बदलती वैश्विक राजनीति...
   Date27-Jun-2022

vishesh lekh
इस बार ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के चौदहवें शिखर सम्मेलन में यूक्रेन युद्ध, अफगानिस्तान संकट से लेकर शीत युद्ध के खतरों और वैश्विक अर्थव्यवस्था के हालात जैसे मुद्दे उठे... यह बैठक ऐसे मुश्किल वक्त में हुई है, जब यूक्रेन पर रूस के हमले जारी हैं और अमेरिका व पश्चिमी देश रूस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं... चीन भी अमेरिका के निशाने पर है... बैठक के उद्घाटन से लेकर समापन तक सदस्य देशों के नेताओं के संबोधन और साझा बयान से साफ है कि बदलती वैश्विक राजनीति और आपसी टकरावों को लेकर हर कोई चिंतित है... यह चिंता चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उद्बोधन में भी साफ दिखी, जिसमें उन्होंने शीत युद्ध के खतरों को लेकर आगाह किया... जिनपिंग का यह कहना कि शीत युद्ध की मानसिकता और गुटीय टकरावों को आखिरकार छोडऩा ही होगा, बिल्कुल सही है... यही आज की सबसे बड़ी जरूरत भी है... लेकिन विंडबना यह है कि ताकतवर देश ही एक बार फिर से दुनिया को शीत युद्ध और गुटीय टकरावों में धकेल रहे हैं... ब्रिक्स देशों की इस बैठक में उठे मुद्दों को कुछ समय पहले हुई क्वाड देशों के समूह की बैठक का जवाब भी माना जा रहा है... महत्वपूर्ण बात यह है कि साझा बयान में सदस्य देशों ने एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीयता अखंडता का सम्मान करने पर जोर दिया... हालांकि ब्रिक्स की बैठकों में ऐसी प्रतिबद्धता पहले भी दोहराई जाती रही है... लेकिन इसे भारत और चीन के संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है... सवाल है कि जो चीन एक दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है, गुटीय टकराव खत्म करने पर जोर दे रहा है, पहले वह अपने भीतर झांक कर तो देखे... भारत के साथ चीन का सीमा विवाद तो पुराना है ही, वह अब नए-नए विवाद खड़े करने से बाज नहीं आ रहा... क्या यही दूसरे देश की संप्रभुता की रक्षा करना है..? चीन को यह बात भी खल रही है कि आखिर भारत अमेरिका के नेतृत्व वाले गठजोड़ क्वाड का सदस्य क्यों है..? वैसे भारत को लेकर चीन ने कहा है कि साझा मतभेदों से ज्यादा महत्वपूर्ण साझा हित हैं... तो फिर चीन को अपने से क्या यह नहीं पूछना चाहिए कि क्यों वह भारत के साथ सैन्य टकराव बनाए रखने में अपने हित देख रहा है... और सिर्फ भारत ही नहीं, दक्षिण चीन सागर को लेकर कई देशों के साथ उसका गतिरोध छिपा नहीं है... उसकी विस्तारवादी नीतियां उसकी मंशा पर सवाल खड़े करती हैं... सवाल है कि गुटीय टकराव खत्म कैसे हों और शीत युद्ध के खतरों से कैसे बचा जाए..? यूक्रेन पर हमले को लेकर दुनिया जिस कदर खेमों में बंट गई है, वह कम चिंताजनक नहीं है... अमेरिका और यूरोप के कई देश रूस के खिलाफ हैं तो चीन शुरू से रूस के साथ है... भारत शुरू से ही किसी खेमे के साथ नहीं है और शांति का पक्षधर रहा है...
दृष्टिकोण
प्रदूषण की विकराल समस्या...
पिछले कई सालों से दिल्ली सरकार वायु प्रदूषण पर काबू पाने का प्रयास कर रही है, मगर इस दिशा में उसे अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई है... खासकर सर्दी के मौसम में जब हवा धरती की सतह के पास सिकुड़ आती है, तब दिल्ली में वायु प्रदूषण का प्रकोप जानलेवा साबित होता है... तय मानक से कई गुना अधिक प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर लोग अचानक अनेक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं... अब तक के अध्ययनों से साफ हो चुका है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं है... इस पर काबू पाने के लिए सरकार अब तक कई उपाय आजमा चुकी है... उनमें सम-विषम योजना भी शामिल है... बाहरी प्रदेशों से आने वाले भारी वाहनों को दिल्ली से होकर गुजरने पर रोक है... अभी तक सिर्फ वही वाहन आते हैं, जिन्हें दिल्ली में माल गिराना या ले जाना है... मगर अब दिल्ली सरकार ने नया कदम उठाते हुए इस साल अक्टूबर से फरवरी यानी पांच महीनों तक दिल्ली में भारी और मध्यम माल वाहकों का प्रवेश निषिद्ध कर दिया है... केवल फल-सब्जी, दूध, अनाज जैसी आवश्यक सामग्री लाने-ले जाने वाले वाहनों को प्रवेश की छूट होगी... दिल्ली सरकार के ताजा फैसले पर स्वाभाविक ही व्यापारी संघ ने विरोध जताया है... उनका कहना है कि बाहरी राज्यों से दिल्ली में रोजाना भारी मशीनों, निर्माण सामग्री आदि आती है, जिन्हें हल्के वाहनों के जरिए लाना संभव नहीं है... इनकी ढुलाई में बड़े ट्रकों का ही इस्तेमाल होता है... अगर उन पर रोक लग जाएगी, तो सारा कारोबार ठप्प पड़ जाएगा...