यह तो अराजकता की हद...
   Date11-Jun-2022

vishesh lekh
भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा एवं नवीन जिंदल को लेकर जिस तरह का हिंसक व अराजक प्रदर्शन सप्ताहभर बाद भारत में देखने को मिल रहा है...यह उस अराजकता की हद है, जिसका कोई तार्किक कारण नहीं है..,कोई तथ्य नहीं और ऐसा कोई आधार नहीं..,जिसकी आड़ में इस तरह के अराजक प्रदर्शन को सही ठहराने के लिए मुस्लिमों का देशभर में व्यस्ततम मार्गों पर घंटों प्रदर्शन करते हुए हालात बिगाडऩे का खेल खेला गया...इसमें उस साजिश की बू भी आती है कि जिसके द्वारा पूरे देश में शांति भंग करने की खुराफात की जा रही है...आखिर नुपूर शर्मा ने पैगंबर मोहम्मद को लेकर जिस तरह की कुरान में दर्ज हदीसों को पढ़कर अपनी बात रखी, उसके बाद उन पर सिरे से लगा यह आरोप तो खारिज हो ही जाता है कि उन्होंने किसका और कैसा अपमान किया..? क्योंकि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ऐसा कुछ भी नहीं कहा, जिससे किसी का अपमान होता है, जो कुरान में उल्लेखित है... उसको बयां करना अगर किसी का अपमान है तो उस हदीस को कुरान से हटाने के लिए पहले इस तरह का हिंसक आंदोलन होना चाहिए...जब यह कार्रवाई पूरी हो जाए तो देश के मुस्लिमों को नुपूर शर्मा और नवीन जिंदल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए अराजक व्यवहार, हिंसक प्रदर्शन छोड़कर शांतिपूर्ण अनशन की राह पकडऩा चाहिए...कितना हास्यास्पद मामला है कि नुपूर शर्मा ने क्या बोला और क्यों बोला...इसको लेकर भारत के तथाकथित तमाम कट्टरपंथी मुस्लिम चार दिन तक सोते रहे और जब अरब देशों की तरफ से इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया आई, विरोध जताया गया, तब जाकर भारत के तथाकथित मुस्लिमों को इस बात का भान हुआ कि उनके पैगंबर मोहम्मद के विषय में किसी ने अपमानजनक बयानबाजी की है और वे कूद पड़े सप्ताहभर बाद में देशभर में अराजकता की हद को पार करते हुए जबरिया आक्रोश दिखाने के लिए... आखिर जुम्मे के दिन मुस्लिमों को नमाज अता करने के बजाए ऐसा क्या सूझा कि वे कानपुर, मेरठ, आगरा, अलीगढ़, वाराणसी, प्रयागराज, बरेली, दिल्ली समेत तमाम मुस्लिम बाहुुल्य इलाकों में घंटों सड़कें जाम करते रहे...ये ही नहीं, पश्चिम बंगाल में तो हावड़ा में भी नेशनल हाईवे को बंद करके आगजनी भी की गई...उधर जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में मस्जिद से भड़काऊ भाषणबाजी की गई...दिल्ली में भी बड़ी संख्या में आक्रोशित मुस्लिम सड़कों पर नजर आए...क्या इस तरह की हिंसा एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा नहीं है...जिसमें शांतिपूर्ण आंदोलन या आक्रोश जताने के बजाए मुख्य मार्गों पर जाम लगाकर आमजनों को परेशान करने का खेल खेला जा रहा है...यह तो आक्रोश की आड़ में मुस्लिमों का प्रशासन को आ बैल मुझे मार...वाली कहावत को चरितार्थ करता है...
दृष्टिकोण
महंगाई और महंगा कर्ज...
महंगाई को काबू करने के लिए केंद्र सरकार ने एक तरफ पेट्रोल-डीजल के दामों में रिकार्ड सात से दस रुपए प्रति लीटर की कटौती की थी...वहीं राज्यों ने भी अपने-अपने स्तर पर वैट घटाकर लोगों को पेट्रोलियम वृद्धि से राहत देने का प्रयास किया...लेकिन अभी भी बहुत सारे राज्यों में इस दिशा में कदम नहीं उठाया है...ऐसे में पेट्रोल-डीजल, ईंधन, रसोई गैस, सीएनजी समेत तमाम उत्पादों के दाम बढ़े होने के कारण महंगाई को पंख लगे हुए हैं.., क्योंकि मालभाड़ा, परिवहन व सुविधाओं की प्राप्ति में यह पेट्रोल-डीजल की वृद्धि महंगाई की आग में घी का काम करती है...इसके कारण रोजमर्रा के उपयोग में आने वाली वस्तुओं के दाम ही नहीं..,अन्य तरह की महंगाई भी कुलांचे भर रही है...दूसरी तरफ महंगाई को साधने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने प्रमुख नीतिगत दरों रेपो 0.50 फीसदी से बढ़ाकर 4.9 फीसदी किया...ध्यान रहे पांच सप्ताह में ये दूसरी बार बढ़ोतरी है...इसके पीछे आरबीआई का तार्किक पक्ष यह था कि मुद्रास्फीति पर काबू और वृद्धि को समर्थन के लिए केंद्रीय बैंक अपने उदार नीतिगत रुख को वापस ले रहा है...क्योंकि आरबीआई ने पहले सस्ते कर्ज के द्वारा बाजार में माहौल निर्मित करने के लिए और आर्थिक शिथिलता खत्म करने के लिए मकान व वाहन ऋण को सस्ता करके लोगों में आत्मविश्वास जगाया..,लेकिन अब महंगाई को काबू करने के लिए हर तरह का कर्ज महंगा करने की पहल हो चुकी है...इसके कारण महंगाई कितनी नियंत्रित होगी, इसमें संदेह है..,लेकिन अन्य तरह की महंगाई फिर आग झरती तेजी आएगी, इसमें कोई संदेह नहीं है...क्योंकि आरबीआई ने कोरोना महामारी के दौरान अपने अपनाए गए सभी उदार उपायों को वापस लेते सख्ती दिखाना प्रारंभ किया है...इसका आर्थिक रूप से रोजमर्रा के कार्य से जुड़े लोगों पर दुष्प्रभाव स्पष्ट रूप से नजर आएगा...