हाईब्रिड खतरों से निपटने प्रशासन और सेनाओं के बीच तालमेल जरूरी-राजनाथ
   Date14-Jun-2022

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नई दिल्ली द्य 13 जून (वा)
रक्षामंत्री राजनाथसिंह ने हाइब्रिड खतरों से निपटने के लिए नागरिक प्रशासन और सशस्त्र सेनाओं के बीच सामंजस्य तथा तालमेल को बेहद जरूरी करार देते हुए कहा कि इसके बिना एक राष्ट्र के रूप में खतरों और चुनौतियों का जवाब देना मुश्किल है।
श्री सिंह ने सोमवार को मसूरी में लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में 28 वें संयुक्त नागरिक-सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार पुराने दृष्टिकोण को पीछे छोड़कर नई दृष्टि से एकीकरण यानी मिलकर काम करने की दिशा में बढ़ रही है और इसी का परिणाम है कि समाज के हर वर्ग को विकास का लाभ मिल रहा है। उन्होंने कहा कि एक समग्र दृष्टिकोण के अभाव और 'अकेले-अकेलेÓ काम करने के चलते देश के सभी हिस्सों में विकास समान रूप से नहीं पहुंच पाया। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस तरह के पुराने दृष्टिकोण को हटाकर एक नई दृष्टि के साथ कार्य करने पर जोर दिया। प्रधानमंत्री की एप्रोच है कि 'अकेले-अकेलेÓ में काम न करके मिलकर के साथ काम किया जाए। अब हम जिस नए एप्रोच के साथ कार्य कर रहे हैं, उसमें समाज का हर वर्ग विकास की ओर आगे बढ़ रहा है। श्री सिंह ने कहा कि अभी भारत न केवल अपने लिए सैन्य साजोसामान बना रहा है, बल्कि दूसरे देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी उत्पादन बढ़ा रहा है।
उन्होंने कहा कि इसी तरह ग्रे जोन टकराव से निपटने के लिए और राष्ट्रीय सुरक्षा को और सुदृढ़ करने के लिए भी हम एकीकरण की ओर आगे बढ़ रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में संयुक्त नागरिक- सैन्य कार्यक्रम के महत्व को समझा जा सकता है।
बड़ी शक्तियों ने भी पूर्ण युद्ध को टालने का काम किया
रक्षामंत्री ने कहा कि पिछले कुछ दशकों पर नजर डालें तो पता चलता है कि बड़ी शक्तियों ने भी पूर्ण युद्ध को टालने का काम किया है और इसलिए इसकी जगह छद्म और परोक्ष युद्धों ने ले ली है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से आर्थिक दबाव को भी सैन्य बल के अलावा एक प्रमुख बल के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि साइबर और सूचना भी इसी तरह की ताकतें हैं, जो खुली आंखों के सामने भी धोखा देने की क्षमता रखती हैं। सेनाओं के आधुनिकीकरण और रक्षा क्षेत्र की आत्मनिर्भरता के लिए जो-जो कदम उठाए गए हैं, उनके परिणाम हमारे सामने आने शुरू हो गए हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा अब पहले से अधिक व्यापक
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में एकीकरण की बात और अधिक प्रासंगिक तथा आवश्यक हो जाती है, साथ ही उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा अब पहले से बहुत अधिक व्यापक हो गई है। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर तो इसे सैन्य हमलों से अपनी सुरक्षा से जोड़ा जाता है, पर अब इसमें अनेक असैन्य पहलू भी जुड़ गए हैं। युद्ध और शांति दो अलग स्थिति न होकर अब 'कंटिन्यूअमÓ यानी एक तरह से 'मिलÓ गए हैं। शांति के दौरान भी अनेक मोर्चों पर युद्ध चलते रहते हैं। इनके बीच की सीमा काफी धुंधली हो गई है।