रूस-यूक्रेन युद्ध से ऊर्जा का गहराता संकट
   Date22-Jun-2022

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अभिषेक कुमार सिंह
वि कास के लिए ऊर्जा एक अनिवार्य जरूरत है। कोरोना महामारी की रफ्तार थमने के साथ पूरी दुनिया में तेल, गैस और बिजली की मांग बढ़ी है। उद्योग-धंधों में हर तरह के उत्पादन के लिए ऊर्जा के इन सभी विकल्पों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। जाहिर है, ऊर्जा की जरूरत दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हालांकि यह पहले ही माना जा रहा था कि महामारी से निजात पाने के साथ जब हालात सामान्य होने लगेंगे, तब कुछ समय के लिए तेल, गैस और बिजली की मांग तेजी से बढ़ेगी और फिर धीरे-धीरे कोविड से पहले वाले दौर के समान हो जाएगी। कुछ हद तक ऐसा हुआ भी, लेकिन इस बीच रूस-यूके्रन युद्ध ने ऊर्जा संबंधी मांग में असंतुलन पैदा कर दिया। अब मांग ज्यादा है और आपूर्ति कम। इसलिए आज कई सवाल हैं। जैसे कि ऊर्जा का यह संकट कितना बड़ा है, इसके क्या कारण हैं, यह कब और कैसे खत्म होगा और इसके क्या विकल्प हो सकते हैं?
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के महानिदेशक फातिह विरोल ने हाल में दावा किया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष और रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से दुनिया एक ही समय में तेल, प्राकृतिक गैस और बिजली संकट का सामना करने लगी है। इसके अलावा गर्मी की छुट्टियों के आगमन के साथ ही अमेरिका और यूरोप में ईंधन की कमी का संकट पैदा होने लगा है।
एशिया ही नहीं, यूरोप में भी यह महसूस हो रहा है कि एक ही समय में डीजल, गैसोलीन और मिट्टी के तेल की आपूर्ति काफी कम हो रही है। वजह यह है कि यूरोप न केवल कच्चे तेल के लिए, बल्कि पेट्रोलियम उत्पादों के लिए भी आयात पर निर्भर है। ऐसे में स्थिति यह बन गई है कि दुनिया में मौजूदा ऊर्जा संकट का दायरा वर्ष 1970 और 1980 के दशक की तुलना में ज्यादा व्यापक हो गया है और इसके लंबे समय तक खिंचने की आशंका है। यूक्रेन पर रूसी हमले के कारण ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति में बाधा और तेल-गैस आदि की बढ़ती कीमतों के कारण दुनिया में नई तरह की मंदी का खतरा मंडरा रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिस तरह से यूक्रेन में लंबी लड़ाई लडऩे का मंसूबा दर्शा रहे हैं, उससे ऊर्जा संकट के तत्काल समाधान की उम्मीदें दिख नहीं रहीं। एक समस्या यह भी हुई है कि सामरिक गुटबंदी के कारण कई देश और संघ रूसी तेल के आयात पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। यूरोपीय संघ ने अगले छह महीने के लिए रूसी तेल की खरीद पर पांबदी लगा दी है।
इसी तरह यूक्रेन ने अपनी जमीन से होकर गुजरने वाली और यूरोप को गैस पहुंचाने वाली पाइप लाइनें बंद कर दी हैं। इन सभी कारणों ने यूरोपीय देशों में महंगाई को चरम पर पहुंचा दिया है। हालांकि महंगाई के पीछे और भी कारण हैं, जैसे यूक्रेन से होने वाले अनाज और खाद्य तेलों के निर्यात में रूसी हमले के कारण बाधा पैदा हुई है। इसका असर चौतरफा है। दावा है कि इन वजहों से अमेरिका में महंगाई चार दशकों में सबसे ज्यादा है, लेकिन यहां असली मुद्दा ऊर्जा संकट का है, जिसने भारत, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान आदि के सामने भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। श्रीलंका के हालात तो सामने हैं ही, जबकि पाकिस्तान की हकीकत यह है कि वहां भुगतान नहीं किए जाने के कारण चीन की दो दर्जन बिजली कंपनियों ने अपना कारोबार बंद करने की धमकी दे दी है।
जहां तक भारत की बात है, तो यहां ऊर्जा की मांग और आपूर्ति का संतुलन काफी कुछ आयातित तेल और गैस पर निर्भर करता है। भारत तेल-गैस की अपनी जरूरतों का अस्सी फीसद हिस्सा ईरान और रूस आदि देशों से होने वाले आयात से पूरा करता है। इधर चूंकि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिरता जा रहा है, इससे आयातित तेल-गैस के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। जैसे हालात हैं, उनमें तेल कंपनियां अपने नुकसान की भरपाई के लिए कीमतें और बढ़ा दें तो हैरानी की बात नहीं।
भारत में महंगाई बढऩे का बड़ा कारण कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और खाद्य तेलों की कीमतों में आई तेजी रहा है। फिर, बीते ढाई वर्षों में घर से काम और कामकाज के मिलेजुले मॉडल ने बिजली की खपत में कई गुना वृद्धि कर दी है। यही वजह है कि ताप बिजलीघरों पर ज्यादा बिजली बनाने का दबाव बन गया है। इससे कोयले की खपत बढ़ गई। हालात ये हैं कि सरकार की लगातार कोशिशों के बावजूद ताप बिजलीघरों में कोयले का औसत भंडार नौ साल के मुकाबले सबसे कम है।
जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों के मद्देनजर कोयले से उत्पादित बिजली पर हमारी निर्भरता का बढऩा अच्छा नहीं है, लेकिन मांग में आई अचानक तेजी ने हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली योजनाओं की रफ्तार मंद कर दी है। हाल यह है कि केंद्र सरकार ने ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए अगले तीन साल के लिए विदेशों से कोयला आयात की मंजूरी दे दी है।
इसके अलावा आयातित कोयले से चलने वाले ताप बिजलीघरों को चालू रखने के लिए एक आपात कानून को भी मंजूरी दी गई है। यही नहीं, बिजलीघरों को खदानों से कोयले की निर्बाध आपूर्ति हो सके, इसके लिए यात्री ट्रेनें रद्द कर मालगाडिय़ों का आवागमन बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए गए। यही नहीं, अब सरकार वित्तीय रूप से अक्षम घोषित की जा चुकी करीब सौ कोयला खदानों को भी दोबारा खोलने पर विचार कर रही है, ताकि देश में कोयले की आपूर्ति बढ़ी हुई मांग के मुताबिक की जा सके।
देश में बिजली संकट से क्या असर पड़ रहा है, इसकी एक बानगी हाल में एक सर्वेक्षण में सामने आई। पैंतीस हजार से ज्यादा लोगों के बीच करवाए गए इस सर्वे में शामिल आधे लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें हाल में काफी ज्यादा बिजली कटौती झेलनी पड़ी। तीन राज्यों में कई फैक्ट्रियां बिजली की कमी के चलते उत्पादन संबंधी मांग पूरी नहीं करने के कारण बंद करनी पड़ गईं।
ओडि़शा जैसे राज्य में पिछले वर्ष अक्टूबर से मार्च, 2022 के बीच बिजली की खपत तीस फीसदी बढ़ी है। इससे पता चलता है कि देश में बिजली की मांग में अचानक बहुत बढ़ोतरी हुई है। असली समस्या मानसूनी मौसम में आने को है, जब देश के कोयला खदानों में बारिश से पानी भर जाता है और कोयले का खनन बंद हो जाता है। ऐसे में घरों में बिजली कटौती होना स्वाभाविक है।
सवाल है कि आखिर ऊर्जा की बढ़ती मांग को साधा कैसे जाए? इस सवाल के कई जवाब हैं। एक तो यह है कि फिलहाल जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों की ज्यादा फिक्र करना छोड़कर या तो कोयला आधारित ताप बिजलीघरों को पूरी ताकत से काम करने की छूट दी जाए या फिर परमाणु ऊर्जा की दिशा में तेजी से बढ़ा जाए। पर्यावरण के अनुकूल हरित ऊर्जा पर जोर देने के फिलहाल क्या परिणाम निकल सकते हैं, इसका एक उदाहरण श्रीलंका की डगमगाई अर्थव्यवस्था है। दावा है कि श्रीलंका ने जब से अपनी खेती को पूरी तरह आर्गेनिक करने का फैसला किया, उसकी उपज कई गुना घट गई। इससे देश एक नए गंभीर संकट में फंस गया।
एक उपाय परमाणु ऊर्जा को अपनाने से जुड़ा है। परमाणु ऊर्जा एक ऐसा विकल्प देती है, जिसमें कार्बन उत्सर्जन की समस्या नहीं है। हालांकि इसे लेकर एक सवाल यह है कि अक्षय ऊर्जा की तरफ धीमी चाल से बढ़ती दुनिया क्या एक बार फिर उस परमाणु ऊर्जा पर दांव खेलने को तैयार होगी, जिसके अपने खतरे कम नहीं हैं।