खुशियों का हरण करता है अस्वाभाविक जीवन
   Date22-Jun-2022

dharmdhara
धर्मधारा
सं चार क्रांति की इस दुनिया में लोग एक तरह से लिखना ही भूलते जा रहे हैं, पहले पत्र लिखे जाते थे, लिखने वाले पेन या कलम से लोगों का गहरा रिश्ता होता था, लेकिन आजकल लोग एसएमएस, व्हाट्सअप आदि के माध्यम से ही अपने विचारों व भावनाओं की अभिव्यक्ति कर देते हैं और लिखने से दूर भागते हैं, जबकि लिखने का संबंध हमारी खशियों से भी है।
दरअसल जब हम अपने विचारों की अभिव्यक्ति लिखने के माध्यम से कर देते हैं तो उसके पश्चात वे हमारे मस्तिष्क की सक्रिय स्मरण क्षमता का हिस्सा नहीं रह जाते हैं और इस कारण हमारा दिमाग हलका व खुश महसूस करता है। इसलिए अपने दिमाग में बार-बार उमड़ती-घुमड़ती बातों को कागज पर लिखना चाहिए, इसी तरह यदि दिमाग में अच्छे विचार आएं तो उन्हें भी कहीं लिखकर सहेज लेना चाहिए; क्योंकि अच्छे विचार हमारे दिमाग में बुलबुलों की तरह उपजते हैं और फिर कहीं विलीन हो जाते हैं। यदि उन्हें सहेजना है तो उन्हें कहीं लिख लेना ही सबसे अच्छा तरीका होता है। अच्छे विचारों, भावों के संपर्क में रहना भी हमारी खुशियों को बढ़ाता है और इसके लिए श्रेष्ठ साहित्य का चयन करके उसे पढऩा, नियमित स्वाध्याय करना, पढऩे की आदत बनाना आदि भी हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं। पढऩे से अच्छे विचार मिलते हैं और ये धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व को सही दिशा प्रदान करते हैं, साथ ही समय-समय पर हमारा मार्गदर्शन भी करते हैं। इसके साथ-साथ सद्साहित्य में मौजूद भावनात्मक व आध्यात्मिक ऊर्जाएं भी हमारा पथप्रदर्शन करती हैं और हमें आंतरिक खुशी प्रदान करती हैं; क्योंकि इन्हें पढऩे से हमें एक आत्मिक संतोष प्राप्त होता है। इस प्रकार खुश रहने के कई तरीके हैं, जिन्हें अपनाकर हम अपने जीवन में खुशियां हासिल कर सकते हैं और इन खुशियों में दूसरों को शामिल करके इनका दायरा भी विस्तृत कर सकते हैं, इसलिए अपने व्यक्तित्व में इन्हें आत्मसात् करने का प्रयत्न करना चाहिए।