आतिथ्य भाव
   Date22-Jun-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
ए क बार पेठेणपुर में आधी रात बीते कुछ ब्राह्मण पहुंचे। वे बहुत थक गए थे। उस समय उन्हें भूख भी लगी हुई थी। कहीं ठहरने की जगह ढूंढ़ रहे थे। इतने में कुछ दुष्ट इन्हें मिल गए। उन्होंने ब्राह्मणों से कहा - 'इधर-उधर क्यों भटकते हो? एकनाथ के पास एक ऐसी विद्या है कि वह एक साथ सैकड़ों आदमियों को भोजन करा सकता है।Ó भोले यात्री उन दुष्टों की बातों में आकर एकनाथ के घर पहुंचे। एकनाथ ने उनका स्वागत किया। यह जानकर कि वे भूखे हैं, एकनाथ ने पत्नी को रसोई बनाने को कहा। रात के 12 बज गए थे। गिरिजाबाई ने प्रसन्न मन से रसोई बनानी शुरू कर दी। बाड़े में जाकर देखा तो ईंधन समाप्त हो गया था। एकनाथ ने अपने शिष्य से कहा- 'अपना घर लकड़ी का ही बना हुआ है। दो-चार लकड़ी निकालकर काम चलाओ।Ó घर का छप्पर तोड़कर गिरिजाबाई ने जल्दी-जल्दी रसोई तैयार की। बड़े प्रेम से ब्राह्मणों को भोजन परोसा। जब सुबह साधुओं को छप्पर के बारे में पता चला तो वे एकनाथ की सज्जनता से हतप्रभ रह गए।