श्रम ही तप
   Date10-May-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
रा जा विड़ाल मुनि वैवस्वत को प्रणाम करके चुपचाप बैठ गए। त्रिकालदर्शी गुरु ने जान लिया कि विड़ाल किसी गंभीर चिंता से व्याकुल हैं। उन्होंने पूछा 'विड़ाल! तुम आज अशांत से दिखते हो। तुम्हें कोई चिंता सता रही हो तो बताओ?Ó शिष्य ने अपनी अंतर्वेदना को प्रकट करते हुए कहा-'देव! न जाने क्यों प्रजा जन अशांत हैं, लोग धर्म और शांति से विमुख हो रहे हैं। धन-धान्य की कमी होती जा रही है, लोग परस्पर स्नेह-भाव से नहीं रहते, अपराध-वृत्ति भी वृद्धि पर है।Ó वैवस्वत ने कहा-'वत्स! जिस देश में लोग कठोर परिश्रम से जी चुरावें, जो समाज श्रम को सम्मानपूर्ण स्थान न दे, वहां श्री-समृद्धि कैसे रह सकती है? श्रम को ही तप समझकर यदि साधना की जाए तो समाज के ये दोष स्वयमेव दूर हो जाएं।Ó वस्तुत: श्रम ही वह देवता है, जो सारी सिद्धियों का स्वामी है। आयुष्य के पूर्वाद्र्ध में इसके संपादन हेतु ही विधाता ने मनुष्य को शक्ति सम्पन्न बनाया है। जब भी इसकी उपेक्षा होती है, तब समाज अव्यवस्थित हो जाता है।