जीएसटी संग्रह और महंगाई...
   Date03-May-2022

vishesh lekh
अप्रैल में गुड्स एवं सर्विस टैक्स (जीएसटी) का संग्रह पिछले सारे रिकार्ड तोड़ चुका है... जीएसटी के रूप में 1.68 लाख करोड़ रुपए मिले हैं... यह इसी महीने में कुल जीएसटी संग्रह के 1.5 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े के पार जा चुका है... 2020-21 में जहां कुल जीएसटी संग्रह वार्षिक रूप से 11.37 लाख करोड़ रुपए था, वह 30 फीसदी बढ़कर 2021-22 में 14.83 लाख करोड़ रहा है... तो दूसरी तरफ जैसे-जैसे महंगाई तनाव बढ़ाती जा रही है, वैसे-वैसे राजनीतिक बयानबाजी में भी तेजी आ रही है... महंगाई के समय ऐसे विवाद या आरोप-प्रत्यारोप नए नहीं हैं... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल-डीजल पर कुछ राज्यों को वैट घटाने के लिए कहते हुए इसे प्रार्थना बताया है, हालांकि कोई भी राज्य वैट घटाने को बाध्य नहीं हैं... लेकिन इसके बावजूद राज्यों से जो आवाजें आ रही हैं, उनको सकारात्मक रूप में ही स्वीकार करना चाहिए... कुछ नेताओं को यह शिकायत है कि प्रधानमंत्री ने कोरोना संबंधी बैठक में वैट की चर्चा क्यों की..? हालांकि, यह विषय अलग है कि प्रधानमंत्री को ऐसी बैठकों में एक चिंता से हटकर दूसरी चिंता का जिक्र करना चाहिए या नहीं..? बहरहाल, यह लगभग परंपरा ही रही है कि केंद्र सरकार ऐसी सलाह राज्यों को देती है, मानने या न मानने के लिए राज्य स्वतंत्र हैं... वैसे आपत्ति दो राज्यों की ओर से तीखी आई है... पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ पार्टियों की राजनीति को समझा जा सकता है... हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जब नेता राजनीति का कोई भी अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहते... लेकिन किसी को भी निशाने पर ले लेने का यह चलन प्रशंसनीय नहीं है... फिर भी राज्य सरकारों को इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या ऐसे राज्य भी हैं, जहां पेट्रोल-डीजल की कीमत कम है..? यह तथ्य तो सामने है कि चेन्नई में पेट्रोल 111 रुपए, जयपुर में 118 रुपए, कोलकाता में 115 रुपए और मुंबई में 120 रुपए प्रति लीटर है... ध्यान दीजिए, लखनऊ में पेट्रोल 105 रुपए के करीब है... उत्तरप्रदेश के लोगों की तुलना में महाराष्ट्र के लोग भला क्यों पंद्रह रुपए ज्यादा कीमत चुका रहे हैं..? यह भी गौरतलब है कि पिछले साल नवंबर में केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती की थी, लेकिन महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, केरल, झारखंड और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने पेट्रोल, डीजल पर वैट में कटौती नहीं की... यह देखना चाहिए कि ये राज्य आखिर अपनी ओर से टैक्स में कटौती क्यों नहीं कर रहे हैं...? क्या इन राज्यों की माली हालत ज्यादा खराब है..? क्या इन राज्यों को केंद्र से पर्याप्त राजस्व नहीं मिल रहा है..? यह केंद्र और राज्यों को मिलकर तय करना चाहिए... एक ही देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में समानता होनी चाहिए... लोग तो यही चाहते हैं...
महाराष्ट्र में पेट्रोल अपेक्षाकृत महंगा है। मुंबई में प्रति लीटर डीजल से 24.38 रुपये केंद्र सरकार को और 22.37 रुपये राज्य के खाते में जा रहे हैं। वसूली का प्रतिशत पेट्रोल पर भी कमोबेश यही है। मतलब यह कि पेट्रोल, डीजल से केंद्र और राज्य, दोनों को लाभ है। दोनों का एक-दूसरे को दोषी ठहराना वाजिब नहीं है और किसी ने किसी को सीधे दोषी ठहराया भी नहीं है। आम लोगों की नजर से देखें, तो भाव कम करने की जिम्मेदारी दोनों पर है। आम लोगों की परवाह सभी सरकारों को करनी चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारें जीएसटी के लिए सहमत तो हुईं, लेकिन दोनों ने पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा। ऐसे बहुपयोगी उत्पादों को विशेष वर्ग में रखकर भारी टैक्स लगाना कहां तक सही है, इस पर आम लोगों के हित में विचार करना चाहिए। आम लोगों पर टैक्स लगाना बिल्कुल सही है, लेकिन टैक्स तार्किक व न्यायपूर्ण भी महसूस होना चाहिए। पेट्रोल और डीजल को लेकर शिकायतें पुरानी हैं। अब समय आ गया है कि समाधान किया जाए। बेशक, आज की राजनीति से भी समाधान की उम्मीद की जा सकती है।
दृष्टिकोण
अमन के रास्ते में रुकावट...
भारत और पाकिस्तान के बीच अमन बहाली को लेकर बातचीत का सिलसिला लंबे समय से रुका हुआ है... भारत ने नीति-सी बना ली है कि जब तक पाक समर्थित आतंकवाद पर लगाम नहीं लगती, तब तक पाकिस्तान से बातचीत का सिलसिला शुरू नहीं होगा... यह बात अनेक मौकों पर दुहराई जा चुकी है... एक बार फिर विदेश मंत्रालय ने इसे जोर देकर रेखांकित किया... उधर, पाकिस्तान की रट रहती है कि जब तक कश्मीर का मसला हल नहीं हो जाता, तब तक बातचीत नहीं हो सकती... इस तरह दोनों देशों के बीच वर्षों से अमन का रास्ता तलाशने के जो प्रयास चल रहे थे, वे अब ठहर गए हैं... पाकिस्तान की तरफ से न सिर्फ घुसपैठ कराने की कोशिशें जारी हैं, बल्कि सीमा पर संघर्षविराम को लेकर हुए समझौते का सैकड़ों बार उल्लंघन कर चुका है... जब से कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म हुआ है, उसकी तल्खी बढ़ गई है और वह दहशत फैलाने के मौके तलाशता रहता है... पुलवामा के बाद भी कई बड़े आतंकी हमलों में उसके हाथ देखे गए हैं... इस तरह हमारे सैकड़ों जवान मारे जा चुके हैं... ऐसे में उसके साथ शांति के लिए बातचीत का कोई बिंदु नहीं बनता... पाकिस्तान के नए निजाम ने सत्ता की कमान संभालते ही घोषणा कर दी कि वह कश्मीर मसले को नहीं छोडऩे वाला... जबकि उसे पता है कि भारत कश्मीर को अपना अंदरुनी मामला मानता है और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी भी इसे स्वीकार करती है... फिर भी उसने कश्मीर की रट लगा रखी है, तो इससे यही जाहिर होता है कि वह भारत के साथ रार खत्म करने और अमन बहाली को तैयार नहीं है... ऐसे में बातचीत का सिलसिला बने भी तो कैसे... भारत ने अनेक मौकों पर पाकिस्तान को सबूत के साथ बताया है कि उसकी सरजमीं पर आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं और वहीं से भारत में दहशत फैलाने वाली साजिशें रची जाती हैं...
मगर वह जानबूझ कर उन दस्तावेजों को सिरे से खारिज करता रहा है। अगर उसे जरा भी भारत से संबंध मधुर बनाने की इच्छा होती, तो वह इस कदर अडिय़ल रुख न अपनाता। हालांकि उसकी सरजमीं पर चल रही आतंकवादी गतिविधियों से केवल भारत की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती नहीं मिलती, बल्कि वहां के लोगों को भी खमियाजा भुगतना पड़ता है। मगर दुनिया को दिखाने के लिए दहशतगर्दों पर नकेल कसने का नाटक करता और फिर उन्हें सरकारी संरक्षण में खुलेआम घूमने देता है।
पाकिस्तान इन दिनों अपनी बदहाली के चरम पर है। कई देशों ने उसे आर्थिक मदद देनी बंद कर रखी है। भारत के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते खत्म हैं। इसी तरह चीन से नजदीकी बनाने के लोभ में उसने अमेरिका आदि देशों की मदद खो दी है। वहां के लोग गरीबी और बदहाली में जीने को विवश हैं। मगर वह दहशतगर्दी के सहारे भारत से उलझे रहने में ही जैसे अपना मुस्तकबिल मान बैठा है।
जिन दिनों उसके भारत से संबंध कुछ बेहतर हो रहे थे, उन दिनों उसकी आर्थिक स्थिति भी कुछ बेहतर हो गई थी, क्योंकि उसे दहशतगर्दी पर पैसे खर्च नहीं करने पड़ते थे। इसके अलावा भारत से उसके व्यापारिक रिश्ते भी प्रगाढ़ थे। कई रास्ते खुल गए थे। मगर यह सब शायद उसे रास नहीं आया। इसलिए कि वहां के हुक्मरान सदा भारत से दुश्मनी दिखा कर ही सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने में सफल होते रहे हैं।