वनवासियों का बढ़ाया मान...
   Date23-Jun-2022

vishesh lekh
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में प्रथम व्यक्ति अथवा प्रथम महिला का महत्वपूर्ण स्थान है...राष्ट्रपति के रूप में गणतांत्रिक शक्तियों को समाहित कर तीनों सेनाओं के सर्वेसर्वा और राष्ट्र प्रमुख के रूप में राष्ट्रपति की भूमिका प्रत्येक कालखंड में महत्वपूर्ण रही है...देश में सोलहवें राष्ट्रपति के रूप में जुलाई में देश को नया राष्ट्रपति मिलेगा और इस बात की न केवल संभावना बढ़ गई है..,बल्कि विश्वास भी अडिग़ नजर आ रहा है कि राजग गठबंधन महिला नेत्री के रूप मे देश को दूसरी और आदिवासी समाज से पहली महिला राष्ट्रपति देने का गौरव हासिल करने वाला है...रायसीना हिल्स की इस दौड़ में वैसे तो सालभर से अनेक नाम चल रहे थे..,लेकिन अंतिम समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल विपक्ष को..,बल्कि देशवासियों को एक ऐसा तोहफा दिया जिसे देख-सुनकर हर कोई आश्चर्यचकित और भावविभोर भी...क्योंकि अभी तक इस सर्वोच्च संवैधानिक पद पर प्रत्येक धर्म-जाति समुदाय के व्यक्ति दायित्व निर्वाह कर चुके है...सिवाय वनवासियों के इसलिए किसी वनवासी महिला नेत्री को राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में भाजपा द्वारा आगे बढ़ाना यह संपूर्ण भारत के आदिवासी अर्थात वनवासी, गिरीवासी का भी सम्मान है...क्योंकि 2011 की जनगणना के अनुसार अकेले गुजरात में ही 14 फीसदी से अधिक आदिवासी आबादी है...पूरे देश में इनका आदिवासियों की संख्या 1951 में ही देश की कुल जनसंख्या का 8.2 फीसदी था...ओडिशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में भी आदिवासी समाज का एक बड़ा वर्ग न केवल राजनीतिक रूप से..,बल्कि विकास व निर्माण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है...भाजपानीत राजग गठबंधन की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार आदिवासी महिला नेत्री द्रोपदी मुर्मू के नाम का चयन अपने आप में महत्व रखता है..,क्योंकि 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के बैदापोसी गांव में जन्मी मुर्मू आदिवासी जनजाति समाज के समूह संथाल परिवार से रिश्ता रखती है...64 वर्षीय मुर्मू जुलाई में संभवत: भारत की पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति बनने का गौरव हासिल करके न केवल स्वयं गौरवांवित होंगीं...बल्कि देश के बड़े वनवासी समुदाय को भी गौरवांवित करेंगीं...उनके नाम का चयन मोदी सरकार ने उनकी योग्यता और अब तक किए गए राष्ट्रीय अवदान को ध्यान रखकर किया है...इसलिए वे विपक्ष के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को करारी टक्कर भी देंगीं...क्योंकि उन्होंने 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत के पार्षद से राजनीतिक सफर शुरू किया था...इसके बाद 2000 में वे ओडिशा सरकार में मंत्री रहीं...उन्होंने झारखंड की पहली महिला राज्यपाल होने का भी गौरव हासिल किया है...द्रोपदी मुर्मू के इस चयन से वनवासी समाज का गौरव बढ़ा है...
दृष्टिकोण
बेमेल गठबंधन ध्वस्त होना था...
महाराष्ट्र में शिवसेना ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और उनका गठबंधन दशकों से चला आ रहा है..,लेकिन पिछली बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उम्मीद से कुछ ज्यादा सीटें प्राप्त करने के बाद शिवसेना की राजनीतिक लिप्सा कुछ इस तरह से बढ़ी कि उसने भाजपा के साथ वे सारी शर्ते एकसाथ नत्थी कर दी..,जिनके कारण गठबंधन सरकार बनाने की तरफ कदम नहीं बढ़ा पाया...क्योंकि मुख्यमंत्री पद भाजपा-शिवसेना दोनों रखना चाहते थे...लेकिन शिवसेना ने उस समय राजनीतिक अवसरवादिता का नया रूप दिखाया जब उद्धव ठाकरे ने अपने घोर विरोधी कांग्रेस-राकांपा के सहयोग से महाराष्ट्र में सरकार बनाकर मुख्यमंत्री पद प्राप्त किया...ऐसे में यह गठबंधन ही महाराष्ट्र महाविकास आघाड़ी के नाम से शुरुआत से बे-मेल था...क्योंकि जब विचारधारा की धरातल पर तीनों दलों में समानता नहीं..,तो फिर सरकार में रहकर विकास व निर्माण के साथ न्याय व्यवस्था संबंधी फैसलों पर किस तरह से समानता हो सकती है..? वही हुआ महाविकास आघाड़ी सरकार आए दिन अपने ही दांव-पेंच में उलझती रही...कभी कांग्रेस ने तो कभी राकांपा ने शिवसेना को अपने इशारों पर नचाया..,तभी तो सरकार पर अनेक तरह के शर्मसार करने वाले आरोप भी लगे...महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार उस समय सर्वाधिक चर्चा में आ गई जब उसने भाजपा कार्यकर्ताओं को हनुमान चालीसा का पाठ करने के मामले में भी कानूनी डंडे का भय दिखाया था या कहे कि दमनकारी रूख अपनाया था...आज शिवसेना में बगावत के स्वर इस तरह से गूंज रहे है कि 55 में से करीब 40 से अधिक विधायक मुख्यमंत्री ठाकरे का साथ छोड़ चुके हैं...ऐसे में इस बे-मेल गठबंधन सरकार की नींव भले ही कांग्रेस और राकांपा ने स्वार्थों के चलते कमजोर की हो..,लेकिन उद्धव ठाकरे राजनीति के चौसर पर अपने ही घर में समन्वय की लड़ाई हार गए और परिणाम तो जो सामने है होना ही था...?