सफलता का सूत्र
   Date23-Jun-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
स फलता का श्रेय किसे मिले, इस प्रश्न पर एक दिन विवाद उठ खड़ा हुआ। संकल्प ने अपने को, बल ने अपने को और बुद्धि ने अपने को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बताया। तीनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। अंत में तय हुआ कि विवेक को सरपंच बनाकर इस झगड़े का फैसला करा लिया जाए। विवेक तीनों को साथ लेकर चला। उसने एक हाथ में लोहे की टेढ़ी कील ली और दूसरे में हथौड़ा। चलते-चलते वे लोग एक ऐसे स्थान पर पहुंचे, जहां एक सुंदर बालक खेल रहा था। विवेक ने बालक से कहा-'बेटा! अगर तुम इस टेढ़ी कील को हथौड़े से ठोंककर सीधी कर दो तो मैं तुम्हें भरपेट मिठाई और खिलौने से भरी एक पिटारी दूंगा।Ó यह सुनकर बालक की आंखें चमक उठीं। वह बड़ी आशा और उत्साह से प्रयत्न करने लगा, परंतु कील को सीधा करना तो दूर की बात, उससे हथौड़ा उठा तक नहीं। भारी औजार उठाने के लायक बल उसमें नहीं था। बहुत प्रयत्न करने पर सफलता न मिली तो बालक खिन्न होकर चला गया। इससे उन लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला कि सफलता प्राप्त करने के लिए अकेला संकल्प पर्याप्त नहीं है। चारों आगे बढ़े तो थोड़ी दूर पर एक श्रमिक दिखाई पड़ा। वह खर्राटे लेकर सो रहा था। विवेक ने उसे झकझोर कर उठाया और कहा-'अगर तुम इस कील को हथौड़ा मारकर सीधा कर दो तो मैं तुम्हें दस रुपए दूंगा।Ó उस श्रमिक ने उनींदी आंखों से कुछ प्रयत्न किया, पर वह नींद की खुमारी में बना रहा। उसने हथौड़ा एक ओर रख दिया और वहीं लेटकर खर्राटे भरने लगा। अब सबने निष्कर्ष निकाला कि यह बुद्धि होते हुए भी कि इतना आसान कार्य करने पर उसको लाभ होगा, वह श्रमिक उस कील को सीधा न कर सका, क्योंकि उसमें संकल्प का अभाव था। सबको यह बात समझ में आ गई कि संकल्प, बल और बुद्धि सम्मिलित रूप से ही सफलता दिला सकते हैं। एकाकी रूप से तीनों अपूर्ण हैं।