कानून की वैधता को चुनौती...
   Date10-May-2022

vishesh lekh
देश में लंबे समय से एक ऐसा माहौल निर्मित करने का षड्यंत्र चल रहा है, जिसमें कैसे भी केन्द्र व राज्य सरकार के उन फैसलों या निर्णयों के खिलाफ एक ऐसा भ्रम पैदा करने का सुनियोजित खेल चलता है, जिसमें कृत्रिम विरोध का गुबार पैदा किया जाता है... फिर उसी गुबार के समर्थन में देशद्रोही यहां तक कि राष्ट्र की आस्था-अस्मिता से जुड़े बिन्दुओं पर भी नफरती बयानबाजी का खेल शुरू हो जाता है... इससे भी बढ़कर कई बार तो सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, यहां तक कि राष्ट्रीय राजमार्गों को जाम करने में भी गुरेज नहीं किया जाता है... याद करें जब देश में सीएए और एनआरसी की जब पहल हुई तो किस तरह से शाहीनबाग में महीनों भय-भ्रम पैदा करने वाले अराजक तत्वों का जमावड़ा लगा रहा... क्या यह देश के विकास व निर्माण से जुड़े मुद्दों पर देशद्रोही रणनीति का हिस्सा नहीं था..? आज उसी शाहीनबाग में अवैध निर्माण पर बुलडोजर चल रहे हैं... कुछ लोगों की मानसिकता ऐसी बन चुकी है कि वे देश के खिलाफ किसी भी स्तर पर जाकर बोलें या करें, उन्हें रोका ना जाए, इसीलिए वे अब देशद्रोह कानून की वैधता अर्थात धारा 124ए को चुनौती देकर उसकी समीक्षा के लिए भी कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुका है... यानी इनके मंसूबे स्पष्ट तौर पर राष्ट्रघाती हैं, तभी तो वे ऐसे धत्कर्मों के पक्ष में खड़े होने को लालायित हैं, जिसमें देशद्रोही और राष्ट्रघाती मंसूबों की बू आ रही है... क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की गई है और जिसमें देशद्रोह कानून की वैधता को चुनौती दी गई है, उसके पक्षकार कुछ पत्रकार, एनजीओ और नेता हैं... ये वे ही हैं, जिन्होंने कभी शाहीनबाग की उस जमावड़ा रैली को सही ठहराया है, जिसने आम जीवन को दुष्कर कर दिया था... अब वही लोग कानून की समीक्षा की बात कर रहे हैं, लेकिन अब केन्द्र सरकार ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि देशद्रोह कानून की समीक्षा की जरूरत नहीं है... क्योंकि केदारनाथ से बनाम बिहार राज्य सरकार (1962) केस में आया फैसला एक बेहतर उदाहरण है... जिस पर आगे विचार की कोई जरूरत नहीं... क्योंकि यह फैसला साफ करता है कि धारा 124ए को अनुच्छेद 14, 19 और 21 में दिए गए संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर कसा गया था... महज इसलिए कि इस मामले में अनुच्छेद 14 और 19 का जिक्र नहीं किया गया था... यह नहीं कहा जा सकता है कि इसका अंतिम निर्णायक निर्णय हल्का हो गया है... बात सही भी है कि तीन जजों की पीठ आखिर बड़ी पीठ के फैसलों की समीक्षा कैसे कर सकती है..? देशद्रोही कानून को ठेंगा दिखाने का यह धत्कर्म जब सड़क पर विफल हो गया तो उसे न्यायालय के जरिये आगे बढ़ाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है.., जिसे समय रहते रोकना होगा...
दृष्टिकोण
लाड़ली लक्ष्मी का व्याप...
मध्यप्रदेश में लाड़ली लक्ष्मी योजना ने न केवल बेटियों के संरक्षण, सुरक्षा व उनके समूचित विकास का मार्ग प्रशस्त किया है, बल्कि इस योजना के चलते ही बेटी को बोझ की जगह वरदान मानने का मानस भी तेजी से निर्मित हुआ है... शिवराज सरकार की अब तक की सभी योजनाओं में अगर लाड़ली लक्ष्मी को सर्वोपरि, सफल और सर्वोत्कृष्ठ क्रम पर रखा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस योजना के पीछे शिवराज सरकार का मानस बेटियों की सुरक्षा के साथ ही उन्हें इतना आत्मनिर्भर बनाना कि परिवार उन्हें बोझ न समझे... तभी तो इस लाड़ली लक्ष्मी योजना को मध्यप्रदेश से बाहर अन्य राज्यों की सरकारों यहां तक कि गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी क्षेत्रीय सरकारों ने भी हाथोंहाथ लिया... आज देशभर में बेटियों को पढ़ाने-लिखाने और आगे बढ़ाने के लिए लाड़ली लक्ष्मी की भांति ही नए-नए नाम से योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिसका श्रेय शिवराज सरकार को जाता है... अब मुख्यमंत्री चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना को वृहद व्याप देते हुए लाड़ली लक्ष्मी योजना 2.0 का शुभारंभ किया है... इससे न केवल बाल विवाह रोकने में सहायता मिलेगी, बल्कि लाड़ली लक्ष्मी को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए सरकार अपने स्तर पर फीस उपलब्ध करवाने एवं संपूर्ण खर्चों को उठाने की पहल कर चुकी है... जिससे इस योजना में और बेहतर तरीके से बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प पूरा हो सकेगा... लाड़ली लक्ष्मी की उच्च शिक्षा से लेकर अब शिवराज सरकार उन ग्राम पंचायतों को भी प्रोत्साहित करने की पहल कर रही है... जिनके क्षेत्र में कोई कुपोषित बालिका या बालिका अपराध अथवा बाल विवाह ना होने के साथ ही शालाओं में लाड़लियों की शत-प्रतिशत उपस्थिति का लक्ष्य तय होगा... उन पंचायतों को लाड़ली लक्ष्मी पंचायत के नाम से प्रस्तुत किया जाएगा... सही मायने में यह बेटियों को आगे बढ़ाने की उत्तम पहल है...