जैव अर्थव्यवस्था का समय...
   Date13-Jun-2022

vishesh lekh
जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने पिछले कुछ सालों में जिस तेजी से तरक्की की है, भारत के लिए वह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है... आठ साल के भीतर यह क्षेत्र आठ गुना बढ़ गया... यह इस बात का संकेत है कि आने वाले वक्त में देश की अर्थव्यवस्था में जैव प्रौद्योगिकी और इससे सृजित होने वाली जैव अर्थव्यवस्था की भूमिका बढ़ती जाएगी... इसीलिए प्रधानमंत्री ने गुरुवार को दिल्ली में बायोटेक स्टार्टअप एक्सपो के उद्घाटन के मौके पर इसे विकास का बड़ा जरिया बताया... आठ साल पहले देश की अर्थव्यवस्था में जैव अर्थव्यवस्था की भागीदारी सिर्फ दस अरब डॉलर की थी, जो अब अस्सी अरब डॉलर से भी ऊपर निकल चुकी है... भारत के लिए यह सुखद संकेत इसलिए भी है कि अब हम दुनिया के उन देशों में शुमार हो सकेंगे, जो जैव प्रौद्योगिकी में पहले से परचम लहरा रहे हैं... हालांकि भारत को इस दिशा में अभी काफी काम करना है, पर जैव अर्थव्यवस्था में वृद्धि की रफ्तार से यह तो सुनिश्चित हुआ ही है कि हमारे यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है... हम इस क्षेत्र में आगे निकलने के लिए वे सारी योग्यताएं रखते हैं और उन मानदंडों पर खरे उतरते हैं, जो वैश्विक कारोबार के लिए जरूरी हैं... देखा जाए तो जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र भारत के लिए ज्यादा पुराना नहीं है... लेकिन कुछ ही सालों में इस क्षेत्र का जिस तेजी से विस्तार हुआ है, वह इसके भविष्य की संभावनाओं को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है... आज तमाम दवा कंपनियां, चिकित्सा उपकरण बनाने वाली कंपनियां, टीका निर्माता कंपनियां आदि सब जैव प्रौद्योगिकी के विकास की बदौलत ही कामयाबी के शिखर पर हैं... इतना ही नहीं, कृषि क्षेत्र की सूरत बदलने, बीजों के विकास से लेकर खेती के तौर-तरीकों में बदलाव जैव प्रौद्योगिकी की ही करामात है... पिछले दो सालों में कोरोना महामारी के दौरान दुनिया ने यह देखा है कि टीकों के विकास में इस क्षेत्र ने कितना बड़ा योगदान दिया... अगर आज जैव प्रौद्योगिकी का इतना विकास नहीं हुआ होता तो क्या यह संभव हो पाता कि कुछ ही महीनों में कोरोना से बचाव के टीके विकसित कर लिए जाते..? बल्कि जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र के विकास और इसमें मौजूद अपार क्षमताओं की वजह से ही आज भारत उन कुछ देशों की कतार में खड़ा है, जिन्होंने दुनिया को कोरोना से बचाव के टीके मुहैया करवाए... भारत में जैव प्रौद्योगिकी उद्योग की बढ़ती रफ्तार इसके फैलते बाजार का भी संकेत है... ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि अगले दस सालों में देश में मरीजों की संख्या में बीस फीसदी की वृद्धि का अनुमान है... जाहिर है, स्वास्थ्य क्षेत्र के समक्ष चुनौतियां लगातार बढ़ेंगी...दवाओं और चिकित्सा सामग्री की मांग और खपत में इजाफा होगा... ऐसे में जैव प्रौद्योगिकी उद्योगों को बढ़ावा दिए बिना इस चुनौती से निपटना संभव नहीं होगा...
दृष्टिकोण
पर्यावरण और लापरवाही...
एक बार फिर भारत पर्यावरणीय प्रदर्शन में फिसड्डी साबित हुआ है... एक सौ अस्सी देशों की सूची में वह सबसे नीचे है... येल और कोलंबिया विश्वविद्यालय की तरफ से एक सौ अस्सी देशों की पर्यावरणीय स्थिति को लेकर कराए गए अध्ययन से यह बात स्पष्ट हुई है... इस अध्ययन में भारत के अलावा रूस और चीन की स्थिति भी चिंताजनक है... जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर 2050 तक अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में पचास फीसदी तक कटौती करने का संकल्प लिया है... मगर ताजा अध्ययन से जाहिर है कि 2050 तक भारत और चीन दुनिया के सर्वाधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश होंगे... हालांकि कई बार पर्यावरण संबंधी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अध्ययनों को संदेह की नजर से देखा जाता है, उनमें विकासशील देशों पर दबाव बनाने की मंशा भी होती है... मगर भारत के संबंध में पर्यावरण प्रदूषण को लेकर यह बहुत चौंकाने वाला आंकड़ा नहीं है। समय-समय पर इसे लेकर अध्ययन आते रहते हैं और प्राय: सभी इस दिशा में सुधार लाने की जरूरत रेखांकित करते रहे हैं... हालांकि भारत में स्वच्छ ईंधन और सौर ऊर्जा जैसे उपायों पर तेजी से अमल किया जा रहा है, पर वाहनों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कार्बन पर काबू पाना बड़ी चुनौती बना हुआ है... दुनियाभर में गहराता जलवायु संकट नि:संदेह चिंता का विषय है, इस पर काबू पाने के मकसद से ही सारे देशों ने मिलकर कार्बन उत्सर्जन में कटौती का संकल्प लिया... मगर यह थोड़ा पेचीदा काम रहा है... कार्बन उत्सर्जन में कटौती के उपाय लागू करने का अर्थ है कि अपने यहां अनेक औद्योगिक और विकास संबंधी गतिविधियों पर अंकुश लगाना...