पर्यावरण संरक्षण और सनातन दर्शन
   Date24-Jun-2022

dharmdhara
धर्मधारा
पे ड़ पौधों से अनेक रोगों का इलाज कर दिया जाता है और वन्य जीव-जन्तुओं का भी हमारे शास्त्रों में बहुत अच्छी तरह से वर्णन प्रस्तुत किया गया है। ज्ञान तथा नैतिक शिक्षा पर आधारित पंचतंत्र की कथाएं, जातक कथाएं अनेक ग्रन्थ जीव-जन्तुओं की उपमा से भरे पड़े हैं। इनमें से कई को देवी-देवताओं के वाहन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वन्य प्राणियों के प्रति प्रेम तथा आदर की भावना के बाद भी आज अनेक प्रजातियां विलुप्त होती जा रही हैं, जो जीव-जन्तु बचे हैं सरकार इनके संरक्षण के लिए अत्यधिक चिन्तित है। मानव जीवन के अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए औषधि, उदर पूर्ति के लिए कन्दमूल फल, शरीर ढकने के लिए वस्त्र, कारखाने चलाने हेतु कच्चा माल, भूमि को उपजाऊ तथा भू-स्खलन से बचाने में पेड़ पौधों की भूमिका को कदापि नकारा नहीं जा सकता।
कार्बनडाइऑक्साइड को अमृत (ऑक्सीजन) में परिवर्तित पेड़-पौधे ही करते हैं। गीता में स्वयं भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैं पेड़ों में स्वयं पीपल का वृक्ष हूं, तुलसी का पौधा स्वयं विष्णुप्रिया के रूप में पूज्यनीय है। सन्तान प्राप्ति के लिए बरगद की पूजा की जाती है। चन्दन की लकड़ी चिता से लेकर माथे की शोभा तक बढ़ाता है और अपनी शीतलता के लिए अतुलनीय है। शास्त्रों में ही यह बताया गया है कि सौ पुत्रों से उतना सुख नहीं मिलता, जितना एक वृक्ष लगाने से होता है। हमारी संस्कृति में नीम को पूर्ण चिकित्सक, आंवले को पूर्ण भोजन, पीपल को शुद्ध वायुदात्री, पाकड़ और वट के युग्म वृक्षों को जल संग्राहक एवं वट को पूर्ण घर माना गया है। अपनी प्राचीन एवं पारंपरिक संस्कृति को जानने के साथ-साथ विभिन्न त्योहारों में वट, पीपल, नीम, आम के पेड़ों, कैला एवं तुलसी के पौधे की पूजा तथा गाय, श्वान (कुत्ता), चिडिय़ों यहां तक कि कौवों आदि को भोजन खिलाना हमारी संस्कृति का अंग है। यह हमारी प्रकृति एवं मनुष्य के विभिन्न सहभागियों के प्रति जागरूकता का द्योतक है। नदियों एवं पहाड़ों का मानवीयकरण करके हमने उसमें जीवंतता ही नहीं पैदा की वरन् उन्हें अपना हिस्सा बनाया। प्रकृति से सामंजस्य स्थापित कर जीवनयापन करने के लिए आध्यात्मिकता को अपने जीवन का अंग बनाकर प्रकृति से केवल आवश्यकता भर प्राप्त करने का मूल-मंत्र हमने सीखा है।