परहित सरिस धर्म नहिं भाई
   Date11-Jun-2022

dharmdhara
धर्मधारा
मनुष्य जब धरती पर आता है तो एक लक्ष्य, एक उद्देश्य लेकर आता है। चाहे वह उसे पूरा कर सके या न कर सके, पर हर व्यक्ति के जन्म लेने के साथ ही उसके जीवन का एक ध्येय, एक लक्ष्य, एक उद्देश्य साथ जुड़ जाता है। यदि हमारे जीवन का कोई लक्ष्य या उद्देश्य न होता तो हमारे जीवन में व जानवरों के जीवन में भारी अंतर नहीं रह जाता। पक्षियों के, पशुओं के जीवन के दो ही मुख्य उद्देश्य दिखाई पड़ते हैं-अपना पेट भर लेना और अपना परिवार बड़ा कर लेना। इसके अतिरिक्त कोई तीसरा उद्देश्य पशु जीवन का दिखाई नहीं पड़ता। इसके विपरीत मनुष्य को चिंतन की, भावनाओं की, दृष्टिकोण की क्षमता परमात्मा ने देकर भेजा है। इन सब गुणों को, विशेषताओं को देने के पीछे परमात्मा का यह उद्देश्य था कि उनको उपयोग में लाकर इनसान अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सके। इनसान का जीवन लक्ष्य इनसानियत के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। मानव जीवन का उद्देश्य मानवता ही कहा जा सकता है। इसी को गोस्वामी तुलसीदासजी ने धर्म की परिभाषा के रूप में भी स्वीकार किया है-
परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।
जिसे दूसरे की पीड़ा को देखकर स्वयं भी पीड़ा का अनुभव होता है, उसे देखकर ही यह कहा जा सकता है कि इसके भीतर इनसानियत है। यह इनसानियत की भावना ही हमें जानवरों से भिन्न करती है और हमें, हमारे जीवनलक्ष्य से परिचित कराती है। इसी को ध्यान में रखकर परमपूज्य गुरुदेव ने प्रज्ञा पुराण में लिखा है-'परोपकाररहित मनुष्य के जीवन को धिक्कार है, उसकी तुलना में तो पशु श्रेष्ठ हैं, उसका कम-से-कम चमड़ा तो काम आ जाएगा, परंतु मानवरहित मनुष्य का जीवन तो किसी के भी उपयोग का नहीं रहता। हमें इनसानियत को ही अपना जीवन लक्ष्य मानकर जीवन जीना चाहिए।Ó