अंग्रेजों को थी पैन-इस्लामिक मूवमेंट की जानकारी
   Date11-May-2022

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स्वदेश संकलन
क लकत्ता में उसके दौरे के दौरान एक काउंसलर मौलवी अहमद उससे मिलने आया। मौलवी ने बताया- 'मुसलमानों के लिए यह संभव ही नहीं कि हिन्दुओं के साथ मिलकर कुछ भी किया जा सकता है।Ó इस सोच ने पहली बार भारत में मुसलमानों के लिए अलग से प्रतिनिधित्व की मांग रखी। लेजिस्लेटिव काउंसिल में मोहम्मद युसूफ ने अपने एक भाषण में मुसलमानों के आरक्षण की मांग की। अब यह साफ हो गया था कि मुसलमानों ने राजनीतिक मामलों में ही अपनी राहें हिन्दुओं से अलग कर ली है।
1908 में फ्रांस से संचालित समाचार-पत्र 'तलवारÓ में सावरकर ने लिखा था - 'ऐतिहासिक सत्य को यथातथ्य प्रस्तुत करना मेरे ग्रंथ का उद्देश्य तो है ही, साथ ही मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लोगों के अंत:करण में क्रांति की आग प्रज्ज्वलित कर दूसरा क्रांति युद्ध करना भी है।Ó
खलीफा का शासन (पैन-इस्लामिक मूवमेंट) : कुछ मुस्लिम नेताओं ने ब्लंट को बताया कि इजिप्ट वार (1881-12) में हम पाशा से उम्मीद थी कि वे हमारा भाग्य बदल देंगे। यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिन्दुओं के स्थान पर भारतीय मुसलमानों ने भारत से बाहर अपने संबंध स्थापित करने शुरू कर दिए थे। इस सोच ने भारतीय राष्ट्रवाद को नुकसान पहुंचाया।
भारत में इस मूवमेंट की शुरुआत जमाल अफगानी ने की, जो कि अफगानिस्तान का रहने वाला था और 1881 के आसपास भारत आया था। उसमें गुप्त रूप से भारतीय मुस्लिम नेताओं से मुलाकात की। कलकत्ता में वह नवाब अब्दुल लतीफ और उसके साथ आये शिक्षित मुसलामानों के एक छोटे दल से मिला। इसमें अमीर अली भी शामिल था। राष्ट्रवादी नेता बिपिन चंद्र पाल अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र करते हुए लिखते हैं- 'इन सभी में पैन-इस्लामिक वायरस का टीकाकरण किया गया। इसके बाद उन्होंने हिन्दुओं की राजनीतिक गतिविधियों से दूरियां बनाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे हमारे राष्ट्रीय प्रयासों में हिन्दुओं और प्रबुद्ध मुसलमानों के बीच गहरी खाई उत्पन्न होनी लगी।Ó
मुसलमानों के इस पैन-इस्लामिक मूवमेंट की ब्रिटिश सरकार को जानकारी थी। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट, हेमिल्टन ने वायसराय एल्गिन को 30 जुलाई, 1897 को एक पत्र लिखा- 'पैन-इस्लामिक काउंसिल के माध्यम से हमें भारत में साजिश और उत्तेजनाओं को भड़काने का नया अवयव मिल गया है।Ó
हिन्दुओं के विरुद्ध-साम्प्रदायिक दंगे : ब्रिटिश सरकार की हिन्दुओं के खिलाफ नीति का असर दिखाई देना शुरू हो गया था। साल 1885-1897 के बीच लाहौर (1885), करनाल (1885), दिल्ली (1886), होशियारपुर (1889), लुधियाना (1889), अम्बाला (1889), डेरा गाजी खान (1889), सेलम (1891), आजमगढ़ (1893), बम्बई शहर (1893), मियांवली (1893), गया (1893), आरा (1893), सारण (1893), चंपारण (1893), छपरा (1893) और कलकत्ता (1897) में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़काए गए।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय-द्वि-राष्ट्रवाद की नींव, हिन्दू विरोधी : यह आश्वस्त होकर कि अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी विचार एवं संस्कृति वास्तविक प्रगति की एकमात्र सच्ची नींव थी, सैयद अहमद ने इस उद्देश्य से कई संस्थानों की स्थापना की। उन्होंने 1869 में इंग्लैंड का दौरा किया और 1870 में लौटने के बाद अपने समुदाय के बीच अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रसार के लिए जोरदार प्रचार किया। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 1877 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की। सैयद अहमद के प्रयास सामाजिक और धार्मिक सुधारों तक ही सीमित नहीं थे। उन्होंने मुस्लिम राजनीति को एक अलग नया मोड़ दिया, जो हिन्दू विरोधी बन गई।
द्वि-राष्ट्र सिद्धांत : साल 1883 में उन्होंने एक लंबा भाषण दिया, जो भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा के खिलाफ एक वाक्पटु दलील थी। यह राजनीतिक विचारों के साथ हिन्दू और मुस्लिम नेताओं को विभाजित करने वाले व्यापक प्रयासों को इंगित करता है। उन्होंने कहा- 'मुसलमान अल्पमत में हैं, लेकिन जब बहुमत वाले उन पर अत्याचार करते हैं तो उनके हाथ में तलवार होने की संभावना होगी।Ó उन्होंने जिस आंदोलन की शुरुआत की, वह द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के ठोस आधार पर था।
अलीगढ़ मुस्लिम आंदोलन के मूलभूत लक्ष्य और उद्देश्य : (1) हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग दृष्टिकोण और परस्पर विरोधी हितों के साथ दो विभिन्न राजनीतिक संस्थाएं बनाए। (2) भारत में प्रतियोगी परीक्षा द्वारा उच्च कार्यालयों में नियुक्ति के लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित प्रतिनिधि संस्थानों का अनुदान मुसलमानों के लिए हानिकारक होगा, क्योंकि वे हिन्दू वर्चस्व के अधीन होंगे, जो ब्रिटिश शासन से कहीं अधिक खराब है। (3) फलस्वरूप मुसलमान को अंग्रेजों की सर्वोपरिता को अपने हितों की रक्षा का अधिकार मानना चाहिए और सरकार के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन से खुद को अलग रखना चाहिए। (4) चूंकि मुस्लिम हित अंग्रेजों के हाथों में काफी सुरक्षित हैं, इसलिए मुस्लिमों को स्वयं के सांस्कृतिक विकास में दिलचस्पी लेनी चाहिए। इसलिए राजनीति से दूर रहना, लेकिन हिन्दू राजनीतिक आंदोलन की क्षति का जवाब देना चाहिए।
अंग्रेजों से दिशा-निर्देश : अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज हिंदुओं के खिलाफ प्रचार का मुख्य केंद्र बन गया था। उसका निर्देशन एक ब्रिटिश व्यक्ति बेक के पास था, जो कि सैयद अहमद का करीबी दोस्त और मार्गदर्शक था। अलीगढ़ कॉलेज के साहित्यिक मुख पत्र अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट का संपादन बेक के पास था। वह यह काम सैयद अहमद के लिए करता था। उसने बंगालियों के राजनीतिक और सामाजिक विचारों के खिलाफ जहर उगलना शुरू किया। एक के बाद एक राजनीतिक लेख प्रकाशित किए, जिनके केंद्र में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत शामिल था। उसने लिखा कि भारत के लिए संसदीय व्यवस्था अनुपयुक्त है और इसके स्वीकृत होने की स्थिति में, बहुसंख्यक हिन्दुओं का वहां उस तरह राज होगा, जो किसी मुस्लिम सम्राट का भी नहीं था।
मैकाले की शिक्षा-पश्चिमी सभ्यता का प्रचार, मैकाले का दृष्टिकोण : मैकाले ने शिक्षित भारतीय लोगों के उस वर्ग को तैयार किया, जिन्हें पश्चिमी संस्कृति में ढाला गया। इससे देश के सामान्य लोगों से उनका सम्बन्ध समाप्त हो गया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार की मिलीभगत से स्थानीय नागरिकों का शोषण किया गया। मैकाले ने धृष्टता की सीमा को पार करते हुए भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक एकता के तोडऩे के प्रयास किए। साल 1836 में अपने पिता को भेजे एक पत्र में उसने लिखा- 'हमारे अंग्रेजी स्कूल शानदार रूप से कामयाब हो रहे हैं। शुरुआत में हमें यह मुश्किल लगा और वास्तव मेंकुछ मामलों में असंभव भी था। इस शिक्षा का हिन्दुओं पर असाधारण प्रभाव है। जिस हिन्दू ने अंग्रेजी शिक्षा को प्राप्त किया है, वह अपने धर्म के प्रति ईमानदार नहीं रहेगा। विशुद्ध ईश्वरवादी होते हुए भी कुछ लोग इस शिक्षा को नीतिगत रूप से लेंगे और कई ईसाई धर्म स्वीकार करेंगे। यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा की योजनाओं का पालन किया जाता है तो बंगाल में अगले तीस वर्षों में प्रबुद्ध वर्गों के बीच एक भी मूर्ति नहीं होगी। यह ज्ञान और विचारों की कार्रवाई से प्रभावी हो जाएगा। इसके लिए धर्मांतरण और धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं होगी। इन संभावनाओं की मुझे हार्दिक खुशी हैं।Ó
इतिहासकारों का दृष्टिकोण : मैकाले के शिक्षा में परिवर्तन पर आर.सी. मजूमदार लिखते हैं- 'पश्चिम के प्रभाव के द्वारा इंग्लिश शिक्षा ही भारत में बदलाव का अकेला कारक था।Ó
प्रभाव : इंग्लिश शिक्षा के प्रभाव से बंगाल सहित भारत के अन्य हिस्सों में स्कूल और कॉलेज बड़ी संख्या मेंस्थापित हुए। साल 1817-1857 के दौरान अंग्रेजी शिक्षा का वर्ग तैयार किया गया। कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास के तीन विश्वविद्यालयों की 1857 में स्थापना हुई। इन विश्वविद्यालयों से संबंधित कई कॉलेजों और स्कूलों ने अंग्रेजी शिक्षित भारतीयों की संख्या में असाधारण वृद्धि की।
मुस्लिम लीग और विभाजन, पाकिस्तान की नींव : आगा खान के नेतृत्व में 1 अक्टूबर, 1906 को 36 मुसलमानों का एक दल वायसराय मिंटो से मिला। इस मुलाकात का मकसद म्युनिसिपल और जिला से लेकर इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में मुसलमानों के आरक्षण था। मिंटो ने उनकी मांगों पर सहमति जताते हुए कहा- मैं पूरी तरफ से आपसे सहमत हूं। मैं आपको यह कह सकता हूं कि किसी भी प्रशासनिक परिवर्तन में मुस्लिम समुदाय अपने राजनीतिक अधिकारों और हितों के लिए निश्चिंत रहे।Ó यह ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक घोषणा थी, जिसमें हिन्दू और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्रों के रूप में देखा गया। इस एक मुलाकात ने पाकिस्तान की नींव रख दी थी।
इस प्रतिनिधि दल का डिजाइन खुद ब्रिटिश सरकार ने तय किया था। इसका मकसद मुसलमानों को उस राजनीतिक संघर्ष से दूर रखना था, जिसका संचालन हिन्दुओं द्वारा किया जा रहा था। मिंटो की मुस्लिम दल से मुलाकात पर लेडी मिंटो लिखती हैं- 'भारत और भारतीय इतिहास को कई सालों तक प्रभावित करेगा। यह 60 मिलियन लोगों को विद्रोही विपक्ष के साथ जुडऩे से रोकने के अलावा कुछ नहीं हैं।Ó रामसेमैक्डोनाल्ड ने इस मुलाकात को ष्ठद्ब1द्बस्रद्ग ड्डठ्ठस्र क्रह्वद्यद्ग के नियम पर आधारित जानबूझकर और पैशाचिक काम बताया। अपनी पुस्तक अवाकिंग ऑफ़ इंडिया में यह मानते हैं कि मुसलमानों को हिन्दूओं से ज्यादा मताधिकार मिले हुए थे। संख्या के हिसाब से उनका प्रतिनिधित्व भी ज्यादा था।
(विचार 1925 से साभार)