विश्व का सर्वाधिक न्यायपूर्ण हिन्दू समाज
   Date03-May-2022

dharmdhara
धर्मधारा
इ समें मुख्य बात यह है कि धर्मशास्त्रों में जो व्यवस्थाएं हैं, वे जाति व्यवस्था को अत्यधिक गतिशील और व्यापक व्यवस्था सिद्ध करते हैं, जिसमें कई प्रकार की उन्नति और अवनति व्याख्यायित है। साथ ही इन विषयों में धर्मशास्त्रों के प्रतिपादन भी अनेक प्रकार के हैं। इससे स्पष्ट है कि यह एक अत्यंत गतिशील और व्यापक व्यवस्था का प्रतिपादन है। नितांत रूढ़ और संकीर्ण समाज व्यवस्था वाले यूरोपीय ईसाइयों और अन्य समुदायों को यह गतिशीलता समझ में नहीं आती। इस संदर्भ में श्रेणी, पूग, गण, व्रात एवं संघ शब्दों की जानकारी आवश्यक है। कात्यायन के मतानुसार ये सभी समूह या वर्ग कहे जाते थे- 'गणा: पाषण्डपूगाश्च व्राताश्च श्रेणयस्तथा।
समूहस्थाश्च ये चान्ये वर्गाख्यास्ते बृहस्पति:।।
स्मृतिचन्द्रिका (व्यवहार) में उद्धृत कात्यायन-वचन।Ó
पाणिनि ने पूग, गण, संघ, व्रात की व्यत्पत्ति आदि की है। पाणिनि के काल तक इन शब्दों के विशिष्ट अर्थ स्थिर हो गए थे। महाभाष्य ने व्रात को उन लोगों का दल माना है, जो विविध जातियों के थे और उनके कोई विशिष्ट स्थिर व्यवसाय नहीं थे, केवल अपने शरीर के बल से ही अपनी जीविका चलाते थे। काशिका ने पूग को विविध जातियों के उन लोगों का दल माना है, जो कोई स्थिर व्यवसाय नहीं करते थे। कौटिल्य ने एक स्थान पर सैनिकों एवं श्रमिकों में अंतर बताया है, और दूसरे स्थान पर यह कहा है कि कम्बोज एवं सुराष्ट्र के क्षत्रियों की श्रेणियां आयुधजीवी एवं वार्ता (कृषि) जीवी है। वशिष्ठ धर्मसूत्र ने श्रेणी एवं विष्णुधर्मसूत्र ने गण का प्रयोग संगठित समाज के अर्थ में किया है। मनु ने संघ का प्रयोग इसी अर्थ में किया है। विविध भाष्यकारों ने विविध ढंग से इन शब्दों की व्याख्या उपस्थित की है। कात्यायन के अनुसार नैगम एक ही नगर के नागरिकों का एक समुदाय है, व्रात विविध अस्त्र धारी सैनिकों का एक झुंड है, पूग व्यापारियों का एक समुदाय है, गण ब्राह्मणों का एक दल है, संघ बौद्धों एवं जैनों का एक समाज है, तथा गुल्म चांडालों एवं श्वपचों का एक समूह है। वस्तुत: गणतंत्र का अर्थ है ब्राह्मणों के द्वारा प्रतिपादित सनातन धर्म के अनुसार चलने वाला तंत्र। वर्तमान में इसका यूरोप के रिपब्लिक के अर्थ में प्रयोग होता है। भारतीय अर्थ में नहीं। याज्ञवल्क्य ने ऐसे कुलों, जातियों, श्रेणियों एव गणों को दंडित करने को कहा है, जो अपने आचार-व्यवहार से च्युत होते हैं।