मनुष्य में ब्रह्मांड की समस्त शक्ति विद्यमान
   Date25-Jun-2022


dharmdhara
धर्मधारा
मानवीय काया के भीतर कुछ ऐसे मर्मस्थान सुरक्षित हैं, जो गुह्य आध्यात्मिक शक्तियों के केंद्र कहे जा सकते हैं। इन शक्ति केंद्रों का जागरण मनुष्य को अपरिमित शक्ति भंडार का स्वामी बना देने में समर्थ है। इन मर्मस्थलों में से मेरूदंड या रीढ़ का स्थान प्रमुख है। जिस प्रकार इस भूमंडल का आधार मेरू पर्वत को माना गया है, उसी प्रकार मानवीय काया का शक्ति आधार भी मेरूदंड को कहा जा सकता है। यह मेरूदंड तैंतीस अस्थि खंडों के जुटने से बना है, जिनका संबंध तैंतीस कोटि देवी-देवताओं की शक्ति से माना जाता रहा है। चिकित्सकीय दृष्टि से मेरूदंड के सर्वाइकल, डोर्सल, लंबर, सेक्रल इत्यादि भाग होते हैं और ये तैंतीस अस्थि खंड उन भागों में विभक्त माने जाते हैं। भारतीय साधना विज्ञान यह मानता है कि यह विभाजन अष्ट वसुओं, द्वादश आदित्यों, एकादश रूद्रों, इंद्र और प्रजापति की शक्तियों के बीज रूप में उपस्थित होने के कारण है। शिव संहिता के द्वितीय पटल में भगवान शिव इस सत्य की उद्घोषणा करते हैं कि मानवीय काया, विश्व ब्रह्माण्ड की ही प्रतिमूर्ति है और जितनी शक्तियां इस विश्व का संचालन करती हैं, वे ही शक्तियां मनुष्य शरीर में भी प्रतिष्ठित हैं और इसीलिए मनुष्य शरीर की गौरव गरिमा का वर्णन, शास्त्रों में स्थान-स्थान पर देखने को मिलता है। श्रीमद् भागवत के द्वितीय स्कंध के प्रथम अध्याय में कहा गया है-
विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम्। यत्रेद दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च सत्।।
अर्थात्- यह कार्यरूप संपूर्ण विश्व जो कुछ कभी था, है या होगा-सब-का-सब जिसमें दिखाई पड़ता है, वही भगवान का स्थूल-से-स्थूल और विराट शरीर है अर्थात इसी मनुष्य शरीर के भीतर विश्व ब्रह्माण्ड की सभी शक्तियां विद्यमान है। इसी में आगे कहा गया है कि मनुष्य शरीर के ऊपरी भाग में स्थित सात लोक ही गायत्री मंत्र की सप्त व्याह्रतियां या दूसरे शब्दों में सप्त चक्र हैं (षट्चक्र तथा सहार)। इन चक्रों का जागरण तथा मेरूदंड के मध्य में स्थित कुंडलिनी शक्ति का अभ्युदय-गायत्री मंत्र में निहित शक्ति के द्वारा ही संभव हो पाता है। इसी को कुंडलिनी योग या लययोग कहते हैं।
जगदाधार महाशक्ति ही कुंडलिनी के रूप में मनुष्य शरीर में वास करती हैं तथा इनका प्रवाह, शरीर में अवस्थित 72000 नाडिय़ों के माध्यम से होता है। इनमेें से भी 14 नाडिय़ां प्रमुख कही गई हैं और उनमें से भी प्रधान नाडिय़ां तीन ही हैं-1. इड़ा, 2. पिंगला एवं 3. सुषुम्ना। ये नाडिय़ां मनुष्य के स्थूल नहीं, वरन् सूक्ष्म शरीर से संबंध रखती है और इनका सीधा संबंध मानवीय शक्ति के जागरण अथवा उसके चरमोत्कर्ष से है। इड़ा नाड़ी मेरूदंड के बाईं और तथा पिंगला नाड़ी, मेरूदंड के दाईं ओर से लिपटी हुई है। इनमें से इड़ा को निगेटिव और पिंगला को पॉजिटिव विद्युत प्रवाह भी कह सकते हैं। तंत्र विज्ञान इनको क्रमश: चंद्र एवं सूर्य नाड़ी कहकरभी पुकारता है। इन दोनों विद्युत प्रवाहों के मिलने से जो शक्ति उत्पन्न होती है, वह सुषुम्ना नाड़ी कहलाती है।