कर्मनिष्ठा
   Date25-Jun-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
पं. मदन मोहन मालवीय सन् 1931 मेें गांधीजी के साथ गोलमेज कॉन्फ्रेंस में भाग लेने लंदन गए। लंदन में सुबह उन्होंने स्नान करके अपने सामान में से भगवान श्रीकृष्ण का चित्र, गीता की प्रति, गंगाजल, तुलसीदल आदि निकाले। माथे पर उन्होंने तिलक लगाया और श्रीकृष्ण का चित्र सामने प्रतिस्थापित कर पूजा करने लगे। गांधीजी ने उन्हें पूजा करते देखा तो बोले-'पंडित जी! आप गीता व गंगाजल यहां लाना भी नहीं भूले। मैं आपकी ईश्वर निष्ठा के समक्ष नतमस्तक हूं।Ó मालवीयजी ने कहा-'गांधीजी! गीता-भागवत के इस सिद्धांत पर मेरा दृढ़ विश्वास है कि शरीर क्षणभंगुर है और न जाने कब प्राण मेरा साथ छोड़ दें। यदि अंतिम समय अपनी पावन मातृभूमि का सान्निध्य न भी मिल सके तो कम से कम गंगाजल, तुलसीदल को मुंह में डालने का सौभाग्य तो प्राप्त हो जाएगा। इसीलिए प्रतिक्षण मृत्यु का स्मरण करते हुए काशी की पावन मिट्टी तथा तुलसीदल, गंगाजल सदा साथ रखता हूं।Ó गांधीजी, मालवीयजी की अपनी मातृभूमि तथा धर्म के प्रति अनन्य निष्ठा को देखकर गद्गद् हो उठे।