चीन की आतंकपरस्त नीति...
   Date21-Jun-2022

vishesh lekh
लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी अब्दुल रहमान मक्की को चीन ने वैश्विक आतंकी घोषित होने से जिस तरह बचा लिया, उससे आतंकवाद को लेकर उसकी नीति के बारे में कोई संशय बाकी नहीं रह जाता है... भले चीन कहता रहा हो कि वह आतंकवाद के खिलाफ जंग में दूसरे देशों के साथ है, लेकिन हकीकत यह है कि वह आतंकवाद फैलाने वाले देशों और संगठनों को न केवल हवा दे रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनका खुला समर्थन भी कर रहा है... मक्की को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए भारत और अमेरिका ने एक जून को सुरक्षा परिषद में जो साझा प्रस्ताव रखा था, उसे चीन ने वीटो कर दिया... इसका मतलब तो यही हुआ कि चीन मक्की के पक्ष में खड़ा है और उसे आतंकवादी नहीं मानता... मक्की को समर्थन देने का मतलब पाकिस्तान की आतंकवाद नीति की वकालत करना है... जबकि दुनिया देख रही है कि पिछले कई दशकों से पाकिस्तान आतंकवाद का गढ़ बन हुआ है और कई आतंकवादी संगठन उसकी जमीन से अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं... हालांकि चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ किसी से छिपा नहीं है... पाकिस्तान में चीन के गहरे आर्थिक हित हैं... ऐसे में अगर वह पाकिस्तान की आतंकवाद की नीति को खुला समर्थन दे रहा है तो इसमें हैरानी की बात नहीं... चीन के इस कदम से आतंकवाद के खिलाफ भारत की मुहिम को धक्का तो लगा है, पर इससे एक बार फिर उसका असली चेहरा सामने आ गया... ऐसा नहीं कि मक्की की करतूतों से चीन अनजान है... मक्की मुंबई हमले के साजिशकर्ता और इसे अंजाम देने वाले लश्कर के सरगना हाफिज सईद का करीबी रिश्तेदार है... वह जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमलों के लिए पैसा जुटाने और साजिश रचने, नौजवानों को आतंकी हिंसा के लिए उकसाने के काम करता रहा है... कई आतंकी मामलों में उसे पाकिस्तानी अदालत से सजा भी हो चुकी है... फिर भी चीन उसे आतंकी मानने को तैयार नहीं है तो जाहिर है कि वह खुद आतंकवाद का समर्थक है... विदित है कि अमेरिका ने भी मक्की पर बीस लाख डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है... आश्चर्य की बात तो यह कि अफगानिस्तान की सरकार में मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी को भी अमेरिका ने इनामी आतंकी घोषित किया हुआ है... लेकिन ये सारे आतंकी सरगना न सिर्फ दुनिया के आतंकवाद प्रभावित देशों को बल्कि संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक निकाय को अगर ठेंगा दिखा रहे हैं तो इसके पीछे निश्चित ही चीन और पाकिस्तान जैसे इनके रहनुमाओं की मेहरबानी है... हाल में ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, तीन और दक्षिण अफ्रीका) के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक में भी आतंकवाद का मुद्दा प्रमुखता के साथ उठा था...
दृष्टिकोण
मानसून का लंबा इंतजार...
देश में लू चल रही थी और तापमान पिछले रेकार्ड तोड़ रहा था, तब यही लग रहा था कि मानसून जल्द आए ताकि गर्मी से राहत मिल सके... शुरू में ऐसा होता दिखा भी... मौसम विभाग ने समय से तीन-चार दिन पहले ही मानसून के केरल पहुंचने की बात कही थी... वैसे केरल में मानसून जून के पहले हफ्ते में ही दस्तक देता है, पर इस बार मई के आखिरी हफ्ते में ही ज्यादातर जिले तरबतर हो गए... इसी से लगा था कि अबकी बार हर राज्य में मानसून समय से आ जाएगा... लेकिन भारतीय मौसम विभाग ने बताया है कि मानसून की रफ्तार उम्मीदों के मुताबिक नहीं है... उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में बारिश की शुरुआत तो हो गई, लेकिन मानसून पूरी तरह आ गया हो, ऐसा नहीं है... सबको मानसून का इंतजार है, खासतौर से किसानों को... राहत की बात बस यह है कि पश्चिमोत्तर और मध्यभारत में लू का दौर खत्म हो चुका है... कई जगहों पर आंधी-बारिश ने गर्मी से निजात दिलाई है... इसलिए मौसम विभाग का यह अनुमान सही लग रहा है कि आने वाले दिनों में गर्मी का दौर खत्म होगा और मानसूनी बारिश की झड़ी लगेगी... मानसून की पूर्वी शाखा चार दिन की देरी से चल रही है तो पश्चिमी शाखा की रफ्तार सामान्य है... जहां मानसून पहले आ चुका, वहां भी औसत से कम पानी पड़ा है... यानी कुल मिलाकर पिछले पंद्रह दिन में बारिश का स्तर सामान्य से कम रहा... वैसे देखें तो असम, मेघालय जैसे राज्यों में बारिश ने तबाही मचा रखी है... मेघालय के चेरापूंजी में शुक्रवार को नौ सौ बहत्तर मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो जून 1995 के बाद से सबसे ज्यादा है... सिक्किम और पश्चिमी बंगाल के कई इलाकों में मानसून की स्थिति अच्छी है। पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में भी पानी तो बरस रहा है, पर सामान्य से कम... मसलन, मणिपुर में पचास फीसदी, मिजोरम में छियालीस फीसदी और त्रिपुरा में अड़तीस फीसदी कम बारिश हुई...