भारतीय दर्शन में सूक्ष्म शरीर की अवधारणा
   Date09-May-2022

dharmdhara
धर्मधारा
कै रिंग्टन के अनुसार-सूक्ष्म शरीर नींद में भौतिक शरीर के ऊपर मंडराता रहता है। बेहोशी की अवस्था में वह भौतिक शरीर से निकल जाता है। इसे 'अनैच्छिक प्रक्षेपणÓ कहते हैं। अगर अपनी इच्छा से सूक्ष्म शरीर को भौतिक शरीर से अलग किया जाए, तो उसे 'ऐच्छिक प्रक्षेपणÓ कहा जाता है। वास्तव में सूक्ष्म तथा भौतिक शरीर एक तार से जुड़े रहते हैं, जिसमें प्राणवायु की धारा बहती है। भारतीय दर्शन अपने आदिकाल से ही भौतिक और सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व स्वीकार करता रहा है। वेदांत के महान ज्ञाता जगद्गुरु शंकराचार्य ने महान मीमांसक मंडन मिश्र की पत्नी भारती के प्रश्नों का समाधान पाने के लिए परकाय-प्रवेश करके यथार्थ अनुभव प्राप्त किया था। आज भी इस परंपरा के महान तत्ववेत्ताओं और योगसाधकों की कमी नहीं है, जो अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा लोक-कल्याण के लिए प्रयासरत हैं। जो न सिर्फ सूक्ष्म शरीर के विषय में पूर्ण ज्ञान रखते हैं, अपितु इच्छानुसार सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से पृथक कर लोक-लोकांतरों में स्वच्छंद विचरण करने में पूरी तरह सक्षम हैं। सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से पृथक करना, परकायप्रवेश करना एक तरह की विद्या व सिद्धि है, जिसे अर्जित करना इतना जरूरी नहीं है, जितना कि यह कि हम अपने सूक्ष्म शरीर को विकसित करें। यदि हमारा सूक्ष्म शरीर विकसित होगा तो इसके माध्यम से जीवात्मा की ऊध्र्वगति संभव है। सूक्ष्म शरीर के विकसित होने से मनुष्य जीवन में कई ऐसे कार्य किए जा सकते हैं, जो मानव जीवन के लिए हितकर हैं। हमें भी अपने सूक्ष्म शरीर को अनुभव करने व उसे विकसित करने हेतु सरल साधनाओं का अभ्यास करना चाहिए, जैसे-ध्यान, योगनिद्रा, जप-तप, प्राणायाम आदि। इसके साथ ही उपासना, साधना व आराधना को अपनी जीवन-साधना का अभिन्न अंग बनाने के लिए कहा है। निश्चित रूप से इन साधनाओं के अभ्यास से सूक्ष्म-कारणशरीर का विकास व चेतना का ऊध्र्वगमन संभव है।