मां भारती के वीर सपूत पं. रामप्रसाद बिस्मिल
   Date11-Jun-2022

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निखिलेश महेश्वरी
कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में रामप्रसाद 'गुप्त समितिÓ के सदस्यों से मिले जो क्रांतिकारी गतिविधियां संचालित करते थे, लेकिन उनके पास शस्त्र खरीदने के लिए धन का अभाव रहता था। अपने 11 वर्ष के क्रांतिकारी जीवन में अपने दल के लिए अनेक पुस्तकें लिखीं और स्वयं ही उन्हें प्रकाशित किया। उन पुस्तकों को बेचकर जो पैसा मिला, उससे क्रांतिकारी गतिविधियां संचालित की। वे बिस्मिल अज्ञात एवं राम के नाम से रचनाएं प्रकाशित करते थे। क्रांतिकारी गतिविधियों एवं अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लेखन के कारण उनके खिलाफ मुकादमा दर्ज कर उनकी खोजबीन प्रारंभ की गई। इन परिस्थिति में रामप्रसाद अज्ञातवास में चले गए। अज्ञातवास में पहले उत्तरप्रदेश के रामपुर जागीर गांव और वहां से कोसमा, बाह, पिनहट, आगरा और अंत में अपने दादा के गांव बरबई जिला मुरैना मध्यप्रदेश में पहुंचे। वहां उन्होंने किसानी एवं पशुपालन का कार्य किया, साथ ही वह क्रांतिकारी साहित्य के माध्यम से अपने भाव व्यक्त करते रहे। इसी बीच ग्वालियर से अपने लिए एक रिवाल्वर खरीदा और फिर अकसर शस्त्र खरीदी के लिए वह ग्वालियर जाते रहते थे। शस्त्रों के विषय में उन्होंने अनेक जानकारी एकत्रित कर ली थी। इस अज्ञातवास को भी उन्होंने अवसर में बदला। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात अंग्रेज सरकार ने अपनी नीति बदली, तब रामप्रसाद बिस्मिल से भी मुकदमे हटा लिए गए, तब वह पुन: शाहजहांपुर आ गए।
उन्होंने शाहजहांपुर आकर भारत सिल्क मैनुफैक्चरिंग कंपनी में प्रबेंधक के रूप में कार्य किया। उसके बाद साडिय़ों की दुकान चलाकर आपने काफी पैसा कमाया। उन्होंने कांग्रेस में कार्य करते समय महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन किया। कलकत्ता में जब आप लाला लाजपत राय के संपर्क में आए तो लाला लाजपत राय रामप्रसाद बिस्मिल की लिखी पुस्तकें पढ़कर काफी प्रभावित हुए। उन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल का अनेक प्रकाशकों से परिचय कराया, जिससे आगे चलकर रामप्रसाद बिस्मिल को अपनी पुस्तकों के प्रकाशन में सहायता मिली। सन् 1921 के अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में रामप्रसाद बिस्मिल ने पूर्ण स्वराज के प्रस्ता व पर मौलाना हसरत मोहानी का खुलकर समर्थन किया और महात्मा गांधी से असहयोग आंदोलन प्रारम्भ करने का प्रस्ताव भी पारित करवाया। इन सबके कारण युवाओं में वह काफी लोकप्रिय हो गए। असहयोग आंदोलन में शुरुआत में शाहजहांपुर के स्वयंसेवक का विशेष योगदान था और उसका नेतृत्व रामप्रसाद बिस्मिल कर रहे थे। 1922 में चौरीचौरा कांड के पश्चात किसी से बिना विचार किए गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो रामप्रसाद बिस्मिल एवं उनके साथियों ने गांधीजी का कड़ा विरोध किया। गांधीजी उन विरोधी नवयुवकों को कांग्रेस की आमसभाओं में विरोध करने के कारण हमेशा हुल्लड़बाज कहा करते थे। असहयोग आंदोलन समाप्त होने से क्रांतिकारी आंदोलन को मजबूती मिली, साथ ही आम जनता का समर्थन भी मिला। सितम्बर 1923 के दिल्ली में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में असंतुष्ट नवयुवकों ने यह निर्णय लिया कि वह अपनी अलग पार्टी बनाकर कार्य करेंगे अन्यथा देश में लोकतंत्र के नाम पर लूटतंत्र चलेगा। वास्तव में यह उनकी दूरदर्शी सोच थी। सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला हरदयाल जो विदेश में रहकर हिंदुस्तान को स्वतंत्र कराने के लिए कार्य कर रहे थे। उन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल को पत्र लिखकर नई पार्टी बनाने का सुझाव दिया, जिसके परिणामस्वरूप हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए.) पार्टी अस्तित्व में आई। 3 अक्टूबर 1924 को कानपुर में पार्टी की पहली बैठक आयोजित की गई, जिसमें शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेशचंद्र चटर्जी और रामप्रसाद बिस्मिल आदि शामिल हुए और पार्टी का नेतृत्व बिस्मिल को सौंपा गया। कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की कमी नहीं थी, कमी थी सिर्फ धन की, कार्यकर्ताओं के खाने-पीने के साधन या वस्त्र उपलब्ध कराने की। सबसे बड़ी कठिनाई थी हथियार इक_ा करने की। इन सब परिस्थित में भी किसी भी प्रकार की समस्या होती तो युवक रामप्रसाद बिस्मिल के पास आकर उनसे सलाह लेते। धन के अभाव में क्या किया जाए, यह प्रश्न सबके सामने था? इस कठिनाई को देखते हुए आयरलैंड के क्रांतिकारियों का तरीका अपनाया गया और पहली डकैती 25 दिसम्बर 1924 को बमरौली में डाली गई, जिसका नेतृत्व बिस्मिल ने किया था। इसका उल्लेख चीफ कोर्ट ऑफ अवध के फैसले में मिलता है। क्रांतिकारियों का डाके डालने का उद्देश्य देश को स्वतंत्र कराने के लिए धन एकत्रित करना था। रामप्रसाद बिस्मिल एक दिन शाहजहांपुर से लखनऊ रेल से यात्रा कर रहे थे । हर स्टेशन पर जब गाड़ी ठहरती तो वह उतरकर प्लेटफॉर्म पर टहलते। उन्होंने देखा- हर स्टेशन पर स्टेशन मास्टर रुपयों से भरा थैला लाते और गार्ड के डिब्बे में रख देते। धन की सुरक्षा के लिए कोई विशेष रक्षक तैनात नहीं थे। बस यह दृश्य देखकर रामप्रसाद के मन में क्रांतिकारी आंदोलन के लिए धन एकत्रित करने की योजना बन गई। शाहजहांपुर में रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार के खजाने को लूटने की योजना बनी। 9 अगस्त 1925 को इस योजना के एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन की चेन खींचकर उसे रोका और रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आज़ाद और अन्य 6 सहयोगियों की मदद से गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने के बक्से नीचे गिरा दिए। पहले तो उन बक्सों को खोलने की कोशिश की गई, किन्तु जब वह नहीं खुले तो अशफाक उल्ला खां ने अपना पिस्तौल मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोडऩे में जुट गए। सभी वहां से चांदी के सिक्कों व नोटों से भरे थैले चादरों में बांधकर निकल गए ,जल्दी में एक चादर वहीं छूट गई, जो बाद में उनकी गिरफ्तारी का कारण बनी। अगले दिन अखबारों के माध्यम से यह समाचार दुनियाभर में फैल गया। इस डकैती को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। कल्पना करिए, अंग्रेजों के खजाने को लूट लेना साहस, शौर्य, संकल्प और सुनियोजित रणनीति के द्वारा ही संभव था। यह सीधे-सीधे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वाधीनता युद्ध छेडऩे की घोषणा ही थी। यह उस समय का यह सबसे दुस्साहसी कार्य था, जिससे ब्रिटिश सरकार सकते में आ गई। ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लिया और सी.आई.डी. इंस्पेक्टर तसद्दुक हुसैन के नेतृत्व में स्कॉटलैंड की सबसे तेजतर्रार पुलिस को जांच का काम सौंपा गया। ब्रिटिश सरकार ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के 40 क्रांतिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेडऩे, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया, जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां तथा ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। इस मुकदमे में 16 अन्य क्रांतिकारियों को कम से कम 4 वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम कालापानी की सजा सुनाई गई थी। रामप्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों को सेंट्रल जेल गोरखपुर में रखा गया था। रामप्रसाद बिस्मिल के माता-पिता फांसी के एक दिन पूर्व 18 दिसंबर 1927 को अपने ऐसे स्वतंत्रता सेनानी पुत्र से मिलने आए थे, जिसे दूसरे दिन सुबह फांसी होने वाली थी। रामप्रसाद बिस्मिल को बैडिय़ों से जकड़े हुए लाया गया, जो वास्तव में विशेष श्रृंगार ही लग रहा था। हथकड़ी- बैडिय़ां उनके शरीर पर आभूषण की तरह लग रही थीं। रामप्रसाद बिस्मिल आज अपनी जन्मदात्री मां के अंतिम बार दर्शन कर पा रहे थे, इसलिए उनके मुंह से कोई शब्द न निकले, इसके विपरीत आंखों से अश्रुधारा बह निकली।
19 दिसंबर 1927 को कांकोरी कांड के महानायक शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, रोशनसिंह और अशफ़ाक़ उल्ला खान ने उस दिन हसते हसते फाँसी के फंदे को चूमकर बलिदान की एक नई कहानी लिखी। फांसी के समय जेल के बहार कड़ा पहरा था। जेल के बाहर सैकड़ों नर-नारियों ने सजल नेत्रों के साथ उस वीर के शव को लेकर उसे फूलों से सजाया। एक बड़े जुलूस के रूप में उनकी शवयात्रा निकाली गई। मार्ग में गोरखपुर के नागरिकों ने भारत मां के उस वीर सपूत के शव पर पुष्प बरसाये और इस तरह इस वीर सपूत ने अंतिम विदाई ली ।
मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या,
दिल की बर्बादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या।
रामप्रसाद बिस्मिल स्वतंत्रता के अमर सेनानी होने के साथ एक कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार भी थे। वह ब्राह्मण होते हुए भी उर्दू भाषा के अच्छे जानकार थे, इसलिए उनका उर्दू तखल्लुस (उपनाम) था, जिसका हिंदी में अर्थ होता है आत्मिक रूप से आहत। उनके लिखे लेख व कविताएं पुस्तक के रूप में धरोहर हैं। उनका राष्ट्र के प्रति योगदान चिरकाल तक भारत के लोगों के मानस पर दस्तक देता रहेगा। बलिदान की जो परंपरा उन्होंने खड़ी की, वह भारतीय युवकों को हमेशा देश कार्य के लिए प्रेरित करती रहेगी।
(लेखक रा.स्व.संघ के प्रचारक हैं)