कर्तव्य बोध
   Date24-Jun-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
जा पान के एक झेन भिक्षु टेटसुगेन को लगा कि धर्मसूत्र अपनी भाषा में भी प्रकाशित होना चाहिए। सूत्र के प्रकाशन-खर्च का अनुमान लगाकर वह धन इक_ा करने निकला। लोगों ने उदार मन से उसकी मदद की। वह इस काम में दस साल तक लगा रहा और तब जाकर उसके पास ग्रंथ-प्रकाशन के लिए पर्याप्त धन इक_ा हो गया। उसी समय देश में बाढ़ आ गई। बाढ़ अपने पीछे अकाल छोड़ गई। टेटसुगेन ने ग्रंथ-प्रकाशन के लिए जो धन इक_ा किया था, उसे लोगों की सहायता में खर्च कर दिया। स्थितियां सामान्य हुईं तो वह फिर से धन-संग्रह करने निकला। कुछ साल और बीत गए। धन इक_ा हुआ कि देश में एक महामारी फैल गई। टेटसुगेन ने धन फिर से लोगों की सेवा में खर्च कर दिया। इस तरह उसने कई लोगों को मरने से बचाया। ग्रंथ के प्रकाशन के लिए टेटसुगेन ने तीसरी बार धन इक_ा करने का निश्चय किया। बीस साल बाद जाकर ग्रंथ प्रकाशित करने की उसकी इच्छा पूरी हो पाई। उसने ग्रंथों के संकलन का पहला संस्करण निकाला, जिसे क्योटो के ओबाकू विहार में आज भी देखा जा सकता है। जापान में आज भी लोग टेटसुगेन को याद करते हुए कहते हैं कि उसने तीन बार सूत्रों के ग्रंथ प्रकाशित करवाए। तीसरा ग्रंथ हमें दिखता है, जबकि पहले दो ग्रंथ जो ज्यादा महत्वपूर्ण थे, वे हमें दिखलाई नहीं पड़ते।