आत्मसंतोष
   Date07-May-2022

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प्रेरणादीप
एक उदारमना व्यक्ति ने अपनी सम्पदा परमार्थ प्रयोजनों के लिए दान दी और लोकसेवा के कार्यों में निरत रहने लगा। उसकी सर्वत्र प्रशंसा होने लगी। इस परिवर्तन के लिए लोग उसकी भूरि-भूरि सराहना करते और बधाई देने आते। उत्तर में उदार व्यक्ति एक प्रश्न करता- आपके झोले में कंकड़-पत्थर हों और अनायास कोई बहुमूल्य वस्तु मिले तो उन पत्थरों को फेंककर मूल्यवान वस्तु उसमें भरोगे या नहीं? लोग उत्तर में सिर हिला देते। उदारमना समझाता- मैंने कोई त्याग नहीं दिया, मात्र समझदारी का परिचय दिया। जो व्यर्थ बटोर रखा था, वह बोझ बढ़ाता, अनर्थ सिखाता। अब उस जंजाल के फेंक देने पर मन:स्थिति परमार्थ करने जैसी बन गई और वे कार्य हो सके, जिनकी प्रशंसा आप सब करते हैं और मुझे संतोष पाने तथा भविष्य उज्जवल बनाने का अवसर मिलता है।