आत्मविश्वास ही दुविधा मुक्ति का उपाय
   Date07-May-2022

dharmdhara
धर्मधारा
सफलता उन्हें ही मिलती है और उनके कदम चूमती है, जो अपने लक्ष्य के प्रति, अपनी मंजिल के प्रति कभी दुविधाग्रस्त नहीं रहते। दुविधा में रहने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है कि वह निर्णय लेने से घबराता है। उसका आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है और फिर वह कभी निर्णय लेने के लिए आगे नहीं बढ़ता। ऐसा व्यक्ति केवल परिस्थितियों का दास बनकर रह जाता है। वास्तव में यह भी एक तरह की हार है, असफलता है। हमें चाहिए कि हम अपनी परिस्थितियों को इस तरह ढालें कि अपनी योजनाएं हम खुद निर्धारित कर सकें और फिर परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेते हुए कार्य कर सकें। यही इस दुविधा से बाहर निकलने का मार्ग है, क्योंकि दुविधाग्रस्त इंसान कभी भी अपने कार्य में सफल नहीं हो सकता, वह हमेशा समय से पीछे चलता है और जो व्यक्ति समय पर अपना कार्य नहीं कर सकता, वह सफल नहीं है। सफलता के लिए जरूरी यह है कि सबसे पहले व्यक्ति निर्णय लेने की भूमिका में आगे बढ़े, क्योंकि जीवन में एक कदम भी आगे बढऩे के लिए हमें निर्णय लेना पड़ता है। यदि हम अपने निर्णय के लिए दूसरों पर निर्भर हैं या निर्णय नहीं ले सकते हैं तो फिर हम आगे भी नहीं बढ़ सकते हैं। केवल दूरदर्शिता व अनुभव के आधार पर निर्णय लेना सहज हो जाता है और सही-गलत निर्णय लेते-लेते खुद ही एहसास होने लगता है कि हम कैसे निर्णय लें। जिंदगी हमें धीरे-धीरे खुद ही निर्णय लेना सिखा देती है, लेकिन इसके लिए पहला कदम हमें स्वयं उठाना पड़ता है। निर्णय लेने में दुविधायुक्त वही रह सकते हैं, जो आत्मविश्वास से भरपूर हों तथा विवेक एवं दूरदर्शिता के साथ परिस्थितियों का आकलन करने में सक्षण हों। ऐसे व्यक्ति कितनी भी विषम परिस्थितियों में दुविधापूर्ण मन:स्थिति के शिकार नहीं होते और सदा संतुलित एवं सहज बने रहते हैं। मनुष्य में आत्मविश्वास अनुभव बढऩे के साथ-साथ आता है और यदि मनुष्य दुविधा में पड़कर कभी कोई निर्णय ही न ले तो जीवन में अनुभव की वृद्धि कैसे हो सकेगी! अत: यह आवश्यक है कि मनुष्य बिना विचलित हुए, बिना उद्विग्नता का शिकार हुए धीर भाव से परिस्थितियां समझे और फिर वह निर्णय ले, जो दूरगामी परिणामों को लाने वाला हो।