जनजातीय अधिकारों पर 'डाका' रोकेगा डीलिस्टिंग...
   Date08-May-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
ज ब 1950 में भारतीय संविधान लागू हुआ तो हमारे नीति-नियंताओं ने एक दूरगामी सोच के साथ अनुसूचित जाति (अजा), अनुसूचित जनजाति (अजजा) वर्ग को विशेष राहत या कहें कि अधिकार प्रदान किए थे... आज देश की कुल जनसंख्या का 32 फीसदी हिस्सा जनजातीय समुदाय से आता है... यही जनजातीय समुदाय हमारी वन संपदा, नदियों-पर्वतों व वनों को अपनी माँ और ईश्वर के रूप में पूजकर इनके संरक्षण-संवर्धन का दायित्व निर्वाह करता रहा है और कर रहा है... इसलिए तो इन्हें आरक्षण के साथ ही सरकारी व्यवस्था के तहत अनेक तरह के लाभ और सुविधा प्रदान करने की पहल हुई थी... ताकि यह जनजातीय समुदाय अपनी पहचान, परंपरा, संस्कृति, पर्व-उत्सव एवं परंपरागत-कलात्मक कार्यशील मापदंडों को चीरस्थायी रखने में सदैव सजग व सक्षम बना रहे... क्योंकि वनवासी अंचलों में निवासरत जनजातीय समुदाय अर्थात् वनवासियों पर आजादी के पहले से ही चर्च लॉबी अर्थात् मिशनरी की गिद्ध निगाहें रही है... वे उन्हें अपनी संस्कृति-परंपरा, धर्म और रीति-रिवाज से दूर करने का लगातार षड्यंत्र रचते रहे... इसके लिए मिशनरी ने सेवा, सुविधा और प्रार्थना को हथियार बनाकर भोले-भाले जनजातीय समुदाय को दिशाभ्रमित किया... इसका दुष्परिणाम यह रहा कि चर्च मिशनरी सर्वाधिक धर्मांतरण/मतांतरण का कायराना कृत्य वनवासी अंचल में करने में सफल हुई... इस कृत्य की रोकथाम के लिए जो भूलवश या फिर षड्यंत्र के तहत रास्ता संवैधानिक दायरे में छूट गया, उसी का नतीजा है कि आज जनजातीय समुदाय का एक बड़ा वर्ग धर्मांतरण के द्वारा देश के खिलाफ खड़ा होकर जनजातीय समुदाय के अधिकारों-सुविधाओं पर 'डाकाÓ डाल रहा है..!
देशभर में विशेष रूप से वनवासी अंचल में लगातार जनजाति सुरक्षा मंच के बैनरतले डीलिस्टिंग अर्थात् जनजाति समाज की सूची से गैर जनजाति अर्थात् धर्मांतरित हो चुके लोगों को बाहर करने की हुंकार भरते हुए संसद से कड़ा कानून बनाने की मांग उठ रही है... क्योंकि 1969 में ही संसदीय समिति ने डीलिस्टिंग अर्थात् जनजाति सूची से धर्मांतरित जनजाति को बाहर करने वाले कानून की अनुशंसा कर दी थी, लेकिन आज तक कानून अमल में नहीं आया... ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि संविधान के अनुच्छेद 341 में जब संशोधन हो चुका है तो 342 अब तक अछुता क्यों है..? अनुच्छेद 341 अनुसूचित जाति और अनुच्छेद 342 में जनजाति अधिकार के संरक्षण एवं आरक्षण का प्रावधान किया गया था... 1956 में अनुसूचित जाति प्रावधान में डीलिस्टिंग जोड़ा गया... अर्थात् कोई भी अजा सदस्य अपनी मूल पहचान हिन्दू छोड़कर अन्य धर्म में जाता है तो उसे 341 के अधिकार संरक्षण व सुविधा से वंचित होना पड़ेगा... लेकिन 342 पर अभी तक ऐसा प्रावधान अब तक की सरकारों ने किसके दबाव में अथवा क्या धर्मांतरण का दुष्चक्र चलाने वाली विदेशी लॉबी के प्रभाव में नहीं लिया..?
जनजाति सूची से गैर जनजाति या धर्म बदल चुके लोगों को बाहर करने का कार्य 'डीलिस्टिंगÓ कानून के जरिये ही संभव है... अगर यह कानून बनता है तो जनजातीय समुदाय के अधिकारों पर चौतरफा रूप से 'डाकाÓ डालने वाले धर्मांतरित धड़ों पर अंकुश लगाना संभव होगा... यह मांग कोई आज या कल की नहीं है, बल्कि इसके लिए दशकों से जनजातीय समुदाय के साथ वरिष्ठजन संघर्ष कर रहे हैं... देश के पूर्व नागरिक उड्डयन एवं संचार मंत्री डॉ. कार्तिक उरांव ने 70 के दशक में इस ज्वलंत समस्या को समझकर संघर्ष प्रारंभ कर दिया था... तब उन्होंने डीलिस्टिंग की मांग करते हुए इंदिरा सरकार के समक्ष 348 सांसदों (322 लोकसभा, 26 राज्यसभा) का हस्ताक्षरित सहमति पत्र सौंपा था... लेकिन तब केन्द्र सरकार ने चर्च लॉबी और ईसाई मिशनरी के दबाव-प्रभाव में इस मांग को ठंडे बस्ते में डाल दिया... क्या यह जनजातीय समुदाय की पहचान, उनकी परंपरा, संस्कृति और अधिकारों-सुविधाओं के संरक्षण-संवर्धन के लिए आवश्यक कानून को नजरअंदाज करने जैसा राष्ट्रघाती पाप नहीं था..?
धर्मांतरण के कारण जनसंख्या संतुलन ही नहीं गड़बड़ाता, बल्कि अलग-अलग समुदायों को मिलने वाले आरक्षण एवं अन्य तरह की तमाम सरकारी सुविधा व रियायती लाभों पर भी बंटवारे का शिकंजा किसी 'डाकेÓ के रूप में देखा जाना चाहिए... यही तो आजादी के बाद जनजातीय समुदाय के साथ होता रहा है... वास्तविक हकदार पीछे छूटते चले गए और धर्मांतरण के द्वारा वनवासी से ईसाई बने लोग दोहरा लाभ लेकर देश के खिलाफ एकजुट होते रहे... 2011 की जनगणना को ध्यान में रखें तो देश में 16.6 फीसदी अजा वर्ग की संख्या है... जबकि 8.0 फीसदी अजजा से आते हैं... मध्यप्रदेश में ही आज कुल आबादी का 21 फीसदी हिस्सा अजजा वर्ग से आता है... क्या इनके अधिकारों और सुविधाओं का वास्तविक लाभ इन्हीं को नहीं मिलना चाहिए..? या फिर इनकी जाति, धर्म, परंपरा और पहचान को छोड़कर ईसाई या मुस्लिम बन चुके लोग ही इनके हकों पर कुंडली मारकर अपनी चौथी-पांचवीं पीढ़ी को लाभ पहुंचाते रहेंगे..? डीलिस्टिंग की यह मांग सिर्फ मध्यप्रदेश के संदर्भ में ही नहीं है, बल्कि देशभर में धर्मांतरण/मतांतरण के जरिये वनवासी समुदाय के हकों/अधिकारों पर जो छीना-झपटी का दुष्चक्र चल रहा है, उसका समाधान केन्द्र द्वारा डीलिस्टिंग से ही संभव है...
आज उत्तर-पूर्व भारत में आईएएस, आईपीएस अर्थात् प्रशासनिक रूप से 43 पद तय है, लेकिन पदोन्नति के बाद इसमें 39 ईसाई (धर्मांतण द्वारा जनजाति से ईसाई बने) और महज 4 जनजातीय समुदाय के हैं... असम में आज 12 प्रशासनिक पदों पर 9 ईसाई और सिर्फ 3 जनजातीय वर्ग से है... छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा में ऐसे ही 9 प्रशासनिक पदों में से 5 पर ईसाई और 4 पर गैर वनवासी समुदाय के लोग बैठे हैं... कहने का तात्पर्य यह है कि यह तो सिर्फ बड़े पदों का मामला है, फिर राजनीति में चुनाव लडऩे, अनेक तरह के निकायों, मंडलों में पद पाने, यहां तक कि शैक्षणिक आर्हता के साथ ही राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर छात्रवृत्ति पाने, अनेक तरह की सरकारी सुविधा और अधिकृत बैंकों से ऋण प्राप्ति, ऋण माफी तक में यही जनजाति से ईसाई बने व अन्य धर्म में पहुंचे लोग बेजा फायदा उठा रहे हैं... और जो वास्तविक जनजातीय समुदाय है, अपने हकों को लुटता देख बेबस और लाचार नजर आता है... इन्हीं वास्तविक जनजातीय समुदाय का 'डीलिस्टिंग कानूनÓ किसी मजबूत 'सुरक्षा कवचÓ की भांति सहयोग करेगा..!
चर्च लॉबी ने वनवासी अंचलों में लोकलुभावन पैंतरों जैसे सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रार्थना के जाल में फांसकर जनजातीय समुदाय को धर्मांतरण के लिए लगातार आकर्षित किया... उसी का दुष्परिणाम है कि आज एक बड़ी आबादी जनजातीय समुदाय में अपने ही जाति बंधु के खिलाफ काम कर रही है... विचारणीय बिन्दु यह है कि जिन्होंने जनजाति समाज के रीति-रिवाज-परंपरा त्याग दिए हैं, ईसाई बन गए हैं, ऐसे लोगों को संसद द्वारा कानून बनाकर जनजाति सूची से बाहर करना चाहिए... क्योंकि यही धर्मांतरित लोग जनजातीय समुदाय के आरक्षण का व अन्य सुविधाओं का बेजा लाभ उठाते हैं... 10 प्रतिशत धर्मांतरित व्यक्ति 80 प्रतिशत आरक्षण व अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाते हैं... यह काकस कितना मजबूत है, इसको इस बात से समझना चाहिए कि जनजाति सुरक्षा मंच ने 2009 में 28 लाख जनजातीय समुदाय के हस्ताक्षरयुक्त पत्र के साथ पूरी रिपोर्ट राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को सौंपी थी, लेकिन उस पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया... 2020 में जनजाति सुरक्षा मंच ने एक नया संघर्ष डीलिस्टिंग के लिए शुरू किया... 228 जिलों में राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री के नाम कलेक्टर, 14 राज्यों में राज्यपालों और 7 राज्यों में मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा, लेकिन मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में है... जनजातीय समुदाय अपने अधिकारों-सुविधाओं की सुरक्षा के लिए हुंकार भर रहा है... केन्द्र व राज्य सरकारों को बिना विलंब डीलिस्टिंग कानून पर सहमति जताकर अमल करना चाहिए... क्योंकि यही कानून तो जनजातीय अधिकारों पर 'डाकाÓ डालने के दुष्चक्र को रोकेगा...