दरकती जमीन से अनभिज्ञ...
   Date24-Jun-2022

vishesh lekh
महाराष्ट्र में सत्ता का संग्राम पल-पल नए रूप ले रहा है... जिस तरह से राजनीतिक समीकरण बन और बिगड़ रहे हैं, उससे इस बात का अनुमान लगाना आसान नहीं है कि यह सरकार की अस्थिरता से जुड़ी लड़ाई कब शांत होगी..? क्योंकि इस राजनीतिक भंवर के अनेक केन्द्रबिन्दु है और उससे जुड़े हुए पक्षों के अपने-अपने राजनीतिक हित-लाभ भी उसके साथ नत्थी हो चुके हैं... ऐसे में हर कोई अपने नंबर बढ़ाकर सत्ता के इस संग्राम को अपने पक्ष में करने को आतुर है... उसी मान से राजनीतिक जमावट भी चल रही है... संवाद और संपर्क के जरिये उस जमीन को तलाशा जा रहा है, जिसके दरकने का आभास भी शिवसेना प्रमुख और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को नहीं हुआ... यह कितना विडंबनापूर्ण राजनीतिक पक्ष है कि एक मुख्यमंत्री को अपने ही पार्टी के आक्रोशित या कहे असंतुष्ट चल रहे नेताओं, विधायकों, मंत्रियों और सांसदों का ध्यान नहीं... यह अनभिज्ञता कितनी व्यापक है कि कोई एक-दो मंत्री-नेता नहीं, बल्कि दर्जनों से जब विधायक और सांसद सरकार और पार्टी के मुखिया से नाराज चल रहे हो, तब उनके भावों को समझने, उनकी समस्याओं का समाधान करने की कुशल रणनीति का उद्धव ठाकरे के पास नितांत अभाव नजर आता है... तभी तो वे शिवसेना को उसी कांग्रेस एवं गांधी परिवार की भांति हांकने लगे और पार्टी को परिवार पार्टी बनाकर उन्होंने खुद मुख्यमंत्री बनकर बेटे को भी मंत्री का ओहदा देकर सरकार में अपने वरिष्ठ साथियों के साथ हस्तक्षेप की वे सभी पराकाष्ठाएं पार करने दी, जिनका दुष्परिणाम अंतत: एकनाथ शिंदे के रूप में सामने आना ही था... आज पूरी शिवसेना ठाकरे परिवार के विरोध में खड़ी नजर आती है... फिलहाल जो परिदृश्य राजनीतिक रूप से मुंबई से सूरत होते हुए गुवाहाटी पहुंचा है, उसके मान से यह कहा जा सकता है कि एकनाथ शिंदे ने फिलहाल एक पहली और बड़ी लड़ाई जीतते हुए उद्धव ठाकरे को असंतुष्ट शिवसैनिकों के विषयों में सोचने-विचारने के लिए मजबूर कर दिया है... उद्धव भी जानते हैं कि अब सत्ता उनकी मुट्ठी में नहीं है, इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री निवास का त्याग करके मातोश्री की शरण ले ली है... भाजपा-कांग्रेस-राकांपा और निर्दलियों के लिए फिलहाल तो देखों इंतजार करो की रणनीति है... लेकिन यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि राजनीति की इस चौसर पर कौन, कब जमावट कर जाए, कहा नहीं जा सकता... क्योंकि महाराष्ट्र में 1978 में शरद पवार ने जनता पार्टी से हाथ मिलाकर कांग्रेस की सरकार गिराई थी... 2019 में अजीत पंवार ने राकांपा से विद्रोह कर भाजपा के साथ सरकार बनाई थी, 1991 में छगन भुजबल ने शिवसेना छोड़ी थी, 2006 में राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ मनसे का निर्माण किया था... कुलमिलाकर शिवसेना की जमीन अनेक बार दरकी है... लेकिन ताजा हालात में जो अनभिज्ञता उद्धव ठाकरे की रही, ऐसी स्थिति कभी नहीं बनी...
दृष्टिकोण
विश्वानुकूल योग का बढ़ता व्याप...
कोरोना महामारी की वैश्विक विभीषिका के चलते करीब दो वर्षों से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का सामूहिक आयोजन नहीं हो पा रहा था, लेकिन आठवें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर एक बार फिर देश-दुनिया ने इस बात को बड़ी ही प्रखरता के साथ रखा है कि योग पूरे विश्व के अनुकूल है... यह न केवल शांति और स्वास्थ्य के लिए अतिआवश्यक है, बल्कि योग के जरिये अनेक तरह की समस्याओं का समाधान भी समवेय हो जाता है... आज योग के द्वारा देश-दुनिया के अनेक देशों और शहरों में व्यापक रूप से जो आयोजन जमीन से लेकर आसमान, पहाड़ों से लेकर ग्लेशियर, समुद्र की लहरों और पाताल तक में योग अभ्यास का जो उत्साह नजर आता है, वह कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कर्नाटक से कनाडा तक... यहां तक कि सात समंदर पार अमेरिका के न्यूयार्क से लेकर इटली और अरब देशों में भी योग की महिमा में लोग उत्साह के साथ एकरंग होते नजर आ रहे हैं... नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, ब्रिटेन में योग की धूम रही... प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मैसूर में 15 हजार लोगों के साथ योग किया... लद्दाख, प्रशांत महासागर में भी भारतीय सेना के जवानों ने उत्साह के साथ योग की विभिन्न क्रिया और मुद्राओं का अभ्यास किया... यह बात सही है कि पूरी दुनिया में अगर शांति, सद्भाव और सौहार्द का माहौल निर्मित करना है तो मानवता के लिए योग से बड़ा कोई दूसरा उपहार नहीं हो सकता... भारत के ऋषि-मुनियों ने अपनी इस योग कला के द्वारा दुनिया को स्वस्थ और निरोगी जीवनशैली के साथ शांतिपूर्ण वातावरण के लिए एक ऐसा मंत्र दिया है, जिसका व्याप देश-दुनिया में जितना वृहद होगा, उतना ही सकारात्मक माहौल निर्मित होता चला जाएगा...