहा है। लाहौर में सिख अतिवादी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल का सरगना वधवा सिंह बब्बर लम्बे समय तक पाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई की सरपरस्ती में रहा था। इस दौरान उसने लश्कर-ए-तैयबा के साथ मिलकर सिख आतंकवाद को फिर से जिंदा करने की कोशिशें भी कीं। पाकिस्तान में सिख अतिवादियों को जेहादी भाई कहा जाता है और उन्हें तमाम सुख-सुविधाओं के साथ पाक सेना के अधिकारियों, आईएसआई और कुख्यात आतंकी संगठन के आकाओं से मिलने की खुली छूट भी मिली होती है। पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस सिख आतंकवादी संगठनों में फिर से जान डालने के लिए कनाडा, अमेरिका समेत दुनियाभर में बसे सिखों को भड़काने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती। आईएसआई खालिस्तानी अलगाववादी और कश्मीर के आतंकवादियों को एकजुट करने की योजना पर लगातार काम कर रही है। पाकिस्तान समर्थित एक पृथकतावादी सिख जगजीत सिंह चौहान ने 1980 के दशक में अलग खालिस्तानी राष्ट्र की घोषणा कर दी थी, जब पंजाब में चरमपंथ अपने शीर्ष पर था। वे 1980 के दशक के मध्य में भारत से ब्रिटेन चले गए थे और बाद में चौहान ने लंदन से खालिस्तान राष्ट्र के करेंसी नोट जारी करके सनसनी फैला दी थी। पाकिस्तान ने कई गुरुद्वारे हैं, जहां सिख हर साल जाते है। पाक सिखों को पाकिस्तान आने के लिए न केवल उच्च कोटि की सुरक्षा देता है, बल्कि वहां खालिस्तान के समर्थन में पोस्टर भी लगाता रहा है। आईएसआई खालिस्तान के नाम पर सिख युवाओं को भड़काकर स्लीपर सेल बनाने को आमादा है। इसके लिए वह स्वर्ण मंदिर से बाहर निकालने के लिए की गई कार्रवाई और सिख विरोधी दंगों के नाम पर विषवमन करती है। इंटरनेट पर सिख आतंकवादियों की शहादत जैसा महिमामंडन और एनजीओ द्वारा पैसा भेजकर आईएसआई खालिस्तान के दानव को पुन: जीवित करने की कोशिशों में लगी रही है।
अब एक खालिस्तानी समर्थक नेता के सांसद बनने से खालिस्तान को लेकर केंद्र सरकार की चुनौतियां बढ़ सकती है। पंजाब की मौजूदा आआपा सरकार का खालिस्तानियों को लेकर रुको और देखो का रुख अलगाववादी ताकतों को पुन: मजबूत कर रहा है। किसान आंदोलन को कनाडा से भारी समर्थन मिलना और उसमें हुई हिंसक घटनाएं सामान्य नहीं थी, इसे भारत की सुरक्षा एजेंसियों से खतरे के तौर पर देखा था। पिछले कुछ समय में पंजाब में पाकिस्तान से ड्रोन, पैसे और विस्फोटक आए हैं, खालिस्तान समर्थकों की सामाजिक टकराव बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैं। अकाल तख्त से भडकाऊ बयानबाज़ी के बाद अब मान का सांसद चुना जाना खालिस्तान की समस्या के पुन: पैर पसारने की ओर गंभीर संकेत है।
(लेखक स्तंभकार हैं)