पुण्य का संतोष
   Date15-Jun-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
म हापराक्रमी और पुण्यात्मा विद्रुध समयानुसार दिवंगत हुए और अपने सत्कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग में सुखों का भोग करने लगे। सुख-साधन बहुत और परमार्थ के अवसर नगण्य-ऐसे स्वर्ग में उनका दम घुटने लगा। आत्मा को सुख से नहीं, पुण्य से शांति मिलती है। 'जहां सुख हो, पर पुण्य करने का संतोष लाभ न मिले, ऐसे स्वर्ग में रहकर मैं क्या करूंगा?Ó यह चिंता उन्हें निरंतर सताने लगी। उन्हें खिन्न देखकर देवराज इंद्र ने उनसे उनकी खिन्नता का कारण पूछा तो उन्होंने उनसे अपने मन की व्यथा कह सुनाई। बोले-'मुझे सुख नहीं, शांति चाहिए। मैं विलास नहीं, परमार्थ की कामना रखता हूं।Ó उनकी इस पुनीत अभिलाषा को देवगुरु बृहस्पति ने बहुत सराहा और कहा-'सुख-सुविधा से भरे हुए स्वर्ग की अपेक्षा तपस्वियों का तपलोक अधिक श्रेष्ठ है। विद्रुध देवताओं से अधिक श्रेष्ठ हैं, इसलिए उन्हें वहां भेजा जाए, जहां पुण्य-परमार्थ और सेवा-साधना के ज्यादा अवसर उपलब्ध हैं। ऐसा तपलोक ही श्रेष्ठ आत्माओं के लिए उपयुक्त है।Ó सभा में उपस्थित देवताओं ने पूछा-'तपलोक कहां है देवगुरु?Ó देवगुरु ने कहा-'मनुष्यलोक ही तपलोक है। उच्चकोटि के देवता वहां निवास करते हैं। सेवा और संयम से प्राप्त होने वाला संतोष इस स्वर्ग में कहां! वह अवसर तो केवल भूलोक के निवासी मनुष्यरूपी देवताओं को ही उपलब्ध है।Ó विद्रुध की महानता के आगे देवताओं के मस्तक झुक गए। पुण्य-परमार्थ का संतोष लाभ करने के लिए पुन: भूलोक भेज दिया गया। लौटने पर उन्होंने पश्चाताप का नहीं, प्रसन्नता का ही अनुभव किया।