बढ़ते संकट से सतर्कता जरूरी...
   Date15-Jun-2022

vishesh lekh
वैश्विक महामारी कोरोना से जैसे-तैसे पूरा विश्व उभर रहा है, लेकिन इस बीच जिस तरह का संकट बढ़ता नजर आ रहा है, उसे नजरअंदाज करना न केवल मानव जीवन के लिए घातक हो सकता है, बल्कि रोजगार, कारोबार और आर्थिक चहल-पहल के मान से भी इस बढ़ते संकट को किसी खतरे के रूप में देखते हुए आवश्यक सतर्कता हर हाल में बरतना हर किसी की सामूहिक जिम्मेदारी है... क्योंकि थोड़ी-सी चूक या लापरवाही कितने बड़े खतरे को आमंत्रण दे सकती है, यह हमने कोरोना की दूसरी-तीसरी लहर में देखा और भोगा है... किस तरह से चारों तरफ लाशों का मंजर नजर आ रहा था, एक-दूसरे के सहयोग के लिए हाथ तो उठ रहे थे, लेकिन आंसू पोंछने वाला कोई नहीं था... अगर उस खतरे को ध्यान में रख हम वापस मंडराते कोरोना के इस खतरनाक वायरस से सतर्कता रखने की पहल करते हैं, सार्वजनिक स्थानों पर भीड़भाड़ में आवश्यक नियमों का पालन करते हैं तो हम न केवल सुरक्षित रहेंगे, बल्कि अपने और परिजनों को भी सुरक्षित रखने में योगदान दे सकेंगे... क्योंकि कोरोना के नए मामले सप्ताहभर में दो गुने से अधिक हो चुके हैं... जो मामले साढ़े तीन से चार हजार प्रतिदिन आ रहे थे, वह 10 हजार को पार कर चुके हैं... जबकि कोरोना संक्रमण की दर भी 2.71 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है... महाराष्ट्र, केरल और दिल्ली में सबसे तेज मामले बढ़ रहे हैं... विशेषज्ञों का तो यह तक मानना है कि आने वाले समय में जब मौसम बदलेगा, तब कोरोना से जुड़े मामले और तेजी से बढ़ेंगे... लेकिन किसी तरह की लहर की आशंका नहीं है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी एक बड़ी आबादी देश का भविष्य है, जिसे हम नौनिहाल के रूप में देखते हैं... वह टीके से अभी वंचित है... ऐसे में उस आबादी पर कोरोना के ओमिक्रॉन के नए रूप का खतरा स्वभाविक बढ़ सकता है... तभी तो केन्द्र सरकार को सोमवार को एडवाइजरी जारी करके राज्यों को यह कहना पड़ रहा है कि स्कूलों में बच्चों को टीका लगवाने पर जोर दें... यही नहीं, बढ़ते मामलों और बढ़ती जांच प्रक्रिया के बीच उन्होंने चिंता जताते हुए यह तक कह डाला है कि कोरोना महामारी का खतरा अभी टला नहीं है... क्योंकि कुछ राज्यों में जिस तेजी से मामले बढ़ रहे हैं, इसके बाद स्थिति और गंभीर होती जा रही है... इससे बचने के लिए सामूहिक सतर्कता, नियमों का पालन और सुरक्षा कवच के रूप में बच्चों तक टीका पहुंचाने की पहल को एक बड़े अभियान के रूप में लेना होगा... क्योंकि मौसम के बदलाव के साथ भी कई बार सामान्य बीमारी जैसे सर्दी, खांसी व बुखार के मामले बढ़ते हैं और अगर इसी बीच किसी तरह का वायरस सक्रिय होता है तो लोगों में स्वाभाविक रूप से भय का माहौल निर्मित होगा ही...
दृष्टिकोण
आरक्षण की बैसाखी का मोह...
शिक्षा, नौकरी, चुनाव से लेकर तमाम तरह की सरकारी सुविधाओं को पाने के लिए आरक्षण को ही आधार बनाया जाता है... आरक्षण की यह विषबेल एक ऐसी बैसाखी का रूप ले चुकी है, जिसके मोह में हर कोई अपना सब कुछ दांव पर लगाकर समाज-राष्ट्र की टूटन के लिए कार्य करता नजर आता है... आखिर आरक्षण की मांग करते हुए सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने का खेल हो या फिर वे सभी हथकंडे जिनके द्वारा सामान्य आवागमन प्रभावित होता है, परिवहन व्यवस्था बाधित होती है... ऐसे आरक्षण की बैसाखी का मोह पालना वास्तव में स्वयं की प्रतिभा और योग्यता पर सवालिया निशान लगाकर पूरे समाज को अकर्मण्यता की तरफ बढ़ाते हुए न केवल उन्हें काम के बजाय मुफ्त का लूटने-लुटाने की प्रवृत्ति की तरफ धकेलने जैसा है... बल्कि इसके कारण आपस में समाज में ही एक बड़ी खाई का निर्माण हो रहा है... जो आरक्षण का लाभ लेकर आगे बढ़ रहा है, वह आरक्षण से वंचित तबके को मानो मुंह चिढ़ाता है और बाद में वही दूसरा तबका भी आरक्षण की बैसाखी के जरिये अपना हित संवर्धन देखता नजर आता है... राजस्थान में आरक्षण की मांग को लेकर दो दिन से नेशनल हाईवे 21 (आगरा-जयपुर) को जाम करके रखा हुआ है... क्योंकि माली, कुशवाह, शाक्य, मौर्य समाज 12 फीसदी आरक्षण की मांग को लेकर सड़कों पर लाठी-डंडे लेकर खड़े हैं... चुनाव में आरक्षण समझ आता है, लेकिन योग्यता के मान से किसी को सरकारी नौकरी या पदोन्नति में आरक्षण उचित कैसे हो सकता है..? आरक्षण का आधार आर्थिक हो, लेकिन किसी सामान्य को ओबीसी में या ओबीसी को दलित में लाने की यह आरक्षण बैसाखी समाज को आपस में ही एक-दूसरे का दुश्मन बना रही है...