एकाग्रता में बाधक आंतरिक द्वंद्व
   Date11-May-2022

dharmdhara
धर्मधारा
ए काग्रता के लिए दिनचर्या का संतुलित होना आवश्यक है। इसमें शयन, जागरण, श्रम, विश्राम, नींद आदि सभी क्रमबद्ध हों, तो कार्य में मानसिक एकाग्रता सहज रूप से बनी रहती है। इनमें बरती गई अतिवादिता मानसिक संतुलन को डगमगा देती है, जिससे मन का एकाग्र होना कठिन हो जाता है। वास्तव में शरीर के स्वास्थ्य के साथ एकाग्रता का बहुत ही गहरा संबंध है। अत: शरीर को जितना स्वस्थ एवं निरोग हो सके, उतना स्वस्थ रखने का प्रयास करना चाहिए। उचित श्रम, निद्रा एवं विश्राम का एकाग्रता से गहरा संबंध है। श्रम जहां शरीर को स्वस्थ रखता है, इसके साथ कर्तव्यपालन का संतोष मन को सहज रूप से शांत, स्थिर एवं संतुलित रखता है। अथक श्रम के बाद अल्प विश्राम का मिश्रण व्यक्ति को स्फूर्तिवान बनाए रखता है और गहरी नींद तो एक अच्छे टॉनिक का काम करती है और मन को पूर्ण एकाग्रता की अवस्था में ला देती है। इसके साथ ही एकाग्रता में बाधक तत्वों का बोध भी आवश्यक है, जिससे कि हम इनको दूर करने का प्रयास कर सकें, अस्त-व्यस्त दिनचर्या मानसिक एकाग्रता को प्राप्त कर पाने में एक बड़ा व्यवधान है, जो तनाव-अवसाद का कारण भी बनती है। दिनचर्या को क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित कर हम इसे दुरुस्त कर सकते हैं। इसके लिए समय पर सोने-जागने, कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने करना भी उचित रहता है। इसके साथ ही गप्पबाजी एवं गलत संग-साथ एकाग्रता की प्राप्ति में बड़े व्यवधान हैं। यार-दोस्तों के बीच गप्पबाजी में पता ही नहीं चलता कि कितना समय बीत गया, साथ ही कब प्रपंच अर्थात परचर्चा एवं परनिंदा में उलझ गए, यह भी भान नहीं रहता। आज मोबाइल युग में स्मार्टफोन एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने है। इसके मायाजाल में आज की हर पीढ़ी इस कदर उलझी हुई है कि मानसिक एकाग्रता की प्राप्ति उनके लिए एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। अत: स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग से जितना बचा जा सके, उचित रहेगा तथा इसका संयत उपयोग भी अभीष्ट है।