यूरोप दौरे का संदेश...
   Date05-May-2022

vishesh lekh
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीन दिवसीय यूरोप यात्रा अनेक मायनों में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह यात्रा दो कारणों से पूरे विश्व की निगाहें अपनी ओर खींच रही है... पहला पूरा विश्व जैसे-तैसे वैश्विक महामारी कोरोना की विभिषीका से उभरकर अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावनाएं तलाश रहा है, तो दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरे विश्व को सांसत में डाल रखा है... यही कि तीसरा विश्व युद्ध अगर छिड़ गया तो क्या होगा..? यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि विकासशील और तीसरी दुनिया के अर्थात् गरीब देशों के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध के दुष्परिणाम भयावह होंगे... इस मान से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यूरोप यात्रा भारत के लिए ही नहीं, दुनिया के लिए भी असीम संभावनाओं के साथ एक बड़ा संदेश व सबक भी साथ लिए हुए है... प्रधानमंत्री अपनी द्विपक्षीय वार्ता, समझौते एवं वैश्विक मंच से संवाद के दौरान इस बात को बड़ी प्रामाणिकता के साथ रखा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध से पूरे विश्व का नुकसान है... क्योंकि इस युद्ध में विजेता नहीं होगा... यह प्रधानमंत्री का भारत की उस कूटनीतिक व निर्णायक नीति-नीयत का प्रदर्शन है, जो पूरे विश्व में सदैव शांति की पहल करते हुए वसुधैव कुटुम्बकम के भाव को उच्चारित करता रहा है... तभी तो भारत ने कभी भी रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर किसी एक का पक्ष लेने के बजाय शांति के साथ संवाद के जरिये विवाद को सुलझाने का लगातार पक्ष रखा है... तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री ने अपने जर्मनी से लेकर डेनमार्क तक के संबोधनों के दौरान भारतीय समुदाय से संवाद करते हुए भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के संदर्भ में जो बातें रखी, उनका भी देश-दुनिया के लिए गंभीर मायने है... जर्मनी में तो प्रधानमंत्री ने दोनों देशों के बीच 9 समझौतों पर हस्ताक्षर किए... तभी तो उन्होंने बर्लिन में भारतीय समुदाय के साथ चर्चा करते हुए भारत के तेज विकास वाली गति का उल्लेख करते हुए उनके योगदान को भी महत्वपूर्ण बताया है... यही नहीं जर्मन चांसलर के साथ प्रधानमंत्री की आगामी जून में होने वाली जी-7 बैठक के संबंध में भी न्यौता देने की बात से इस बात को बल मिला है कि भारत-जर्मनी एक साथ वैश्विक मुद्दों पर भी समान विचार रखते हैं... प्रधानमंत्री का जर्मनी में यह कहना कि दुनिया तभी विकसित हो सकती है, जब हम यह स्पष्ट कर दे कि दुनिया कुछ ताकतवर देशों के इशारों पर नहीं, बल्कि भविष्य के रिश्तों पर ही चलेगी... तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री ने डेनमार्क में पूरी दुनिया को मंत्र देते हुए इस बात को बड़ी प्रतिबद्धता के साथ रखा है कि भविष्य में पूरी दुनिया के लिए एक ही मंजिल होगी, वह है 'चलो इंडियाÓ... क्योंकि विश्व के मान से सारी व्यवस्था एवं मामलों को सुलझाने में भारत ने सदैव एक सशक्त पक्ष की भूमिका का निर्वाह किया है...
दृष्टिकोण
एक पेंशन योजना सामयिक...
राजनीति को सेवा का माध्यम माना गया है... राजनेता भी यह कहते अघाते नहीं है कि हम तो जनता की सेवा के लिए चुनाव लड़ते हैं... सांसद, विधायक और जनप्रतिनिधि जैसे विभिन्न पदों पर आरूढ़ होते हैं... सवाल यह है कि जब कोई जनप्रतिनिधि जनता द्वारा चुनकर आता है तो क्या वह अपना पूर्णकालिक पैसा सिर्फ जनता की सेवा को बना सकता है..? अगर इसका जवाब हां में है तो क्या वह जनप्रतिनिधि स्वयं को मिलने वाले वेतन के बल पर अपनी सेवा का अभियान साथ में कार्यकर्ताओं का खर्च और आने-जाने वाले खर्चों के साथ ही समय-समय पर होने वाले बड़े आयोजनों को उसी वेतन से करने की स्थिति में है..? अगर नहीं है तो क्या किसी भी जनप्रतिनिधि को जनसेवा के साथ-साथ अपना स्वयं का कार्य-व्यवसाय जारी नहीं रखना चाहिए, ताकि वह अपने सामाजिक सेवा के प्रकल्प में पारदर्शिता को बनाए रखे... इससे भी बढ़कर सवाल यह है कि जब कोई जनप्रतिनिधि किसी एक पद पर चुना जाता है तो उसे पेंशन के रूप में जो राशि मिलती है, वह एक ही पद के लिए निश्चित क्यों नहीं हो सकती..? अगर कोई जनप्रतिनिधि तीन बार सांसद, दो बार विधायक बनता है तो उसे कुल 5 बार वाली पेंशन देने की व्यवस्था क्या लोकतंत्र सम्मत मानी जा सकती है..? अगर पंजाब में आआपा की भगवंत मान सरकार ने 'एक विधायक-एक पेंशनÓ योजना को मंजूरी दी है तो इसको बहुत ही महत्वपूर्ण एवं अतिआवश्यक फैसले के रूप देखा जाना चाहिए, ताकि राजनीति में पारदर्शिता के साथ शुचिता का माहौैल बना रहे... और यही नहीं जब विधायकों या जनप्रतिनिधियों को बिना वजह के ऐसे वेतन-भत्तों व दोहरी-तिहरी पेंशन से मुक्त रखा जाएगा, तभी समाज में व्यवस्था सुधार की पहल आगे बढ़ेगी...