स्वार्थ का दोष
   Date05-May-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
प्र सिद्ध गायक तानसेन शहंशाह अकबर के दरबार में कार्यरत थे। एक बार सम्राट अकबर ने उनसे पूछा- 'मियां तानसेन! आपसे बेहतर गायक तो शायद दुनिया में कोई न हो।Ó तानसेन ने कहा- हुजूर! ऐसा कहने से पहले आप एक बार मेरे गुरु संत हरिदास का गायन सुन लें।Ó जंगल में छिपकर अकबर ने संत हरिदास का गायन सुना तो मुग्ध हो गया और तानसेन से बोला-'आप बुरा न माने, गाते तो आप भी अच्छा हैं, पर आपके गुरु के गायन में जो रस है, वह आप में नहीं।Ó तानसेन ने उत्तर दिया-'नहीं हुजूर! इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है। आपने जो बोला, वह सच ही बोला। मेरे गुरु भगवान को प्रसन्न करने के लिए गाते हैं और मैं आपको प्रसन्न करने के लिए। स्वार्थ से हर वस्तु का स्तर गिर जाता है और यही सिद्धांत संगीत पर भी लागू होता है।Ó अकबर को महसूस हुआ कि प्रभु को समर्पित होकर किया गया कर्म, सहज ही दिव्यता को प्राप्त हो जाता है।