अध्यात्म की ओर उन्मुख होता जनमानस
   Date28-Jun-2022

dharmdhara
धर्मधारा
सा माजिक विज्ञान के क्षेत्र में अध्यात्म का पदार्पण हो रहा है। पर्यटन हो या पत्रकारिता-इनमें भी आध्यात्मिक आयाम जुड़ चुका है। मीडिया के क्षेत्र में धर्म-अध्यात्म को लेकर कितने सारे चैनल आ गए हैं। इनकी गुणवत्ता प्रश्नों के घेरे में हो सकती है, लेकिन बदलते जमाने की हवा इनमें साफ है। इसी तरह समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अध्यात्म विषयक सामग्री का दायरा बढ़ता जा रहा है। पूरे विश्व को जोड़ते इंटरनेट में इसकी झलक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
पर्यावरण-पारिस्थितिकी के क्षेत्र में आई विकृतियों से निपटने के लिए डीप इकोलॉजी की अवधारणा प्रकृति में अंतर्निहित आध्यात्मिक तथ्यों की व्याख्या कर रही है। प्रकृति के मूल में निहित मूलभूत एकता एवं इसके विभिन्न घटकों के अंतर्संबंध एवं परस्पर निर्भरता की समझ ही प्रस्तुत पर्यावरण संकट से मानवता को बचा सकती है। मनुष्य के दृष्टिकोण को बदलने के लिए साहित्य का सृजन आवश्यक है। यह एक सुखद संयोग है कि इनसान इस दिशा में भी अध्यात्म की ओर उन्मुख हो रहा है।
आज पूरे विश्व में आध्यात्मिक पुस्तकों का बाजार गरम है। प्रबंधन में अध्यात्म का प्रवेश हो चुका है। कितनी सारी पुस्तकें इस विषय को लेकर बाजार में उपलब्ध हैं। इनकी बेस्ट सेलर के रूप में रिकॉर्ड बिक्री पाठकों की अध्यात्म के प्रति बढ़ती रुचि को ही स्पष्ट करती है। हर माह अध्यात्म के गूढ़ पक्षों एवं ध्यान आदि पर छप रही पुस्तकों की भरमार इस लहर के प्रभाव को और स्पष्ट करते हैं। 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा में भी इसी तथ्य की गूंज देखी जा सकती है, हालांकि अभी इसके कार्यक्रम सामूहिक स्तर पर अध्यात्म के स्थूल पक्ष तक ही सिमटे दिखते हैं।
इस तरह विज्ञान और भौतिकवाद के चरम विकास पर मनुष्य भली-भांति समझ गया है कि मात्र बाहरी अन्वेषण, सुख भोग करने से जीवन का सही विकास नहीं होने वाला, बल्कि यह एकतरफा विकास अपने साथ में विनाश-विध्वंस के सरंजाम भी लेकर आ रहा है। पर्यावरण संकट से लेकर अमीरों-गरीबों की विषमता, युद्ध का खतरा, आतंकवाद एवं शोषण-भ्रष्टाचार आदि इसी के सूचक हैं। मानव प्रकृति में आई विकृति का समाधान उसकी दैवीय प्रकृति एवं अस्तित्व के मूल में छिपे एकता के सूत्रों में सन्निहित है। जीवन के हर क्षेत्र में अध्यात्म के प्रति बढ़ता रुझान इसकी स्वाभाविक परिणति कहा जा सकता है। तमाम विषमताओं एवं निराशाभरे दौर के बीच यह एक सुखद एहसास है कि नए युग का सूत्रपात जैसे होने ही वाला है।