ईश्वरीय अनुभूति का मार्ग श्रद्धाभाव
   Date13-Jun-2022

dharmdhara
धर्मधारा
ई श्वर सर्वव्यापी है, सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और सर्वसमर्थ भी। संसार में जो भी कुछ है, वह सब ईश्वर की ही देन है। यह सारा संसार, यह समस्त सृष्टि भी स्वयं ईश्वर की ही रचना है। जब सब कुछ ईश्वर का ही है, तब हम ईश्वर की पूजा-आराधना भला किस प्रकार और किन सामग्रियों से करें, क्योंकि वे सारी सामग्रियां, यथा-पुष्प, विल्वपत्र, फल आदि तो ईश्वर को स्वत: ही समर्पित हैं। शास्त्रों में ईश्वर की पूजा आराधना के विविध विधि-विधान बताए गए हैं। उन्हीं में से एक है मानस पूजा। मानस पूजा अर्थात मन से भगवान की पूजा। कहते हैं पूजन के विधि-विधानों में मानस पूजा सर्वश्रेष्ठ व सबसे अधिक प्रभावशाली है। भौतिक सामग्रियों से की गई ईश्वर की पूजा की अपेक्षा मन से की गई ईश्वर की पूजा को करोड़ों गुना अधिक फलदायी व प्रभावकारी बताया गया है। मन:कल्पित यदि एक पुष्प भी चढ़ा दिया जाए तो वह एक पुष्प भी करोड़ों बाह्य पुष्पों के बराबर होता है। भौतिक सामग्रियों से ईश्वर की पूजा का अपना महत्व तो है ही, पर मानस पूजा के बिना भौतिक सामग्रियों से की गई पूजा भी प्रभावकारी नहीं हो पाती है। क्यों? क्योंकि ईश्वर तो भाव के भूखे हैं, पदार्थ के नहीं। यदि वे भाव के भूखे न होते तो शबरी के जूठे बेरों को भी स्वीकार कर उसे नवधा भक्ति भला क्यों और कैसे प्रदान करते? फिर वे सूरदास की बांह भी क्यों पकड़ते? दुर्योधन के छप्पन भोग का परित्याग कर विदुर की पत्नी के हाथों केले के छिलके का भोग भला क्यों और कैसे स्वीकार करते? वस्तुत: भगवान को किसी वस्तु अथवा पदार्थ की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं। संसार में ऐसे दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं, जिनसे परमेश्वर की पूजा की जा सके। इसलिए शास्त्रों में मानस पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। मानस पूजा में भक्त अपने आराध्य को मुक्तामणियों से मंडित कर स्वर्णसिंहासन पर विराजमान करता है। स्वर्गलोक की मंदाकिनी गंगा के शीतल जल से अपने आराध्य को स्नान कराता है, कामधेनु गौ के दुग्ध से पंचामृत का निर्माण करता है। वस्त्राभूषण भी दिव्य व अलौकिक होते हैं। वह पृथ्वीरूपी गंध का अनुलेपन करता है। अपने आराध्य के लिए कुबेर की पुष्पवाटिका से स्वर्णकमल पुष्पों का चयन करता है। साधक अपने आराध्य से प्रेम की अनंत गहराइयों में उतरकर भावपूर्वक कहता है
हे प्रभो! मैं पृथ्वीरूपी गंध (चंदन) आपको अर्पित करता हूं। प्रभो! मैं आकाशरूपी पुष्प आपको अर्पित करता हूं। प्रभो! मैं वायुदेव के रूप में धूप प्रदान करता हूं। प्रभो! मैं अग्निदेव के रूप में दीपक प्रदान करता हूं। हे प्रभो! मैं अमृत के समान नैवेद्य आपको निवेदित करता हूं। हे प्रभो! मैं सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूं। हे प्रभो! अब मेरा अपना कुछ भी नहीं, मैंने अपना तन-मन सब कुछ आपको ही समर्पित कर दिया है। हे प्रभो! आप इसे स्वीकार करें।