हिंसावादी संगठनों पर अंकुश की दरकार
   Date07-May-2022

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आलोक मेहता
आतंकी हिंसा के रूप दानवी चेहरों की तरह बदलते रहते हैं। गंभीर अपराधों और आतंकवादी गतिविधियों पर कठोर दंड के कानून की रक्षा करने वाली अदालतें आतंकवादी या उसको गुपचुप मदद करने वालों के प्रकरण आने पर पर्याप्त सबूत मांगती हैं। देशी या विदेशी आतंकवादी संगठनों अथवा विदेशी ताकतों से षड्यंत्रपूर्वक गोपनीय ढंग से सहायता मिलने के सबूत जुटाना पुलिस अथवा गुप्तचर एजेंसियों के लिए आसान नहीं होता है। कुछ महीने पहले केरल के कथित पत्रकार सिद्धकी कप्पन पर आतंकवादी हिंसक गतिविधियों में सहायता के आरोपों का प्रकरण सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना और न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सवाल किया कि 'क्या पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) पर प्रतिबंध है?Ó श्री मेहता ने उत्तर दिया कि 'कुछ राज्यों में इस संगठन पर प्रतिबंध है, क्योंकि यह हिंसा, हत्याओं, अपहरण और विदेशी आतंकवादी संगठनों से जुड़ा हुआ है। केंद्र सरकार प्रतिबंध पर विचार कर रही है।Ó
कप्पन की तरह अनेक मामले सामने आते रहे हैं। यह तथ्य है कि पीएफ आई का जाल अब तक 22 राज्यों में फैला हुआ है। केरल सरकार ने इस पर प्रतिबंध भी लगाया था। कर्नाटक सरकार ने हाल ही में अदालत में कहा था कि वह प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है। यों इससे जुड़े सहयोगी संगठन नेशनल विमेंस फ्रंट और कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया भी देशभर में सक्रिय है। वास्तव में पीएफआई पहले प्रतिबंधित सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) का नया अवतार है। इस पर हत्या, हथियारों के प्रशिक्षण, अपहरण, भारत विरोधी उग्र आंदोलनों की फंडिंग, तालिबान और अलकायदा जैसे आतंकवादी संगठनों से संबंध के गंभीर आरोप रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने अनेक प्रमाण भी सरकार को उपलब्ध करा रखे हैं। इसलिए पिछले दिनों जहांगीरपुरी साम्प्रदायिक हिंसा की घटना सामने आने पर संदिग्ध आरोपियों के पीएफआई से जुड़े होने के कुछ सबूत भी सामने आने पर चिंता होना स्वाभाविक है। इस संगठन की गतिविधियां अब दक्षिण भारतीय राज्यों से उत्तर में बढ़ रही हैं। सिमी का गठन तो बहुत पहले जमायते इस्लाम-ए-हिन्द द्वारा 1977 में किया गया था। लोकतांत्रिक व्यवस्था और कुछ राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के सहयोग का लाभ उठाकर इसका जाल फैलता गया तथा हिंसक हमले होते रहे, तब 2001 में जाकर इस पर प्रतिबंध का सिलसिला शुरू हुआ। हर बार पांच वर्ष का प्रतिबंध बढ़ता रहा। इसलिए उसने पीएफआई को खड़ा कर दिया। माओवादी नक्सल या पाकिस्तान से मदद लेने वाले कुछ कश्मीरी संगठन इसी तरह नए-नए नाम के संगठन खड़े करते रहे हैं। कानून और लोकतंत्र के अधिकार का ऐसा दुरुपयोग शायद दुनिया के किसी देश में देखने को नहीं मिलेगा। ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा जैसे देशों में कुछ भारत विरोधी आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं, लेकिन वे उन देशों में हिंसा फैलाने का खतरा उठाने के बजाय भारत में फंडिंग या अन्य रास्तों से हथियार-ड्रग्स और भेष बदलकर लोग भेजते रहते हैं। वे मानव अधिकार का झंडा उठाकर भारत को बदनाम करते हैं या धर्म के नाम पर इस्लामिक देशों से सहायता जुटाते रहते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय उपमहाद्वीप को माओवादी और इस्लामी कट्टरपंथियों आतंकियों ने एक भौगोलिक निशाने पर रखा है। इन तत्वों की न तो जन्म भूमि में विश्वास है और न ही किसी राष्ट्रीय सीमा। यही कारण है कि कम्युनिस्ट चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तालिबान सहित संगठनों की आतंकी गतिविधियों पर अंकुश के बजाय अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें सहयता देता है। भारत में माक्र्सवादी कम्युनिस्टों के बाद घोषित रूप से माओवादी संगठनों ने आदिवासी इलाकों में हिंसक गतिविधियों से तबाही की स्थितियां बनाई। नागरिक-मानवीय अधिकारों के नाम पर नेताओं, वकीलों, डॉक्टरों, पत्रकारों, एनजीओ, सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक वर्ग से ऐसे अतिवादियों को कभी खुलकर और कभी छिपकर सहायता भी मिलती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद इन गतिविधियों तथा संगठनों पर कड़ी कार्रवाई का अभियान चलाया है। जांच एजेंसियां और पुलिस विभिन्न राज्यों में जब कोई कार्रवाई करती है, तो अदालतों में गवाह सबूत का लम्बा सिलसिला चलता है। इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि सुदूर जंगलों या छद्म कंपनियों-संगठनों के बल पर जुटाए जाने वाले धन और हथियारों के चश्मदीद गवाह या डिजिटल युग में कागज के प्रमाण कैसे उपलब्ध हो सकते हैं? हां, दिल्ली, मुंबई अथवा अन्य क्षेत्रों में हिंसक घटना में गिरफ्तार आरोपियों पर समयबद्ध सीमा के साथ मुकदमे चलाकर सजा देने के लिए आवश्यक नियम कानून संशोधित हों या नए बनाए जाएं। खासकर जब ऐसे राजनीतिक दलों के नेता जो राज्यों में सत्ता में भी आ जाती हैं, अधिक समस्याएं उत्पन्न करते हैं। वे विधायिका के विशेषाधिकार का उपयोग कर अप्रत्यक्ष रूप से हिंसक आतंकवादी गतिविधियों के आरोपियों को संरक्षण देकर बचाव करते हैं। सबसे दिलचस्प स्थिति पश्चिम बंगाल की है। दस-पंद्रह वर्ष पहले सुश्री ममता बनर्जी सार्वजनिक रूप से कम्युनिस्ट सरकार पर 'जंगल राजÓ का आरोप लगाती थीं। अब उनके सत्ताकाल में सैकड़ों हत्याओं और राजनीतिक हमलों के लिए न केवल भारतीय जनता पार्टी, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी अपराधियों को प्रश्रय देने के गंभीर आरोप लगा रही हैं। केरल में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट लगातार सत्ता में है और वहां कट्टरपंथी संगठनों को विदेशी सहायता के प्रकरण सामने आ रहे हैं और भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की हत्याओं पर पुलिस की कार्रवाई नहीं हो रही है। जम्मू-कश्मीर तो अब भी संवेदनशील इलाका है, लेकिन दिल्ली, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में हिंसा और आतंक से जुड़े संगठनों और लोगों पर समय रहते अंकुश की जरूरत होगी।
(लेखक देश के विभिन्न अख़बारों और पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं )