सीमा सुरक्षा की नई चुनौती...
   Date09-May-2022

vishesh lekh
पंजाब सुरक्षा को लेकर काफी संवेदनशील राज्य माना जाता है... पाकिस्तान सीमा से सटा होने की वजह से वहां आतंकी गतिविधियों की आशंका लगातार बनी रहती है... इसे लेकर अब चिंता इसलिए बढ़ गई है कि पिछले कुछ दिनों में वहां पुराने अलगाववादी संगठन सक्रिय नजर आए हैं... कुछ दिनों पहले ही खालिस्तान आंदोलन से जुड़े संगठन सिख फॉर जस्टिस के समर्थकों ने पटियाला में एक जुलूस निकाला, जिसके विरोध में शिवसेना (बाल ठाकरे) नामक संगठन उतरा और दोनों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ... पंजाब सरकार उसे लेकर लग रहे आरोपों से अभी उबर नहीं पाई है... इस बीच वहां के एक दूसरे अलगाववादी संगठन बब्बर खालसा के चार सदस्य हरियाणा के करनाल में भारी असलहे, गोला-बारूद, नकदी और खतरनाक विस्फोटक से भरी गाड़ी के साथ पकड़े गए... इन युवकों को फोन के जरिए पाकिस्तान में बैठा उनका सरगना संचालित कर रहा था... पुलिस और खुफिया एजेंसी के संयुक्त दल ने लक्ष्य बनाकर उन्हें पकड़ा... पता चला कि ये विस्फोटक तेलंगाना भेजे जा रहे थे... सुरक्षा बलों और पंजाब सरकार के लिए यह इसलिए भी चिंता का विषय है कि जिन अलगाववादी संगठनों को निष्क्रिय मान लिया गया था, वे फिर से सिर उठाने लगे हैं... हालांकि इस बात के पहले से प्रमाण मौजूद हैं कि सिख फॉर जस्टिस और बब्बर खालसा को कनाडा और पाकिस्तान से वित्तीय मदद मिलती रही है... दोनों संगठनों के मुखिया पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों के गहरे संपर्क में हैं... यानी पाकिस्तानी दहशतगर्द पंजाब के अलगाववादी संगठनों के जरिए अशांति फैलाने की फिराक में रहते हैं... कश्मीर में चौकसी बढऩे की वजह से जब उन्हें पहले की तरह कामयाबी नहीं मिल पा रही, तो उन्होंने पंजाब में अपने ठिकाने तलाशने शुरू किए हैं... कुछ समय पहले फिरोजपुर में ड्रोन के जरिए जो विस्फोटक गिराया गया, उसमें बब्बर खालसा के मुखिया का ही हाथ था... ताजा मामले में पुलिस ने उसके खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया है... मगर इससे स्पष्ट है कि पंजाब में सिर उठा रहे अलगाववादी संगठनों की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है... पंजाब पहले ही अलगाववाद की आग में काफी झुलस चुका है, अगर जरा भी लापरवाही हुई तो फिर से नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं... इसे केवल कश्मीर में पाकिस्तानी दहशतगर्दों की नाकामी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, यह भी समझने की जरूरत है कि ये संगठन अचानक क्यों सक्रिय हो उठे हैं... पंजाब में नई सरकार बनी है और मुख्यमंत्री की प्रशासनिक क्षमता को लेकर सवाल उठते रहते हैं... जब-तब विपक्षी दल उनकी कमजोरियों को रेखांकित करते रहते हैं...
दृष्टिकोण
बदनीयत के आंकड़े..
भारत सरकार पर कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े छिपाने के आरोप लगते रहे हैं... न केवल भारत में, बल्कि दुनियाभर में... इसे लेकर कई विदेशी संगठनों और शोध पत्रिकाओं ने भी अपने अनुमानित आंकड़े प्रकाशित किए, जिसमें मौतों की संख्या सरकार के बताए आंकड़े से कई गुना ज्यादा थी... सरकार शुरू से इसका खंडन करती रही है... अब उसने 2020 के जन्म और मृत्यु पंजीकरण के आधार पर तथ्य पेश करते हुए कहा है कि लांसेट जैसी कुछ पत्रिकाओं ने बेतुके ढंग से मौतों का आंकड़ा बढ़-चढ़कर दिखाया और भारत को बदनाम करने की कोशिश की... नीति आयोग ने ऐसी एजेंसियों को नसीहत भी दी है कि उन्हें ऐसे आंकड़े देने बंद कर देना चाहिए... नीति आयोग ने 2020 के आंकड़ों पर आधारित नागरिक पंजीकरण प्रणाली यानी सीआरएस रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि 2019 में कुल मौतें 76.4 लाख थीं, जो 2020 में 6.2 फीसदी बढ़कर 81.2 लाख हो गई थी... इस तरह 2019 की तुलना में 2020 के मृत्यु पंजीकरण में 4.75 लाख की वृद्धि दर्ज की गई... जबकि लांसेट पत्रिका ने कोरोना की वजह से भारत में हुई मौतों का अनुमान चालीस लाख सत्तर हजार पेश किया था, जो दुनिया में सबसे अधिक है... कोरोना की दूसरी लहर भारत में सबसे भयावह रूप में उभरी थी... उस दौरान अस्पतालों में बिस्तर खाली न होने, समुचित इलाज न मिल पाने की वजह से सबसे अधिक मौतें हुई थीं... सब जगह अफरा-तफरी का आलम था... उस दौरान बहुत सारे अस्पतालों में ऑक्सीजन की भारी कमी हो गई थी, जिसके चलते सरकार को दूसरे देशों से ऑक्सीजन मंगाना पड़ी... ऑक्सीजन की कमी के चलते बहुत सारी मौतें हुई थीं... उस दौरान श्मशानों और कब्रिस्तानों में जगह न मिल पाने के कारण लाशें गंगा में बहाने या गंगा की रेती पर दफनाने के प्रमाण भी सामने आए थे...