स्वचेतना के विकास का सूत्र योग
   Date15-Jun-2022

dharmdhara
धर्मधारा
यो ग मानवता की प्राचीन पूंजी है। मानव द्वारा संगृहीत सबसे बहुमूल्य खजाना है। मनुष्य तीन तत्वों से बना है-शरीर, मन और आत्मा। अपने शरीर पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण और अपनी अंतरात्मा की आवाज को पहचानना-इस प्रकार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक इन तीनों अवस्थाओं का संतुलन ही योग है। योग मानव शरीर को स्वस्थ और निरोगी बनाता है एवं मनुष्य को बाहरी तनाव, शारीरिक विकारों से मुक्ति दिलाता है। योगासनों के नियमित अभ्यास द्वारा शरीर के विभिन्न जोड़ तथा मेरूदंड स्वस्थ, लचीले तथा सक्रिय बनते हैं।
इनके द्वारा ग्रंथियों के मूल स्थान की सूक्ष्म आंतरिक मालिश होती है, जिससे अनेक शारीरिक समस्याएं दूर होती हैं। शरीर के अंगों तथा अन्य प्रणालियों के बीच स्वास्थ्य संतुलन भी कायम होता है। इसी क्रम में प्राणायाम का महत्व भी कम नहीं है। वह हमारे फेफड़ों को शुद्ध कर प्राणवायु की आपूर्ति कराने में सहायता करता है एवं इस तरह से व्यक्ति को आरोग्य तथा स्वास्थ्य प्रदान करता है। इन सारी क्रियाओं का हमारे मस्तिष्क तथा भावनाओं पर भी हितकारी प्रभाव पड़ता है। शोधार्थी द्वारा प्रयुक्त यौगिक क्रियाओं में से कुंजल क्रिया अमाशय से मुंह तक अन्न नली की सफाई करती है। इसका अभ्यास खाली पेट ही किया जाता है। यह क्रिया पाचन-क्रिया में बहुत सहायक होती है तथा शरीर के कार्य को संतुलित रखती है। अग्निसार का अभिप्राय अंत:धौति क्रिया से है। अग्नि का अर्थ स्पष्ट है। सार का अर्थ होता है-तत्व। इस तरह अग्निसार का अर्थ है जिस क्रिया द्वारा जठराग्नि को तीव्र करके पाचन शक्ति को बढ़ाया जाए। धौति का अर्थ होता है-धोना। इस तरह यह क्रिया शरीर की अशुद्धियों को धोकर बाहर निकालने का काम करती है। इस क्रिया में पेट का प्रसारण व संकुचन किया जाता है, जिससे पेट के सभी अंगों की मालिश होती है और सभी आंतरिक अंग सुव्यवस्थित होते हैं, उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है और भोजन पचाने में सहयोग मिलता है। प्राणायामों में शीतली प्राणायाम को एक महत्वपूर्ण क्रिया के रूप में जाना जाता है। शीतली का अर्थ है शीतल। इसका अर्थ शांत, विरक्त और भावहीन भी होता है।