सत्य और धर्म के रक्षक भगवान परशुरामजी
   Date03-May-2022

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रमेश शर्मा
भ गवान परशुरामजी अवतार सबसे प्रचंड और व्यापक रहा है। यह प्रचंडता तप और साधना में भी है और प्रत्यक्ष युद्ध में भी है और समाज की सेवा में भी। उनकी व्यापकता संसार के हर कोने में और हर युग में रही। वे अक्षय हैं, अनंत हैं। प्रलय के बाद भी रहने वाले हैं। उनका अवतार सतयुग और त्रेता के संधिकाल में हुआ। अर्थात वे ही निमित्त हैं सतयुग के समापन के और त्रेता युग के आरंभ के। वे ही निमित्त बने त्रेता और द्वापर में धर्म संस्थापना के और वे ही निमित्त बनेंगे कलियुग की पूर्णता की पूर्णता पर सतयुग निर्माण के। उनका अवतार वैशाख माह शुक्लपक्ष तृतीया को हुआ। चूंकि अवतार अक्षय है, इसीलिए यह तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है। उनका अवतार एक प्रहर रात्रि पूर्व हुआ। चूंकि अवतार ऋषि परंपरा में हुआ, इसलिए यह पल ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है। उनके आगे चारों वेद चलते हैं, पीछे दिव्य बाणों से भरा तूणीर है। वे शाप देने और दंड देने दोनों में समर्थ हैं। वे चारों वर्णों में हैं और चारों युग में हैं। जब तप साधना से ब्रहत्व को प्राप्त कर वेद ऋचाओं का उपदेश संसार को देते हैं, तब से ब्राह्मण हैं, जब प्रत्यक्ष युद्ध में दुष्टों का अंत करते हैं तो क्षत्रिय हैं। जब लोक कलाओं का विकास कर समाज को समृद्ध बनाते हैं, तब वैश्य हैं। और जब दाशराज युद्ध में घायलों की अपने हाथ से सेवा शुषुश्रा करते हैं, तब सेवा वर्ग में माने जाते हैं। भगवान शिव का भक्त तो पूरा संसार है, पर परशुरामजी उनके एकमात्र शिष्य हैं। भगवान शिव ने आषाढ़ की पूर्णिमा को ही परशुरामजी को शिष्यत्व प्रदान किया था, इसलिए वह तिथि गुरुपूर्णिमा है। उनका अवतार ऋषि परंपरा में भृगुकुल में हुआ। ये वही महर्षि भृगु हैं, जिनके चरण चिन्ह नारायण अपने हृदय पर धारण करते हैं। और श्रीमद् भागवत गीता के दसवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने कहा कि मैं ऋषियों में भृगु हूँ, इसी परम प्रतापी भृगुकुल में भगवान परशुरामजी का अवतार हुआ है। वे महर्षि ऋचिक के पौत्र और महर्षि दमदाग्नि के पुत्र रूप में प्रकट हुए। देवी रेणुआ उनकी माता हैं, जो राजा रेणु की पुत्री हैं। पुराणों में मान्यता है कि महर्षि जमदग्नि और देवी रेणुका शिव और शक्ति के रूपांश हैं। देवी रेणुका यज्ञसेनी हैं। उनका जन्म उसी यज्ञ कुंड से हुआ, जिसमें महाराज दक्ष के यज्ञ में कभी देवी सती ने स्वयं को समर्पित किया था, इसलिए यज्ञसेनी देवी रेणुका को दैवी सती का अंश माना जाता है। उन्होंने स्वयंवर में धरती के समस्त राजाओं को अनदेखा कर महर्षि जमदग्नि का वरण किया था। उनके पिता राजा रेणु ने भी बाद में तप करके ऋषित्व प्राप्त किया।
भगवान परशुरामजी के सात गुरु हैं। प्रथम गुरु माता रेणुका, द्वितीय गुरु पिता जमदग्नि, तृतीय गुरु महर्षि चायमान, चतुर्थ गुरु महर्षि विश्वामित्र, पंचम गुरु महर्षि वशिष्ठ, षष्ठ गुरु भगवान शिव और सप्तम गुरु भगवान दत्तात्रेय हैं। उन्होंने त्रेता युग में भगवान राम को विष्णु धनुष दिया, इसी विष्णु धनुष से रावण का उद्धार हुआ। भगवान परशुरामजी ने द्वापर में भगवान कृष्ण को सुदर्शन चक्र और गीता का ज्ञान दिया। इसका वर्णन महाभारत में है और कलियुग में होने वाले भगवान नारायण के कल्कि अवतार को शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा भी भगवान परशुरामजी ही देंगे। उन्होंने पूरे संसार को एक सूत्र में बांधा। संसार के प्रत्येक कोने में उनके चिन्ह मिलते हैं। संसार को श्रीविद्या देने वाले भगवान परशुरामजी ही हैं। उन्हें यह सूत्र भगवान दत्तात्रेय से मिला था और उन्हीं के संकेत उन्होंने इसका प्रचार संसार में किया। भगवान परशुरामजी के शिष्य सुमेधा हैं, जिन्होंने शक्ति उपासना के सूत्र संसार को दिए। भगवान परशुरामजी ने जब अवतार लिया, नामकरण में उनका नाम राम रखा गया। उनकी माता उन्हें अभिराम पुकारती थीं। और जब भगवान शिव ने परशु प्रधान किया, तब वे परशुराम कहलाये। लैटिन अमेरिका की खुदाई में श्रीयंत्र के आकार जैसा शिल्प मिला। इसका अर्थ है कि भगवान परशुरामजी द्वारा प्रदत्त श्री विद्या तब वैश्विक हो गई थी। उनके मार्गदर्शन में ही यह उद्घोष हुआ कि विश्व को आर्य बनाना है। आर्य अर्थात वह श्रेष्ठ नागरिक। ऐसे नागरिक जो मानवीय गुणों से युक्त हों, ऐसी मानवता जिसमें सत्य, अहिंसा, परोपकार और क्षमा के गुण हों। भगवान परशुरामजी का यही संदेश लेकर ही वैदिक आर्यों के दल धरती के विभिन्न क्षेत्रों में गए और मानवत्व की स्थापना की। भगवान परशुरामजी संदेश लेकर गए वैदिक आर्यों ने ही रोम की स्थापना की थी। प्राचीन मिस्र का रोम से साम्राज्य भी राम अर्थात भगवान परशुरामजी से ही संबंधित था। रोम और रोमन शब्दों की सीधा संबंध राम से है।
भगवान परशुरामजी का जीवन का समूचा अभियान, संस्कार, संगठन, शक्ति और समरसता के लिए समर्पित रहा है। वे हमेशा निर्णायक और नियामक शक्ति रहे। दुष्टों का दमन और सत-पुरुषों को संरक्षण उनके की चरित्र विशेषता है। भगवान परशुरामजी के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए वे परिस्थितियां जान लेना जरूरी हैं, जिनमें उनका अवतार हुआ। वह वातावरण अराजकता से भरा था। एक प्रकार से जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसा वातावरण समाज और संसार में बन गया था। इसका वर्णन ऋग्वेद से लेकर लगभग प्रत्येक पुराण में है। ऋग्वेद के चौथे मंडल के 42वें सूत्र की तीसरी ऋचा से संकेत मिलता है कि किसी Óत्रसÓ नामक दस्यु ने स्वयं को इंद्र और वरुण ही घोषित कर दिया था। उसने कहा- 'हम ही इंद्र और वरुण हैंÓ अपनी महानता के कारण विस्तृत गंभीर तथा श्रेष्ठ रूप वाली धावा-पृथ्वी हम ही हैं, हम मेघावी हैं, हम त्वष्टा देवता की तरह समस्त भुवनों को प्रेरित करते हैं तथा धावा-पृथ्वी को धारण करते हैं। इसी मंडल के इसी सूक्त के चौथी, पांचवीं और छठी ऋचा में भी ऐसे ही अहंकार से भरी उद्घोषणाएं हैं। ऋग्वेद के अन्य मंडलों में भी ऐसी अनेक ऋचाएँ हैं। ऐसे अहंकारी शासकों के कारण ऋषि परंपरा का मान नहीं रह गया था, ऋषियो और सत्पुरुषों की हत्याएं की जा रही थी, आश्रम जलाये जा रहे थे। अथर्ववेद में वर्णन आया है कि अनाचार अत्याधिक बढ़ गए थे। उन्होंने भृगुवंशियों को विनष्ट कर डाला और बीत हव्य हो गए। तब पूरे संसार में हाहाकार हो गया था। चारों तरफ ईश्वर से बचाने की प्रार्थना की जाने लगी। वेदों में ऐसी ऋचाएं हैं, जिनमें इस अनाचार का वर्णन है और देवों से सहायता करने का आह्वान भी। जिन देवताओं से सहायता करने के लिए आह्वान किया गया, उनमें अग्निदेव, वरुण, इंद्र आदि देवी-देवताओं से रक्षा करने की प्रार्थना की गई है। ऋषियों और मनुष्यों पर आए इस संकट को मिटाने के लिए नारायण का यह छठवां अवतार हुआ। इससे पूर्व हुए नारायण के पांचों अवतार आंशिक या आवेश के अवतार माने गए, लेकिन परशुरामजी पहला पूर्ण अवतार है। उनका जन्म कुल सुविख्यात भृगुवंश विज्ञान और अध्यात्म के नए-नए अनुसंधानों के लिए जाना जाता है। अग्नि का अविष्कार भृगु ऋषियों ने किया। (ऋग्वेद 1-127-7)। नारायण की हृदेश्वरी लक्ष्मी महर्षि भृगु की बेटी है। (विष्णु पुराण अध्याय 9 श्लोक 141) इसी भृगुवंश में भगवान परशुरामजी का अवतार हुआ। उनकी माता देवी रेणुका उन्हें अभिराम कहा करती थी। पिता महर्षि जमदग्नि ने ÓभृगुरामÓ पुकारा, तो ऋषि कुलों में वे भार्गव राम कहलाए।
उस कालखंड में मानवीय गुण और संस्कार अपने विकृति की पराकाष्ठा पर पहुंच गए थे। संसार में नरबलि और पशुबलि जैसी कुप्रथाएँ आरंभ हो गई थीं। भगवान परशुरामजी ने बाकायदा अभियान चलाकर ऐसी कुप्रथाओं का अंत किया। इससे संबंधित एक प्रतीकात्मक कथा पुराणों में मिलती है। उसके अनुसार एक आयोजन में बालक शुन:शैप की बलि दी जा रही थी। भगवान परशुरामजी तब किशोरवय में थे। अपने मित्र विमद और देवी लोम्हार्षिणी के साथ वे यज्ञ स्थल पर पहुंचे। उन्होंने पहले यज्ञाचार्य से शास्त्रार्थ किया। किसी भी प्राणी की बलि को प्रकृति और परमात्मा के विधान के विपरीत बताया। भगवान परशुरामजी ने कहा कि सभी परम ब्रह्म के अंश हैं, तब एक अंश दूसरे अंश का हंता कैसे हो सकता है। लेकिन बात नहीं बनी, तब भगवान परशुरामजी ने वरुण देव का आह्वान किया। वरुण प्रकट हुए। उन्होंने नरबलि के निषेध करने की घोषणा की। वरुण देव से स्पष्ट किया कि बलि का देवों से कोई संबंध नहीं, यह दैत्यों के अहंकार का प्रतीक है। इससे पूरे संसार को प्राणीमात्र में देवत्व होने का संदेश मिला। तार्किक दुष्टि से प्रश्न वरुण के प्रकट होने या न होने का नहीं है। इस कथा से संकेत मिलता है कि अपने किशोरवय से ही परशुरामजी ने समाज की कुप्रथाओं को रोककर एक संस्कारी समाज के निर्माण का अभियान छेड़ दिया था। उस काल में जितने अराजक और आतंकी तत्व थे, वे कोई और नहीं थे। परस्पर संबंधी भी थे। सभी उस परम पिता परमात्मा की संतान थे, जिन्होंने देवों को भी बनाया, सभी में उनका अंश है, लेकिन जब लोग भ्रष्ट हो गए, मूल्यों से गिर गए थे और 'आर्यत्वÓ के संस्कारों से दूर हो गए थे। ऐसे सभी तत्वों को ऋषियों ने उनको बहिष्कृत कर दिया था। अपने बहिष्कार से अपमानित इन राजन्यों ने न केवल ऋषियों और यक्षों के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया, बल्कि वे निरंकुश और स्वेच्छाचारी हो भी गए, जिससे संसार में हाहाकार मच गया।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)