आत्मकल्याण का मार्ग
   Date11-May-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
म गध देश के राजा चित्रांगद वन विहार हेतु निकले। वहां वन में उन्होंने महात्मा की एक कुटिया देखी। राजा ने उन्हें निर्धन समझकर उनके पास धन भिजवाया, पर उन महात्मा ने लौटा दिया। तब राजा ने उनकी कुटिया में जाकर उनसे पूछा- 'महाराज! आपने हमारा धन क्यों अस्वीकार कर दिया, आपकी कुछ सहायता हो जाती।Ó महात्मा हँसकर बोले- 'मेरे पास पर्याप्त धन है।Ó राजा ने कुटिया में चारों ओर नजर घुमाकर देखा कि वहां केवल एक आसन, एक घड़ा व एक चादर थी। राजा ने कहा- 'मुझे तो कुछ दिखाई नहीं देता। आपका धन कहां है?Ó वे महात्मा राजा का कल्याण चाहते थे, इसलिए उन्होंने राजा के कान में कहा- 'मैं रसायनी विद्या जानता हूं। किसी भी धातु से सोना बना सकता हूं और इसलिए मुझे जब धन की आवश्यकता होगी, तब बना लूंगा।Ó यह सुनकर राजा बेचैन हो गया। वह महात्मा से बोला-'महाराज! कृपया मुझे वह विद्या सिखा दीजिए, ताकि मैं प्रजा का कल्याण कर सकूं।Ó महात्मा ने कहा- 'इसके लिए तुम्हें एक वर्ष तक मेरे पास मेरा प्रवचन ध्यानपूर्वक सुनना होगा। एक वर्ष उपरांत मैं तुम्हें वह विद्या सिखा दंूगा।Ó राजा धन के लोभ में नित्य आने लगा। धीरे-धीरे उसका जीवन रूपांतरित होने लगा। एक वर्ष बाद महात्मा बोले-'विद्या सीखोगे?Ó राजा ने कहा-'आपकी कृपा से अब तो मैं स्वयं ही रसायन बन गया हूं। अब किसी नश्वर विद्या को सीखकर क्या करूंगा?Ó इस तरह उन महात्मा ने राजा को आत्मकल्याण का मार्ग दिखा दिया।