भगवान के प्रति उत्कृष्ट प्रेम ही भक्ति
   Date29-Jun-2022

dharmdhara
धर्मधारा
भ क्तियोग ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल और सुगम मार्ग है। ईश्वर प्राप्ति के समस्त साधनों में, सभी मार्गों में भक्ति का मार्ग अत्यंत सरल और सुगम है। भक्ति ईश्वर के प्रति परम प्रेम है। यह निष्कपट भावना है। भक्ति का आरंभ, मध्य और अंत भी प्रेम ही है। सचमुच ईश्वर के प्रति सच्ची प्रेमोन्मत्तता का होना इस मानव जीवन का सबसे बड़ा गौरव है और परम सौभाग्य भी, पर इस सौभाग्य की प्राप्ति विरले ही कर पाते हैं।
व्यक्ति का मन यदि वासनाओं से भरा है, कामनाओं से भरा है तो वहां प्रेम जैसी दिव्य भावनाओं का होना कैसे संभव है? वहां परम प्रेम का होना कहां संभव है ? क्योंकि अमावस की घनी अंधेरी रात और पूनम की चांदनी से भरी रात, दोनों एक साथ नहीं रह सकते। उजियारा और अंधियारा, दोनों एक साथ नहीं रह सकते। जैसा कि कहा गया है, जहां काम वहां राम नहीं, जहां राम वहां काम नहीं। अर्थात जिस हृदय में राम उतर आए हैं, वहां काम का और जहां काम है, वहां राम का रहना संभव नहीं। जैसे चोरों को चांदनी रात नहीं सुहाती, वैसे ही प्रेम को वासना और कामना नहीं सुहाते, क्योंकि उनमें से किसी एक के होने पर दूसरे का होना संभव नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ति के मन में जब वासनाएं, कामनाएं भरी पड़ी हैं, तब वह प्रभु की भक्ति करे भी तो कैसे करे? इसके लिए क्या शास्त्रों ने कोई सरल उपाय बताए हैं। यदि हां तो वे उपाय क्या हो सकते हैं ? शास्त्रों में मन को वासनाओं व कामनाओं से मुक्त कर उसे शुद्ध व निर्मल करने के असंख्य उपाय बताए गए हैं। उनमें भी भक्ति ही सर्वोपरि है; क्योंकि भक्ति साधना भी है और साध्य भी। माना कि मन वासनाओं से भरा है, कामनाओं से भरा है; पर वासना न तो वासना से दूर होगी और न ही कामना, कामना से। हां! यदि वासना व कामना से भरे चित्त में भक्ति का दीप जल उठे, तो उस भक्ति के उजियारे से चित्त में व्याप्त वासनाओं, कामनाओं व संस्कारों का अंधियारा मिट सकता है और हमेशा-हमेशा के लिए मिट सकता है।