तकनीक को अभिशाप बनने से बचाने की जरूरत
   Date14-Jun-2022

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संजय वर्मा
ड्रो न सुशासन और सरकारी कामों की गति बढ़ाने में भी मददगार साबित हो रहे हैं। इनके बल पर एक बड़ा सपना यह देखा जा रहा है कि जल्दी ही भारत ड्रोन के उत्पादन और इस्तेमाल की धुरी बन सकता है। इसका फायदा देश के रोजगार क्षेत्र को भी होगा, ठीक वैसे ही जैसे अस्सी-नब्बे के दशक में जब देश में कम्प्यूटर आए तो ये मशीनें न सिर्फ हमारी व्यवस्था और जीवन का जरूरी अंग बन गईं, बल्कि रोजगार का पूरा परिदृश्य ही बदल गया।
विज्ञान और तकनीक के मामले में अकसर यह बात कही जाती रही है कि अगर वह एक वरदान है तो कुछ अभिशाप भी उसके साथ जुड़े हैं। डायनामाइट, परमाणु ऊर्जा से लेकर इंटरनेट के आविष्कार तक को लेकर यह बात सही साबित हुई है। इधर, दुनिया में जब से कृत्रिम मेधा (आईई) की मदद से चलने वाले हथियारों की होड़ शुरू हुई है तो खतरा ज्यादा बढ़ गया है। तकनीक की यह होड़ सिर्फ देशों की सेनाओं के बीच ही नहीं है, बल्कि नागरिक जीवन में इसका असर दिखने लगा है। तकनीक का दिनोंदिन सस्ता होते जाना यह संभव कर रहा है कि वह आम लोगों के हाथों में पहुंच जाए, पर खतरा यह है कि कहीं वह आतंकियों-अपराधियों के हाथ में न पड़ जाए। ऐसा ही मामला ड्रोन तकनीक का है।
हालांकि अभी तक ज्यादातर संदर्भों में ड्रोन के इस्तेमाल के सकारात्मक पहलू ही सामने आए हैं। जैसे किसी स्थान की निगरानी करने, विकास संबंधी गतिविधियों का पता लगाने, नक्शे तैयार करने और अपराधियों की धरपकड़ जैसे कार्यों में ड्रोन का प्रयोग किया जाने लगा है। समस्याग्रस्त इलाकों में ड्रोन से निगरानी का काम कई देशों की पुलिस की कार्यशैली में शामिल हो चुका है, पर ड्रोन का महत्व इससे भी ज्यादा हो सकता है। दरअसल, निगरानी के काम के लिए ड्रोन तकनीक का उपयोग जिस तेजी से बढ़ रहा है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। जैसे- पीएम स्वामित्व योजना के तहत देश के गांवों की हर संपत्ति का डिजिटल नक्शा तैयार किया जा रहा है। इससे जमा की गई सूचनाओं के आधार पर डिजिटल संपत्ति कार्ड लोगों को दिए जा रहे हैं। यानी ड्रोन सुशासन और सरकारी कामों की गति बढ़ाने में भी मददगार साबित हो रहे हैं। इनके बल पर एक बड़ा सपना यह देखा जा रहा है कि जल्दी ही भारत ड्रोन के उत्पादन और इस्तेमाल की धुरी बन सकता है। इसका फायदा देश के रोजगार क्षेत्र को भी होगा, ठीक वैसे ही जैसे अस्सी-नब्बे के दशक में जब देश में कम्प्यूटर आए तो ये मशीनें न सिर्फ हमारी व्यवस्था और जीवन का जरूरी अंग बन गईं, बल्कि रोजगार का पूरा परिदृश्य ही बदल गया। विभिन्न क्षेत्रों में ड्रोन के इस्तेमाल की सूची बनाना चाहें, तो कई काम हैं, जहां ड्रोन पहले से ही काम में प्रयोग में लिए जा रहे हैं। पुलिस और सेना के लिए निगरानी, गोदामों में सामान पर नजर, जमीनों पर अतिक्रमण का पता लगाने और सर्वेक्षण संबंधी जानकारी जुटाने के लिए, गहरी सुरंगों या ऊंचे टॉवरों के भीतर जाकर हालात का मुआयना करने, वीडियो या फिल्म की शूटिंग करने आदि के लिए अलग-अलग किस्म के ड्रोन मौजूद हैं।
वन्यजीव अभयारण्यों में शिकारियों पर नजर रखने के लिए सबसे पहले काजीरंगा नेशनल पार्क के सुरक्षा अधिकारियों ने वर्ष 2013 में ड्रोन का उपयोग शुरू किया था। खेती बचाने में ड्रोन कैसे उपयोगी साबित हो सकता है, इसकी मिसाल सबसे पहले फ्रांस में देखने को मिली थी। बताते हैं कि फ्रांस के शहर बोर्डेक्स में वाइन बनाने वाली एक कंपनी ने अंगूरों को संक्रमणों से बचाने के लिए कैमरे लगे ड्रोन का इस्तेमाल किया था। ये ड्रोन अपनी उड़ान के दौरान अंगूरों की बेलों की काफी करीब से तस्वीरें खींचते हैं। इससे पता लग जाता है कि कहीं फसलें सडऩे तो नहीं लगी हैं।
यदि बात खेलों के सीधे प्रसारण की जाए, तो वर्ष 2012 में रूपर्ट मर्डोक की कंपनी फाक्स स्पोर्ट्स आस्ट्रेलिया ने एक क्रिकेट मैच के प्रसारण के लिए पहली बार एक कैमरायुक्त ड्रोन का इस्तेमाल किया था। वर्ष 2013 में एक रग्बी मैच में भी इस तरह का प्रयोग किया गया। इन हवाई मशीनों के इस तरह के इस्तेमाल से लोगों को अपने मनपसंद खेल को उस कोण से देखने का भी मौका मिलना संभव हो गया, जिससे अभी तक वे वंचित थे।
इतना ही नहीं, आठ साल पहले पेट्रोलियम कंपनी बीपी ने अलास्का में एक ड्रोन का इस्तेमाल यह पता लगाने में किया था कि सुदूर सुनसान इलाकों में फैली पाइप लाइनों में किसी किस्म की खराबी तो नहीं आई। कड़कड़ाती ठंड और तेज हवाओं के मद्देनजर पाइप लाइनों पर सतत नजर नहीं रखी जा सकती है। इन स्थितियों में ड्रोन काफी काम आते हैं। प्राकृतिक आपदाओं में भी ड्रोन का बखूबी इस्तेमाल किया जाता है। साल 2013 में उत्तराखंड में विनाशकारी बाढ़ के बाद ड्रोन की मदद से ही पहाड़ों, जंगलों और सुनसान जगहों पर फंसे लोगों की तलाश की गई थी। ड्रोन उन इलाकों में भी जाने में सक्षम होते हैं, जहां हेलिकाप्टर नहीं पहुंच पाते हैं, पर इन सारे उदाहरणों से अलग ड्रोन इस्तेमाल को लेकर कुछ खतरे भी सामने आए हैं। खतरा ड्रोन तकनीक का आतंकी हाथों में पड़ जाना और शत्रु देशों द्वारा उनका इस्तेमाल किए जाने को लेकर ज्यादा है। पिछले साल 27 जून को जम्मू के वायुसेना स्टेशन पर ड्रोन से किए गए आतंकी हमले ने इस धारणा को खंडित कर दिया था कि हमारे सैन्य प्रतिष्ठान आसमान के रास्ते की जाने वाली आतंकी कोशिशों से पूरी तरह महफूज हैं। आतंकियों ने सेना के महंगी लागत वाले उपायों को बेहद कम लागत वाले हल्के ड्रोन से विस्फोटक गिराकर साबित कर दिया था कि व्यवस्था में सेंध लगाने के लिए ऊंची लागत के इंतजामों की जरूरत नहीं है। ड्रोन का इस्तेमाल अगर आतंकी कर पा रहे हैं, तो यह उनके हाथों में परमाणु बम पड़ जाने से कम नहीं है।
यह निश्चय ही सेना की ओर बरती जा रही सावधानी का नतीजा है कि आतंकवादी अब किसी जगह पर कोई वारदात खुद सामने आकर करने से पहले सौ बार सोचते हैं। किसी सार्वजनिक स्थान या राष्ट्रीय महत्व के सरकारी अथवा सैन्य प्रतिष्ठान की सुरक्षा में सेंध लगाना आतंकियों के लिए पहले जैसा आसान नहीं रह गया है। ऐसा करने में उन्हें भारी जोखिम उठाना पड़ता है और मारे जाने का खतरा भी रहता है, लेकिन ड्रोन ने अब उन्हें वे हाथ-पांव दे दिए हैं, जिनके सहारे वे ज्यादा कोई जोखिम लिए बिना सुरक्षा में सेंध लगा सकते हैं और हमले कर सकते हैं। आज के हालात में किसी भी स्थान को आतंकियों के दायरे से बाहर नहीं माना जा सकता। ड्रोन से किए जाने वाले हमलों में आतंकियों को मारे या पकड़े जाने का डर नहीं होता है। फिर यह उपाय है भी कम खर्चीला। इन हमलों में सीमा पार के आतंकी संगठनों की संलिप्तता को उजागर करना भी थोड़ा मुश्किल है। चूंकि ड्रोन बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हैं, इसलिए राडार की जद में भी नहीं आते। ऐसे में विशेषज्ञों का यह आकलन निराधार नहीं है कि भविष्य में ड्रोन हमलों की संख्या में इजाफा हो सकता है। जहां तक आतंकियों के भेजे ड्रोन से मुकाबले का सवाल है तो भारतीय सेना छोटे आकार के कुछ इजरायली ड्रोन (स्मैश-200 प्लस) का आयात कर रही है। इन्हें बंदूकों या राइफलों पर लगाया जा सकता है। इनसे हमलावर छोटे ड्रोन को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। फिलहाल हमारा देश ऐसे खतरों से निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं है, लेकिन इन घटनाओं से सबक लेकर यदि बेहद कड़े प्रबंध किए जाते हैं और आतंकी मंसूबों को धराशायी किया जाता है, तो भी यह राहत की बात होगी। निश्चय ही यह काम नीतिगत स्तर पर ड्रोन तकनीक को बढ़ावा देकर और सरकारी तंत्र की गंभीर कोशिशों के साथ सम्पन्न होगा, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि बात को ड्रोन महोत्सवों से आगे बढ़ाया जाए और योजनाओं को त्वरित गति के साथ अमली जामा पहनाया जाए।
(लेखक स्तंभकार हैं)