अंग्रेजों के विरुद्ध संपूर्ण विद्रोह था 1857 का संग्राम
   Date10-May-2022

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स्वदेश संकलन
भा रत में कौन-सा भारतीय होगा, जो 1857 के महासमर की घटनाओं को सुनकर गौरव अनुभव न करे। यह विश्व की अद्भुत, आश्चर्यजनक तथा बेजोड़ घटना है। इसने समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया। यह साम्राज्यवादी अंग्रेज सरकार के लिए भारतवासियों की सामूहिक व देशव्यापी चुनौती थी। लाखों व्यक्ति इसमें मारे गए। अंग्रेजों ने केवल नरसंहार ही नहीं अपितु भयंकर लूटमार भी की थी। लगातार एक वर्ष से भी अधिक चला था यह संग्राम। यह भ्रम फैलाया गया कि संग्राम केवल उत्तर भारत का था। वास्तव में पूरे भारत ने स्वतंत्रता की यह लड़ाई लड़ी है। पूरा देश लड़ा, सभी वर्ग लड़े, सैनिक, सामंत, किसान, मजदूर, दलित, महिला, बुद्धिजीवी सभी वर्ग लड़े थे। जस्टिस मैकार्थी ने हिस्ट्री ऑफ अवर ओनटाइम्स में लिखा है - 'वास्तविकता यह है कि हिंदुस्तान के उत्तर एवं उत्तर पश्चिम के सम्पूर्ण भूभाग की जनता द्वारा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया गया था।Ó 1857 का स्वतंत्रता संग्राम सत्ता पर बैठे राजाओं और कुछ सैनिकों की सनक मात्र नहीं था। वह प्रयास असफल भले ही हुआ हो, पर भविष्य के लिए परिणामकारी रहा। सारी पाशविकता के बावजूद अंग्रेज हिंदुस्थानी जनता की स्वतंत्रता प्राप्ति की इच्छा को दबा नहीं सके थे। अंग्रेजों ने हिंदुस्थानी जनता की स्वतंत्रता प्राप्त करने की तीव्र इच्छा को बुरी तरह से कुचल दिया था, ऐसा कहा जाता है - वास्तविकता यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के संयुक्त प्रयासों की यह शुरुआत थी। अंग्रेजों का जुए को कंधे से उतार फेंकने की जो शुरुआत हुई थी, वह न केवल जारी रही अपितु भविष्य के भारत को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। जिस किसी ने भी स्वतंत्रता महायज्ञ में अपना योगदान दिया, वे सभी वंदनीय हैं।
सावरकर - 'जिन लोगों में और कुछ करने का साहस अथवा सामथ्र्य नहीं था, पर अपने इष्ट देवता की पूजा करते समय इतनी प्रार्थना भर की हो कि 'मेरी मातृभूमि स्वतंत्र कर दोÓ, उनका भी स्वतंत्रता प्राप्ति में स्थान है।Ó 1857 के पश्चात तीन महत्वपूर्ण पक्ष हैं। 1. विभिन्न व्यक्तियों व संस्थाओं द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सत्याग्रह व सशस्त्र क्रांति थी। 2. विदेश प्रवास कर स्वतंत्रता के पक्ष में वातावरण तैयार किया व स्वाधीनता के लिए हिंदुस्थान में हो रहे प्रयासों को सहायता की। 3. सम्पूर्ण देश में सत्याग्रह व आंदोलनों ने अखिल भारतीय स्वरूप प्रयास किया।
सरदार पणिकर 'ए सर्वे ऑफ इंडियन हिस्ट्रीÓ में लिखते हैं -'सबका एक ही और समान उद्देश्य था-ब्रिटिशों को देश से बाहर निकालकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करना। इस दृष्टि से उसे विद्रोह नहीं कह सकेंगे। वह एक महान राष्ट्रीय उत्थान था।Ó शिवपुरी छावनी में न्यायाधीश के सामने तात्या टोपे ने कहा -'ब्रिटिशों से संघर्ष के कारण मृत्यु के मुख की ओर जाना पड़ सकता है, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूं। मुझे न किसी न्यायालय की आवश्यकता है, न ही मुकदमे में भाग लेना है।Ó वासुदेव बलवंत फड़के- 'हे हिन्दुस्तानवासियों! मैं भी दधीचि के समान मृत्यु को स्वीकार क्यों न करूं? अपने आत्मसमर्पण से आपको गुलामी व दु:ख से मुक्त करने का प्रयास क्यों न करूं? आप सबको अंतिम प्रणाम करता हूं।Ó 'अमृत बाजार पत्रिकाÓ ने नवम्बर 1879 में वसुदेव बलवंत फड़के के बारे में लिखा था -'उनमें वे सब महान विभूतियां थी, जो संसार में महत्कार्य सिद्धि के लिए भेजी जाती हैं। वे देवदूत थे। उनके व्यक्तिव की ऊंचाई सामान्य मानव के मुकाबले सतपुड़ा व हिमालय से तुलना जैसी अनुभव होगी।Ó ईस्ट इंडिया कम्पनी का हिन्दुस्थान के ईसाईकरण पर जोर था। सैनिक छावनियों में राम, कृष्ण, पैगम्बर, वेद व कुरआन को ईसाई मिशनरी गालियां देते थे, हिन्दुस्तानी सैनिक द्वारा विरोध करने पर उसे सज़ा दी जाती थी। सैनिकों के थोक मतांतरण से असंतोष अंदर ही अंदर खदबदाने लगा। सरकारी सहायता से ईसाई मिशनरियों बढऩे लगीं। हिन्दुस्थान के ईसाई के सम्बन्ध में 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के अध्यक्ष ने हाउस ऑफ कॉमंस में अपने भाषण में कहा 'ईश्वर ने हिन्दुस्थान का विशाल साम्राज्य इग्लैंड के हवाले किया है। वह इसलिए कि हिन्दुस्थान के एक छोर से दूसरे छोर तक ईसाई ध्वज लहराये। प्रत्येक को अपना समस्त सामथ्र्य लगाकर हिन्दुस्थान को ईसाई बनाने के महान कार्य करने में पूरा परिश्रम करना चाहिए, ताकि कोई कसर बाकी न रहे।Ó मतांतरण का कुचक्र सैनिकों में भी चलाया गया। बंगाली थलसेना के एक अधिकारी ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है 'मैं पिछले 28 वर्ष से सैनिकों को ईसाई बनाने का काम सातत्य से करता रहा, क्योंकि भारतीय सैनिकों को शैतान के पंजे से छुड़ाकर ईसा की शरण में लाना मेरा सैनिकी कर्तव्य था।Ó
1857 स्वतंत्रता संग्राम के स्थान - दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद (प्रयाग), आजमगढ़, फतेहपुर, बनारस (वाराणसी), गोरखपुर, आगरा, मथुरा, कानपुर, सीतापुर, फर्रुखाबाद, जौनपुर, मैनपुरी, इटावा, एटा, अलीगढ़, मेरठ, मुजफ़्फरनगर, बरेली, मुरादाबाद, शाहजहांपुर, बदायूं, सहारनपुर, बिजनौर, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, नैनीताल, पिथौरागढ़, उधमसिंह नगर, बांदा, हमीरपुर, झांसी, जालौन, सागर, खंडवा, खरगोन, बुरहानपुर, बड़वानी, नीमच, उदयपुर, जोधपुर, माउंटआबू, अजमेर, देवास, धार, इंदौर, आगर, झाबुआ, राजगढ़, रतलाम, उज्जैन, गुना, सीहोर, झालावाड़, कोटा, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, चित्तौडग़ढ़, ग्वालियर, कलकत्ता (कोलकाता), उत्तर24 परगना, पटना, रांची, कांगड़ा, अमृतसर, पेशावर, जालंधर, लुधियाना, होशियारपुर, गुरुदासपुर, रावलपिंडी, सियालकोट, महेंद्रगढ़, अम्बाला, फिरोजपुर, पेशावर, साहिवाल, चटगांव, ढाका, जलपाईगुड़ी, भागलपुर, हजारीबाग, पलामू, सिंहभूम, कोल्हापुर, कराची, बॉम्बे (मुंबई), हैदराबाद, औरनागपुर।
1857 के बाद : प्रशासनिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भारत के विभाजन व सम्राज्यवादी सत्ता मजबूत करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाये गए 5 बड़े बदलाव।
औपचारिक बदलाव : निरंकुश हो चुकी ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का नाम बदल दिया गया। गवर्नर-जनरल कोरानी का वायसराय (राजप्रतिनिधि) बनाया गया। सरकार लंदन में इंडियन सेक्रेटरी और कलकत्ता में वायसराय दोनों अधीन थी। 1864-69 के दौरान वायसराय रहे जॉन लॉरेंस ने भारतीय सेना का फिर से गठन किया। अब रानी और ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों को आपस में मिला दिया गया। 1876 में डिसरायली (बेंजामिन डिसरायली, यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री) ने उस नीति की घोषणा कि जिसमें रानी को भारत की महारानी की संज्ञा दी गई।
विभाजन की नीति और साम्प्रदायिक दंगे : एक ब्रिटिश अधिकारी ने एशियाटिकजर्नल में 1821 में लिखा, "ष्ठद्ब1द्बस्रद्ग श्वह्ल ढ्ढद्वश्चद्गह्म्ड्ड हमारे राजनीतिक, नागरिक और सैन्य भारतीय प्रशासन का सिद्धांत होना चाहिए।Ó जॉन कोक मुरादाबाद में कमांडेंट के पद पर तैनात था। उसने 1857 के संग्राम के बाद लिखा- 'विभिन्न समुदायों के बीच मौजूद विभाजन को जारी रखने के लिए पूरी ताकत से प्रयास किए जाने चाहिए। हमें उन्हें आपस में मिलाना नहीं है। ष्ठद्ब1द्बस्रद्ग श्वह्ल ढ्ढद्वश्चद्गह्म्ड्ड हमारी भारतीय सरकार का नियम होना चाहिए।Ó बम्बई के गवर्नर, एल्फिंस्टोन ने 14 मई, 1859 को लिखा पुराने रोमन सिद्धांत ष्ठद्ब1द्बस्रद्ग श्वह्ल ढ्ढद्वश्चद्गह्म्ड्ड को हमने अपनाना चाहिए।
हिन्दुओं के प्रति घृणा : 18वीं शताब्दी में भारत में मुस्लिम राजनीति एक ब्रिटिश लेखक डब्ल्यू.एस. ब्लंट से बहुत हद तक प्रभावित थी। साल 1883 में वह भारत आया और कई मुस्लिम नेताओं से मिला। उसमें भारत के लगभग हर हिस्से का दौरा किया। इस दौरान ब्लंट से कई मुसलमानों ने हिन्दुओं के खिलाफ शिकायतें की। रात्रि के भोजन के समय उसकी मुलाकात एक मुस्लिम नवाब और उसके बेटों से हुई। नवाब ने ब्लंट को बताया कि गदर के समय वह अपने शहर में ही रहा, क्योंकि वह उसे छोड़कर नहीं जाना चाहता था, लेकिन वह लगातार इंग्लिश अधिकारियों से संपर्क में रहा। इसी कारण उसे फांसी के तख्ते पर नहीं लटकाया गया, जबकि अन्य लोगों की संपत्तियां जब्त कर ली गई थी। नवाब ने ब्लंट को ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रति अपनी स्वामिभक्ति दर्शाते हुए बताया कि विद्रोहियों (1857) में अधिकतर हिन्दू थे, इसलिए वह उन्हें पसंद नहीं करता था।
(विचार 1925 से साभार)
आरक्षण की मांग
कलकत्ता में उसके दौरे के दौरान एक काउंसलर मौलवी अहमद उससे मिलने आया. मौलवी ने बताया, "मुसलमानों के लिए यह संभव ही नहीं कि हिन्दुओं के साथ मिलकर कुछ भी किया जा सकता है." (ङ्खद्बद्यद्घह्म्द्बस्रस्ष्ड्ड2द्गठ्ठ क्चद्यह्वठ्ठह्ल, ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ ठ्ठस्रद्गह्म् क्रद्बश्चशठ्ठ, ञ्ज स्नद्बह्यद्धद्गह्म्: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1909, श्च. 110) इस सोच ने पहली बार भारत में मुसलमानों के लिए अलग से प्रतिनिधित्व की मांग रखी. लेजिस्लेटिव काउंसिल में मोहम्मदयुसूफ ने के अपने एक भाषण में मुसलमानों के आरक्षण की मांग की. (क्चद्बद्वड्डठ्ठक्चद्बद्धड्डह्म्द्बरूड्डद्भह्वद्वस्रड्डह्म्, ॥द्बह्यह्लशह्म्4 शद्घ क्कशद्यद्बह्लद्बष्ड्डद्य ञ्जद्धशह्वद्दद्धह्ल, 1शद्य. ढ्ढ, ठ्ठद्ब1द्गह्म्ह्यद्बह्ल4 शद्घ ष्टड्डद्यष्ह्वह्लह्लड्ड, 1934, श्च. 399)अब यह साफ़ हो गया था कि मुसलमानों ने राजनैतिक मामलों में ही अपनी राहे हिन्दुओं से अलग कर ली है.
दक्षिण भारत में अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के जो प्रमुख प्रयास हुए -
(सन्दर्भ : 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रतिसाद; लेखक –श्रीधरपराडकर)
स्वंतन्त्रता संग्राम के नैतिक परिणाम उत्तर व दक्षिण भारत में समान ही थे7अंग्रेजों से संघर्ष के मुद्दे एक ही थे7 सावरकर के शब्दों में कहना हो तो स्वराज्य स्वधर्म संरक्षण ही संग्राम का मुख्य उद्देश्य था 7
• दिसम्बर : 1856 रंगोजीबापू द्वारा सातारा में सशस्त्र संघर्ष 7
• मई 1857 पुणे सशस्त्र विप्लव के प्रयास 7
• 1857 मुंबई स्थित फौजी पलटन का विद्रोह7
• 1857 खानादेश में भीमानाइक के नेतृत्व में सिरपुर पर आक्रमण 7
• जुलाई 1857 कोल्हापुर की 27वीं पलटन की बगावत 7
• अगस्त नवम्बर 1858 तात्या टोपे का कारगुंण्ड पर आक्रमण 7
• अक्टूबर 1857 नवम्बर 1858 भागोजीनाइक की नासिक में ब्रिटिश सेना से भिडंत7
• दिसम्बर 1857 जोगलेकर के नेतृत्व में त्र्यंबकेश्वरमें ब्रिटिश सेना से मुठभेड़ 7
• मार्च 1858 बीड़ में अंगेजों से बगावत
• 1858-59 सावंतवाड़ी में विद्रोह
• फरवरी 1857 पारला की मिदी (आन्ध्र) में राधाकृष्ण डण्डसेन का सशस्त्रविद्रोह7
• जून 1857 कडप्पा(आन्ध्र) की 30वीं पलटन का विद्रोह 7
• जून हैदराबाद के प्रथम घुड़सवार सैन्य दल का विद्रोह7
• जुलाई 1857 मछलीपटनम में स्वंतन्त्रता ध्वज का आरोहण तथा राजमुंदरी में विप्लव7
• जगियापेट पर आक्रमण 7
• जमखिंण्डी तथा बीजापुर में संगठन 7
• 1859-60 रोहिलों की औरंगाबाद में तथा भीलों की वैजपुर में ब्रिटिश सेना से मुठभेड़7
• फरवरी 1857 शोरापुर की सेना द्वारा ब्रिटिश फौज पर हमला 7
• 1859 निजाम दरबार में डेविडसन पर आक्रमण 7
• 1857 सातारा के छत्रपति शाहू के भांजे रामराव की सेना का बीदर में अंग्रेजों से युद्ध
• नवम्बर 1857 मुधोल में ब्रिटिश फौज पर हमला7
• 1858 मैसूर राज्य में ब्रिटिश विरोधी प्रदर्शन7
• जुलाई 1858 वैंगलोर स्थित मद्रास की 8वीं पलटन का विद्रोह7
• 1857 बेलगांव की 29वीं स्थानीय पलटन का विद्रोह 7
• 1858 कारवार में अंग्रेजों पर हमला 7
• मई 1858 सुरेबान में अंग्रेज प्रतिनिधि मेनसन का सिर काटा 7
• नरगुंद के राजा का अंग्रेजों से युद्ध7
• 1858 मुण्डर्गी के भीमराव के नेतृत्व में अंग्रेजों पर आक्रमण
• 1858 गोवा के दीपूजीराणे का विद्रोह
• वेल्लोर (मद्रास) की 18वीं पलटन का विद्रोह 7
• 1858 चिंगलपुट (मद्रास) में क्रन्तिकारी विद्रोह7
• जुलाई 1857 क्विकलोन (केरल) की 25वीं तथा 45वीं पलटन का विद्रोह7
पुस्तक परिचय
1857 का स्वातन्त्र्य समर
वीर सावरकर रचित '1857 का स्वातन्त्र्य समरÓ विश्व की पहली इतिहास पुस्तक है जिसे प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबंधित होने का गौरव प्राप्त है. लन्दन स्थित इंडिया ऑफिस के ग्रंथालय का भरपूर उपयोग कर 1909 में यह ग्रंथ विनायक दामोदर सावरकर ने लिखा था। लगभग वे डेढ़ वर्ष तक सन 1857 से सम्बंधित दस्तावेजों तथा ब्रिटिश लेखन के महासमुद्र में डुबकियाँ लगाते रहे. आगे चलकर इस ग्रंथ को 'क्रांतिकारियों की गीताÓ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हुई। अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। उस कालखण्ड में इसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रुपए में बिकी। इस ग्रंथ को मेडमकामा, लाला हरदयाल, सुभाष चंद्र बोस व स. भगत सिंह ने भी छपवाया था। आजाद हिंद फौज के शिविरों में इस पुस्तक का वाचन अनिवार्यरूप से होता था।
1908 में फ्रांस से संचालित समाचार पत्र 'तलवारÓ में सावरकर ने लिखा था - "ऐतिहासिक सत्य को यथातथ्य प्रस्तुत करना मेरे ग्रंथ का उद्देश्य तो है ही, साथ ही मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए लोगों के अंत:करण में क्रांति की आग प्रज्वलित कर दूसरा क्रांति युद्ध करना भी है।"
साक्षात्कार के अंश
1857 के तथ्य – प्रो. कपिल कुमार की जुबानी
(वरिष्ठ चिंतक और इतिहासकार, वर्तमान में इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर)
• 1770 से लेकर 1857 तक पूरे देश केरिकॉर्ड में अंग्रेजों के खिलाफ 235 विद्रोह हुए, जिनका परिपक्व रूप हमें 1857 में दिखाई देता है। 1770 में बंगाल का संन्यासीआन्दोलन, जहां से वंदेमातरम निकल कर आया। 150 संन्यासियों को अंग्रेजों की सेना गोली मार देती है। जहां से मोहन गिरी, देवी चौधरानी, धीरज नारायण, किसान, संन्यासी, कुछ फकीर, ये सभी मिलकर विद्रोह में खड़े हुए जिन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम किया था और इसी विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों को तीस वर्ष लग गये। जहां से भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी नींव पड़ी, 1857 से पहले किसानों, जन जातियों तथा आम लोगों का अंग्रेजों के खिलाफ बहुत बड़ा विद्रोह रहा है।
• हमारे देश की वीरांगनाओं का इसमें बड़ा योगदान था, उस दौरान पचास-पचास महिलाओं को अंग्रेजों ने फांसी पर लटकाया है , पेड़ों से रस्सी बांध कर। आज भी बागपत और इन इलाकों के गाँव के अंदर उन पेड़ों को लोगों के द्वारा पूजा जाता है। 1857 की क्रान्ति और उस बाद की घटनाओं में इस आंदोलन में महिलाओं ने कई बार अंग्रेजों के दांत खट्टे किए हैं। मेरठ, मुज्फ्फरनगर, शामली इन तमाम जगहों पर ऐसे नाम मिलते हैं। अच्छी बात इसमें यह है कि इसमें गुर्जर, जाट, ब्राह्मण, दलित भाई बहनें और मुस्लिम समुदाय के भी हैं, इसमें ऐसी भी महिलाऐं हैं जिन्होंने झुंड बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ काम किया और ऐसे कई उदाहरण हैं कि पति मेरठ के बाद दिल्ली लड़ाई लडऩे चला गया और फिर उनकी महिलाओं ने मेरठ में मोर्चा संभाला। इसमें अवंतीबाई का नाम आता है । यहां तक कि मध्य प्रदेश की एक गायिका का नाम भी सामने आता है जो अंग्रेजों के बीच छावनी में जाती थी तो नाच करने के दौरान अपने सैनिकों को पुडिय़ा में संदेश पहुंचाया करती थी। मोतीबाई, झलकारीबाई, झांसी का रानी का नाम प्रमुखता से आता है। यहां महिलाओं की जो सेना थी जो कि एक मटके में छत से अंग्रेजी सैनिकों के ऊपर गर्म तेल डालती थी। साथ ही अपनी रानी का सुरक्षा घेरा बनाकर उनकी रक्षा करती थी।
• कमल का फूल, रोटी और पत्र पूरे देश के अंदर घूम रहे थे। अंग्रेज़ खुद लिखते हैं एक एक रात के भीतर ये रोटी 200 से 300 मील तक चली जाती थी । उस समय चौकीदार की बहुत बड़ी भूमिका रही थी क्योंकि एक भी चौकीदार ने अपनी जुबान नहीं खोली कि इस कमल और रोटी घूमने का मतलब क्या है, या पेड़ की छाल छीलने का क्या मतलब है । पेशावर से लेकर बेलगांव तक और डीमापुर से लेकर शिवसागर तक पंचमहल, शोलापुर, देश के कौने-कौने में यह सुनियोजित तरीके से फैल रही थी।
• अभी हाल ही में पराग टोपे की एक किताब आई है , पराग टोपे तात्या टोपे के खानदान से हैं । बड़ा अच्छा मतलब बताया है उन्होंने एक कमल के फूल में 25 से 30 पंखुडिय़ाँ होती है और जो अंग्रेजी प्लाटून होती थी उसमें 25 से 30 सिपाही होते थे ऐसे में लाल रंग के कमल के रूप में भारतीय सैनिकों के लिए संदेश था कि तुमको विद्रोह करना है । रोटी का मतलब था कि ऐसा समय आने वाला है जब तुम्हें खाने पीने की चीजों की किल्लत हो सकती है । देखिये जो हिन्दुस्तानी सिपाही हैं उनको कभी रसद की दिक्कत नहीं हुई । पेड़ की छाल छीलने का मतलब था कि जिस तरह से पेड़ की छाल छीलने पर पेड़ मर जाता है उसी प्रकार से अँग्रेजी हुकूमत हमें खा रही है और हमें इसके खिलाफ खड़े होना है ।
• अब पत्रों के अंदर पेशावर से लेकर बंगाल तक के सभी पत्रों को ही ले लीजिये, पेशावर से लेकर बंगाल तक क्या कारण है कि पत्रों की गुप्त भाषा एक जैसी है, जिसमें एक जैसे संदेश दिये जा रहे हैं । नाना साहब की चि_ियाँ आप देखिये कि जो भाषा है वह एक ही है, 1857 से पहले नाना साहब की चिठ्ठी आप देखिए कि जम्मू के राजा तक को पत्र लिखा कि हमारी मदद करना जिस पर जम्मू के राजा ने हामी भरी है । साफ है यह एक सुनोयोजित तरीके से की गयी क्रांति थी .
• जेएनयू के हिस्ट्री डिपार्टमेंट में 1857 की क्रान्ति के ऊपर एक भी थेसिस जमा नहीं हुई । अलीगढ़ विश्वविद्यालय और हैदराबाद में भी नहीं हैं, जोकि अपने आप में रिसर्च के गढ़ माने जाते हैं, दिल्ली में एक दो बाद में हो गये वह भी जब कि सरकार ने इसे घोषित किया कि यह स्वतंत्रता संग्राम था
• जब मैं तात्या टोपे पर संग्राहलय के लिए एक पैनल बना रहा था तो एक वृतांत मिलता है कि 1 जनवरी 1859 को युद्ध के अंदर तात्या टोपे की मृत्यू हो गयी। बताते हैं कि 6 जनवरी को अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। फिर एक रिपोर्ट आती है कि 6 अप्रैल को तात्या टोपे को जंगलों से पकड़ लिया गया, उस आदमी पर मुकदमा चलाकर जून के अंदर शिवपुरी में उसको फांसी दे दी जाती है । लेकिन 1864 का एक कागज मिलता है कि जिसमें एक डीएम कहता है कि मैंने 40 हजार सैनिक एकत्र कर लिए हैं और मैं असली तात्या टोपे को पकडऩे जा रहा हूं।
• इसलिए ना चाहते हुए भी मैं एक प्रश्न खड़ा करता हूं कि क्या वास्तव में झांसी का रानी की मृत्यू हुई थी ग्वालियर में, क्योंकि अंग्रेजों को रानी की मौत की खबर सात दिन बाद लगी थी साथ ही रानी को बचाने में आश्रम के 782 साधुओं ने अपनी जान दी थी। वो कहते हैं कि रानी घायल थी जिसे हमने नाना साहब के पास भेज दिया और तो दूसरी स्त्री थी झलकारी बाई उसका दाह संस्कार किया गया और अंग्रेजों को बताया गया कि झांसी की रानी मर गयी है वह भी एक हफ्ते बाद में, और फिर उसकी अस्थियों को दिखा दिया गया। जिससे लगता है कि झांसी की रानी की मौत नहीं हुई। लेकिन इस पर अभी शोध बाकी है। तो अभी ऐसा बहुत कुछ है जो इतिहास में जानने योग्य है और हमारे यहां के शोध छात्रों को इस पर काम करना चाहिए ।
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खलीफा का शासन (पैन-इस्लामिकमूवमेंट)
कुछ मुस्लिम नेताओं ने ब्लंट को बताया कि इजिप्ट वार (1881-12) में हम पाशा से उम्मीद थी कि वे हमारा भाग्य बदल देंगे.(ङ्खद्बद्यद्घह्म्द्बस्रस्ष्ड्ड2द्गठ्ठ क्चद्यह्वठ्ठह्ल, ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ ठ्ठस्रद्गह्म् क्रद्बश्चशठ्ठ, ञ्ज स्नद्बह्यद्धद्गह्म्: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1909, श्च. 112) यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिन्दुओं के स्थान पर भारतीय मुसलमानों ने भारत से बाहर अपने संबद्ध स्थापित करने शुरू कर दिए थे. इस सोच ने भारतीय राष्ट्रवाद को नुकसान पहुँचाया.
भारत में इस मूवमेंट की शुरुआत जमाल अफगानी ने की. जोकिअफगानिस्तान का रहने वाला था और 1881 के आसपास भारत आया था. उसमें गुप्त रूप सेभारतीय मुस्लिम नेताओं से मुलाकात की. कलकत्ता में वह नवाब अब्दुललतीफ़ और उसके साथ आये शिक्षित मुसलामानों के एक छोटे दल से मिला. इसमें अमीर अली भी शामिल था. राष्ट्रवादी नेता बिपिन चन्द्र पाल अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र करते हुए लिखते है, "इन सभी में पैन-इस्लामिकवाइरस का टीकाकरणकिया गया. इसके बाद उन्होंने हिन्दुओं की राजनैतिक गतिविधियों से दुरिओ बनाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे हमारे राष्ट्रीय प्रयासों में हिन्दुओं और प्रबुद्ध मुसलमानों के बीच गहरी खाई उत्पन्न होनी लगी." (क्चद्बश्चद्बठ्ठ ष्टद्धड्डठ्ठस्रह्म्ड्ड क्कड्डद्य, रूद्गद्वशह्म्द्बद्गह्य शद्घ रू4 रुद्बद्घद्ग ड्डठ्ठस्र ञ्जद्बद्वद्गह्य, रूशस्रद्गह्म्ठ्ठ क्चशशद्म: ष्टड्डद्यष्ह्वह्लह्लड्ड, 1932, श्च. 417)
मुसलमानों के इस पैन-इस्लामिकमूवमेंट की ब्रिटिश सरकार को जानकारी थी. सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट, हेमिल्टन ने वायसरायएल्गिन को 30 जुलाई, 1897 को एक पत्र लिखा, "पैन-इस्लामिक काउंसिल के माध्यम से हमें भारत में साजिश और उत्तेजनाओं को भड़काने का नया अवयव मिल गया है." (क्र.ष्ट. रूड्डद्भह्वद्वस्रड्डह्म्, ॥द्बह्यह्लशह्म्4 शद्घ ह्लद्धद्ग स्नह्म्द्गद्गस्रशद्व रूश1द्गद्वद्गठ्ठह्ल द्बठ्ठ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, 1शद्यह्वद्वद्ग 1, स्नह्म्द्बद्वड्ड ्य.रु.: ष्टड्डद्यष्ह्वह्लह्लड्ड,1962, श्च. 475)
हिन्दूओं के विरुद्ध - सांप्रदायिक दंगे
ब्रिटिश सरकार की हिन्दूओं के खिलाफ नीति का असर दिखाई देना शुरू हो गया था. साल 1885-1897 के बीच लाहौर (1885), करनाल (1885), दिल्ली (1886), होशियारपुर(1889), लुधियाना(1889),अम्बाला(1889), डेरा गाजी खान (1889),सेलम(1891), आजमगढ़(1893), बम्बई शहर (1893),मियांवली(1893), गया (1893), आरा (1893), सारण (1893),चंपारण(1893), छपरा (1893), और कलकत्ता (1897) में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़काए गए.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय-द्वि-राष्ट्रवाद की नींव
हिन्दू विरोधी
यह आश्वस्त होकर कि अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी विचार एवं संस्कृति वास्तविक प्रगति की एकमात्र सच्ची नींव थी, सैयद अहमद ने इस उद्देश्य से कई संस्थानों की स्थापना की। उन्होंने 1869 में इंग्लैंड का दौरा किया और 1870 में लौटने के बाद अपने समुदाय के बीच अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रसार के लिए जोरदार प्रचार किया। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 1877 में अलीगढ़ में मोहम्मडनएंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की।
सैयद अहमद के प्रयास सामाजिक और धार्मिक सुधारों तक ही सीमित नहीं थे। उन्होंने मुस्लिम राजनीति को एक अलग नया मोड़ दिया जो हिंदू विरोधी बन गई।(क्र.ष्ट. रूड्डद्भह्वद्वस्रड्डह्म्, ॥द्बह्यह्लशह्म्4 शद्घ ह्लद्धद्ग स्नह्म्द्गद्गस्रशद्व रूश1द्गद्वद्गठ्ठह्ल द्बठ्ठ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, 1शद्यह्वद्वद्ग 1, स्नह्म्द्बद्वड्ड ्य.रु.: ष्टड्डद्यष्ह्वह्लह्लड्ड,1962, श्च. 479)
द्वि-राष्ट्र सिद्धांत
साल 1883 में उन्होंने एक लंबा भाषण दिया जो भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा के खिलाफ एक वाक्पटु दलील थी।यह राजनीतिक विचारों के साथ हिंदू और मुस्लिम नेताओं को विभाजित करने वाले व्यापक प्रयासों को इंगित करता है। उन्होंने कहा, "मुसलमान अल्पमत में हैं, लेकिन जब बहुमत वाले उन पर अत्याचार करते हैं तो उनके हाथ में तलवार होने की संभावना होगी।" (स्शह्वह्म्ष्द्गह्य शद्घ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ ञ्जह्म्ड्डस्रद्बह्लद्बशठ्ठ, ष्टशद्यह्वद्वड्ढद्बड्ड ठ्ठद्ब1द्गह्म्ह्यद्बह्ल4, हृद्ग2 ङ्घशह्म्द्म, 1958, श्च. 747)
उन्होंने जिस आंदोलन की शुरुआत की, वह द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के ठोस आधार पर था। अलीगढ़ मुस्लिम आंदोलन के मुलभुत लक्ष्य और उद्देश्य :
(1) हिंदू और मुसलमान अलग-अलग दृष्टिकोण और परस्पर विरोधी हितों के साथ दो विभिन्न राजनीतिक संस्थाएँ बनाए।
(2) भारत में प्रतियोगी परीक्षा द्वारा उच्च कार्यालयों में नियुक्ति के लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित प्रतिनिधि संस्थानों का अनुदान मुसलमानों के लिए हानिकारक होगा क्योंकि वे हिंदू वर्चस्व के अधीन होंगे जो ब्रिटिश शासन से कहीं अधिक खराब है।
(3) फलस्वरूप मुसलमान को अंग्रेजों की सर्वोपरिता को अपने हितों की रक्षा का अधिकार मानना चाहिए और सरकार के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन से खुद को अलग रखना चाहिए।
(4) चूंकि मुस्लिम हित अंग्रेजों के हाथों में काफी सुरक्षित हैं, इसलिए मुस्लिमों को स्वयं के सांस्कृतिक विकास में दिलचस्पी लेनी चाहिए। इसलिए राजनीति से दूर रहना लेकिन हिंदू राजनीतिक आंदोलन की क्षति का जवाब देना चाहिए।
अंग्रेजों से दिशा-निर्देश
अलीगढ़ में मोहम्मडनएंग्लो-ओरिएंटल कॉलेजहिंदुओं के खिलाफ प्रचार का मुख्य केंद्र बन गयाथा। उसका निर्देशन एक ब्रिटिश व्यक्तिबेक के पास था जोकि सैयद अहमद का करीबीदोस्तऔर मार्गदर्शक था। अलीगढ़कॉलेज के साहित्यिक मुखपत्रअलीगढ़इंस्टीट्यूटगजट का संपादन बेक के पास था। वह यह काम सैयद अहमद के लिए करता था। उसने बंगालियों के राजनीतिक और सामाजिक विचारों के खिलाफ पर जहर उगलना शुरू किया। एक के बाद एक राजनीतिक लेख प्रकाशित किए जिनके केंद्र में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत शामिल था।उसने लिखा कि भारत के लिए संसदीय व्यवस्था अनुपयुक्त है और इसके स्वीकृत होने की स्थिति में, बहुसंख्यक हिन्दूओं का वहां उस तरह राज होगा जो किसी मुस्लिम सम्राट का भी नहीं था।(्रद्यद्बद्दड्डह्म्द्ध ढ्ढठ्ठह्यह्लद्बह्लह्वह्लद्ग त्रड्ड5द्गह्लह्लद्ग, 21 छ्वह्वद्य4, 1888, श्चश्च. 811-13)
मैकालेकी शिक्षा - पश्चिमी सभ्यता का प्रचार
मैकाले का दृष्टिकोण
मैकाले ने शिक्षित भारतीय लोगों के उस वर्ग को तैयार किया जिन्हें पश्चिमी संस्कृति में ढाला गया। इससे देश के सामान्य लोगों से उनका सम्बन्ध समाप्त हो गया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार की मिलीभगत से स्थानीय नागरिकों का शोषण किया गया। मैकाले नेधृष्टताकी सीमा को पार करते हुए भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक एकता के तोडऩे के प्रयासकिये। साल 1836 में अपने पिता को भेजे एक पत्र में उसने लिखा, "हमारे अंग्रेजी स्कूल शानदार रूप से कामयाब हो रहे हैं। शुरुआत में हमें यह मुश्किल लगा और वास्तव मेंकुछ मामलों में असंभव भी था। इस शिक्षा का हिन्दुओं पर असाधारणप्रभाव है। जिस हिन्दू ने अंग्रेजी शिक्षा को प्राप्त किया हैवह अपने धर्म के प्रति ईमानदार नहीं रहेगा।विशुद्ध ईश्वरवादी होते हुए भी कुछ लोग इस शिक्षा को नीतिगत रूप से लेंगे और कई ईसाई धर्म स्वीकार करेंगे।यह मेरा दृढ़ विश्वास है कियदि हमारी शिक्षा की योजनाओं का पालन किया जाता हैतो बंगाल में अगले तीस वर्षों में प्रबुद्ध वर्गों के बीच एक भी मूर्ति नहीं होगी। यह ज्ञान और विचारों की कार्यवाही से प्रभावी हो जायेगा। इसके लिए धर्मान्तरण और धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप की जरुरत नहीं होगी। इन संभावनाओं की मुझे हार्दिक खुशी हैं।"(स्द्बह्म् त्रद्गशह्म्द्दद्ग ह्रह्लह्लश ञ्जह्म्द्ग1द्गद्य4ड्डठ्ठ, रुद्बद्घद्ग ड्डठ्ठस्र रुद्गह्लह्लद्गह्म्ह्य शद्घ रुशह्म्स्र रूड्डष्ड्डह्वद्यड्ड4, 1908, श्चश्च. 329-30)
इतिहासकारों का दृष्टिकोण
मैकाले के शिक्षा में परिवर्तन पर आर.सी. मजूमदार लिखते है, "पश्चिम के प्रभाव के द्वारा इंग्लिश शिक्षा ही भारत में बदलाव का अकेला कारक था।"(क्र.ष्ट. रूड्डद्भह्वद्वस्रड्डह्म्, ॥द्बह्यह्लशह्म्4 शद्घ ह्लद्धद्ग स्नह्म्द्गद्गस्रशद्व रूश1द्गद्वद्गठ्ठह्ल द्बठ्ठ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, 1शद्यह्वद्वद्ग 1, स्नह्म्द्बद्वड्ड ्य.रु.: ष्टड्डद्यष्ह्वह्लह्लड्ड,1962, श्च. 290)
प्रभाव
इंग्लिश शिक्षा के प्रभाव से बंगाल सहित भारत के अन्य हिस्सों में स्कूल और कॉलेजबड़ी संख्या मेंस्थापित हुए। साल 1817-1857 के दौरान अंग्रेजी शिक्षा का वर्ग तैयार किया गया। कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास के तीन विश्वविद्यालयों की 1857 में स्थापना हुई। इन विश्वविद्यालयों से सम्बंधित कई कॉलेजों और स्कूलों ने अंग्रेजी शिक्षित भारतीयों की संख्या में असाधारण वृद्धि की।
मुस्लिम लीगऔर विभाजन
पाकिस्तान की नींव
आगा खान के नेतृत्व में 1 अक्तूबर, 1906 को 36 मुसलमानों का एक दल वायसरायमिन्टों से मिला. इस मुलाकात का मकसद म्युनिसिपल और जिला से लेकर इम्पीरियललेजिस्लेटिव काउंसिल में मुसलमानों के आरक्षण था. मिन्टों ने उनकी मांगों पर सहमती जताते हुए कहा, मैं पूरी तरफ से आपसे सहमत हूँ. मैं आपको यह कह सकता हूँ कि किसी भी प्रशासनिक परिवर्तन में मुस्लिम समुदाय अपने राजनैतिक अधिकारों और हितों के लिए निश्चिंत रहे."(रूड्डह्म्4 – ष्टशह्वठ्ठह्लद्गह्यह्य शद्घ रूद्बठ्ठह्लश, ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड रूद्बठ्ठह्लश ड्डठ्ठस्र रूशह्म्द्यद्ग4 1905-1910, रूड्डष्द्वद्बद्यद्यड्डठ्ठ: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1934, श्च. 47)यह ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक घोषणा थी. जिसमें हिन्दू और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्रों के रूप में देखा गया. इस एक मुलाकात ने पाकिस्तान की नींव रख दी थी.
इस प्रतिनिधि दल का डिजायन खुद ब्रिटिश सरकार ने तय किया था.इसका मकसद मुसलमानों को उस राजनैतिकसंघर्ष से दूर रखना था जिसका संचालन हिन्दुओं द्वारा किया जा रहा था.मिन्टोकी मुस्लिम दल से मुलाकात पर लेडीमिन्टोलिखती है,"भारत और भारतीय इतिहास कोकईसालों तक प्रभावित करेगा. यह60 मिलियन लोगों कोविद्रोही विपक्ष के साथ जुडऩे से रोकने केअलावाकुछ नहीं हैं."(रूड्डह्म्4 – ष्टशह्वठ्ठह्लद्गह्यह्य शद्घ रूद्बठ्ठह्लश, ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड रूद्बठ्ठह्लश ड्डठ्ठस्र रूशह्म्द्यद्ग4 1905-1910, रूड्डष्द्वद्बद्यद्यड्डठ्ठ: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1934, श्चश्च. 47-8)
रामसेमैक्डोनाल्डनेइस मुलाकात कोष्ठद्ब1द्बस्रद्ग ड्डठ्ठस्र क्रह्वद्यद्ग के नियम पर आधारित जानबूझकर और पैशाचिक कामबताया.अपनी पुस्तक अवाकिंगऑफ़ इंडिया में यह मानते है कि मुसलमानों को हिन्दूओं से ज्यादा मताधिकार मिले हुए थे.संख्या के हिसाब से उनका प्रतिनिधित्व भी ज्यादा था. आगे वे लिखते हैं, "इस योजना का पहला परिणाम दोनों समुदायों को अलग कर देना था और समझदार एवंसंविधानवादीराष्ट्रवादीलोगों के लिए अडचनें पैदा करना था."(छ्व. क्रड्डद्वह्यड्ड4 रूड्डष्स्रशठ्ठड्डद्यस्र, ञ्जद्धद्ग ्र2ड्डद्मद्गठ्ठद्बठ्ठद्द शद्घ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, ॥शस्रस्रद्गह्म् ड्डठ्ठस्र स्ह्लशह्वद्दद्धह्लशठ्ठ: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, श्चश्च. 176-77)
मैक्डोनाल्ड यह भी खुलासा करते है कि मुसलमान नेता कुछ एंग्लो-इंडियन अधिकारियोंसेप्रेरितथे.इन अधिकारियों ने शिमला और लन्दन कई तार भेजे.जिसमें हिन्दू एवं मुसलमानों के बीच एक सोची-समझी कलह औरद्वेषके आधार पर मुसलमानों के लिए विशेष समर्थन माँगा गया.(छ्व. क्रड्डद्वह्यड्ड4 रूड्डष्स्रशठ्ठड्डद्यस्र, ञ्जद्धद्ग ्र2ड्डद्मद्गठ्ठद्बठ्ठद्द शद्घ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, ॥शस्रस्रद्गह्म् ड्डठ्ठस्र स्ह्लशह्वद्दद्धह्लशठ्ठ: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, श्चश्च. 176)इस आधार पर30दिसंबर,1906कोआलइंडिया मुस्लिम लीग की शुरुआत हुई.करांची में29 दिसंबर,1907 कोलीगका उद्देश्य बताये गए. इसमें सबसे प्रमुख ब्रिटिश सरकार और भारत के मुसलमानों के बीच वफादारी को बढ़ावा देना था. (त्र.हृ. स्द्बठ्ठद्दद्ध, रुड्डठ्ठस्रद्वड्डह्म्द्मह्य द्बठ्ठ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ ष्टशठ्ठह्यह्लद्बह्लह्वह्लद्बशठ्ठड्डद्य ड्डठ्ठस्र हृड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य ष्ठद्ग1द्गद्यशश्चद्वद्गठ्ठह्ल, 1963, श्च. 384)
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस- ब्रिटिशसेफ्टीवाल्व
पृष्ठभूमि
भारत में जनता के बीच बढ़ रहे असंतोष से ब्रिटिश सरकार को खतरा पैदा होने लगा था। ब्रिटिश अधिकारी ऐलनऑक्टेवियनह्यूमकेजीवनी लेखक, विलियमवेडरबर्न ने लिखा, "देश के विभिन्न हिस्सों से शुभचिंतकों उन्हें सरकार को खतरे की चेतावनी दे रहे थे।" (ङ्खद्बद्यद्यद्बड्डद्व ङ्खद्गस्रस्रद्गह्म्ड्ढह्वह्म्ठ्ठ, ्रद्यद्यड्डठ्ठ ह्रष्ह्लड्ड1द्बड्डठ्ठ ॥ह्वद्वद्ग, ञ्ज. स्नद्बह्यद्धद्गह्म्: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1913, श्च. 50)
भारत में क्रांतिकारी घटनाओं को रोकने के लिए ह्यूम ने कांग्रेस की रूप-रेखा तैयार की। वेडरबर्न लिखते हैं, "क्रान्तिकारी घटनाओंका गलत आंकलन की शुरुआत के बाद उनका रूसी तरीकों के साथ पुलिस द्वारा दमन किया गया।इससे भारत में वायसरायलिटन और क्रन्तिकारी विद्रोह को बेहद करीब ला दिया था।तब मिस्टर ह्यूम और उनके भारतीय सलाहकारों के हस्तक्षेप के लिए सामने आये।" (ङ्खद्बद्यद्यद्बड्डद्व ङ्खद्गस्रस्रद्गह्म्ड्ढह्वह्म्ठ्ठ, ्रद्यद्यड्डठ्ठ ह्रष्ह्लड्ड1द्बड्डठ्ठ ॥ह्वद्वद्ग, ञ्ज. स्नद्बह्यद्धद्गह्म्: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1913, श्च. 101)
ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जन-सामान्य विद्रोह में भारतीय बुद्धिजीवियों को शामिल होने से रोकने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की रूप-रेखा बनाई गयी। ह्यूम ने खुद कहा है, "हमारी कार्यवाही से असामन्यबढ़ती ताकतों कोरोकने का यह एक सेफ्टी-वाल्व (कांग्रेस) था। इसकी तत्काल आवश्यकता थी।संभवत: कांग्रेस से अधिक प्रभावशाली सुरक्षा-वाल्व तैयार नहीं किया जा सकता था।" (ङ्खद्बद्यद्यद्बड्डद्व ङ्खद्गस्रस्रद्गह्म्ड्ढह्वह्म्ठ्ठ, ्रद्यद्यड्डठ्ठ ह्रष्ह्लड्ड1द्बड्डठ्ठ ॥ह्वद्वद्ग, ञ्ज. स्नद्बह्यद्धद्गह्म्: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1913, श्च. 77)
इतिहासकारों का नजरिया
आर.सी. मजूमदार, "भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भारत में ब्रिटिश शासन की सुरक्षा के लिए एक साधन के रूप में लाया गया था।"(क्र.ष्ट. रूड्डद्भह्वद्वस्रड्डह्म्, ॥द्बह्यह्लशह्म्4 शद्घ ह्लद्धद्ग स्नह्म्द्गद्गस्रशद्व रूश1द्गद्वद्गठ्ठह्ल द्बठ्ठ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, 1शद्यह्वद्वद्ग 1, स्नह्म्द्बद्वड्ड ्य.रु.: ष्टड्डद्यष्ह्वह्लह्लड्ड,1962, श्च. 393)
अंग्रेजी शासन की शुरुआत
सूरत में इंग्लिश फैक्ट्री के अध्यक्ष गेराल्डऔंगियर ने एक पत्र में लिखा, "अब समय की आवश्यकता है कि अपने मुख्य व्यापार को हाथों में तलवार द्वारा संभालना होगा।" (ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड ह्रद्घद्घद्बष्द्ग क्रद्गष्शह्म्स्रह्य, ह्र.ष्ट. 4258, ह्नह्वशह्लद्गस्र ड्ढ4 क्क.श्व. क्रशड्ढद्गह्म्ह्लह्य, ॥द्बह्यह्लशह्म्4 शद्घ क्चह्म्द्बह्लद्बह्यद्ध ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, ठ्ठस्रद्गह्म् ह्लद्धद्ग ष्टशद्वश्चड्डठ्ठ4 ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ष्टह्म्श2ठ्ठ, ह्र&द्घशह्म्स्र: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1932, श्च. 43)
इंग्लिश फैक्ट्री के निदेशक ने 12 दिसंबर, 1687 को फरमान जारी किया, "नागरिक और सैन्य शक्ति दोनों की स्थापना और सुरक्षा के लिए विशाल राजस्व का सृजन और सुदृढ़करना होगा...... जिससे कि आने वाले समय में भारत में एक विशाल, अच्छी तरह से जमी हुई, सुरक्षित अंग्रेजी प्रभुत्व की बुनियादस्थापित की जा सके।" (क्क.श्व. क्रशड्ढद्गह्म्ह्लह्य, ॥द्बह्यह्लशह्म्4 शद्घ क्चह्म्द्बह्लद्बह्यद्ध ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, ठ्ठस्रद्गह्म् ह्लद्धद्ग ष्टशद्वश्चड्डठ्ठ4 ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ष्टह्म्श2ठ्ठ, ह्र&द्घशह्म्स्र: रुशठ्ठस्रशठ्ठ, 1932, श्च. 44)
ब्रिटिश प्रधानमंत्री, पामर्स्टन, "हमारी शुरुआत एक फैक्ट्री से हुई, यह फैक्ट्री एक किले में बदल गयी, किले का विस्तार जिले में हुआ और यह जिले का स्थान प्रान्तों ने ले लिया।" (क्र.ष्ट. रूड्डद्भह्वद्वस्रड्डह्म्, ॥द्बह्यह्लशह्म्4 शद्घ ह्लद्धद्ग स्नह्म्द्गद्गस्रशद्व रूश1द्गद्वद्गठ्ठह्ल द्बठ्ठ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड, 1शद्यह्वद्वद्ग 1, स्नह्म्द्बद्वड्ड ्य.रु.: ष्टड्डद्यष्ह्वह्लह्लड्ड, 1962, श्च. 5)
(अपने प्रांत की घटनाओं पर सामग्री इस प्रकार से तैयारकी जा सकती है)
बाबु कुंवर सिंह के नेतृत्व में सम्पूर्ण समाज का संघर्ष
• कुंवर सिंह:पूरा नाम –बाबू वीर कुंवर सिंह
• जन्म स्थान: बिहार में आरा के निकट जगदीशपुर रियासत
• जन्म तिथि: 23 अप्रैल 1777 ; मृत्य: 26 अप्रैल, 1857
• पिता : श्री साहबजादा सिंह
• माता : श्रीमती पंचरत्न देवी
• धर्मपत्नी : श्रीमती धरमन बाई
• उद्देश्य : अधीनता से स्वाधीनता (अंग्रेजो से)
• विशेष : भारतवर्ष के इतिहास का यह एक आश्चर्य है कि
मातृभूमि की रक्षा में एक 80 वर्षीय हिन्दू योद्धा ने
वीरगति प्राप्त की7
: छापामार युद्ध पद्धति भी इन्होनेप्राम्भ की7
वीर कुँवरसिंह: बिहार में आरा के निकट जगदीशपुर रियासत में 23 अप्रैल,1777 में इनका जन्म हुआ था7जगदीशपुर रियासत भी अंग्रेज डलहौजी की हड़प नीतिका शिकार बन गयी थी7कुँवरसिंह की शाहाबाद जिले में वंश परम्परागत भूमि विदेशियों के कब्जे में थी, उसकी सेना थोड़ी सी थी—एक हजार दो सौ सिपाही और अधिकारी और कोई चार सौ अशिक्षित नौकर उसके पास थे7उसकेजगदीशपुर के राजमहल में विदेशी शत्रु का अमंगल डेरा पड़ा हुआ था7 उसके देवालियों और देवमूर्तियों को उन्मुक्त मलेच्छों ने चकनाचूर कर दिया था7 उसने जनहानि न होने दी और जिस दिन जगदीशपुर छोड़ा उसी दिन केवल मनोविकारों का दास न होकर और आवेश में विजय अवसर न चुकते हुए एक नई पद्धति का युद्धलडऩे की योजना बनाई थी7उस प्रदेश पर और राजधानी पर अंग्रेजों का मजबूत बंदोबस्त था, यह उसे ज्ञात था7 इसलिए उसने राजधानी हारने की बिलकुल चिंता नहीं की7 उसे जो चिंता थी वह यह कि राजधानी हारे या जीते, मेरे स्वातंत्र्य युद्ध का जरतारी ध्वज अटल लहराता रहना चाहिए7
कुंवरसिंह की नई पद्धति स्वतंत्रता संग्राम की अनन्य संजीवनी थी7 उस युद्ध पद्धति का नाम 'छापामार युद्धÓ है7 इसलिए अपने अपमान के क्षोभ से अंग्रेजों की सबल सेना पर दीप-पतंग-त्वरा से न झपटते हुए कुंवर सिंह उस पश्चिम बिहार के वन में शोण नदी के किनारे-किनारे अंग्रेजों के दुर्बल स्थान टटोलता छिपा हुआ था7 लखनऊ की ओर सारी अंग्रेज सेना जा रही थी, पर अंग्रेजों की आँखें जगदीशपुर की ओर होने से कुंवर सिंह ने अभी उस ओर जाने की योजना नहीं बनाई7 अवध में घुसते ही वहां के अनेक विद्रोहियों को इकठाकरआजमगढ़ पर हमला करें और वहां विजय मिलते ही श्री काशी-क्षेत्र पर या इलाहाबाद पर हमला करें और इस तरह जैसे को तैसा बनकर जगदीशपुर का बदला लिया जाए7
एक अंग्रेज जिसका नाम कर्नलडेम्स था जो अनेक सैनिकों के साथ आजमगढ़ छोड़कर कुंवरसिंह को मजा चखाने निकला7कुंवरसिंह ने इन नए सैनिकों और नए सेनापति को ऐसा थप्पड़ लगाया कि कर्नल मैदान छोड़ सीधे आजमगढ़ की ओर भागा और शहर की दीवारों के पीछे जाकर छिप गया7 उसकी सेना में से कोई कुंवर सिंह पर आक्रमण के लिए तैयार नहीं था7 "इस चढाई के समय गवर्नरकेनिंग इलाहाबाद में ही था7कुँवरसिंह की युद्ध-क्षमता, धैर्य, बहादुरी, आदि सभी गुणों से जनरल कैनिंग, परिचित था7अत: आनेवाले संवाद का रूप उसके सामने स्पष्ट था7"
अमर सिंह: सन 1858 की 26 अप्रैल को कुँवरसिंह के देवलोक जाते ही उसका छोटा भाई अमर सिंह गद्दी पर बैठा7भाई की मृत्यु के कारण इस लड़ाई में जरा भी ढील न देकर पूरे चार दिन विश्राम न करते हुए यहरणपंडित अमर सिंह आरा शहर का दरवाजा ठोकने लगा7अमर सिंह ने रणक्षेत्र में अपनी सेना की छोटी-छोटी टोलियाँ बनाई7 एक टोली राजपुर होती, दूसरी दमरान तो तीसरी कर्मनाशा पर बने रेल कारखाने धूल में मिला देती7अमर सिंह के साथ रण का खेल खेलते हुए ल्यूगार्ड और उसकी विशाल सेना की हड्डियां नरम पड़ गयी और वह अंग्रेज सेनापति इस्तीफा देकर इंग्लैंड चला गया और उसके थकी हुई सेना आराम करने छावनी में चली गई7जगदीशपुर में स्वतंत्रता का झंडा हरदिन की सूर्यकिरण में फहराता ही रहा7ब्रिगेडियरडगलस जैसा अंग्रेज सेनानी और सातहजार अंग्रेजी सेना उस छोटे से राजा पर दांत भींचकर टूटते रहे, उसका सिर काटने या उसकी योजना भंग करने को अनेक देशद्रोही भी उसकी सेना में धन का लालच देकर भेजे गये7 जंगल में नए रास्ते बनाए गए, नाके-नाके पर अंग्रेजी सेना की पक्की कतार बाँधी गई7 परन्तु कुछ भी करें, जगदीशपुर का राजा परेशान नहीं हुआ 7 बिहार प्रदेश के स्वतंत्रता समर कीबहार उजड़ गई, फिर भी राजा अमर सिंह शत्रु के हाथ नहीं लगा7
बानापुर का राजा मर्दान सिंह: यह प्रहलाद सिंह के पुत्र थे7 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय इनकी कर्मभूमिबानापुर से तालबेहट तथा चंदेरी राज्य सीमा तक रही थी7 देश की आजादी के लिए उस समय क्रोध से उन्मत थे7(पृष्ठ:361)
शाहगढ़ का राजा शूर ठाकुर, बुंदेलखंड के सरदार,सभी रानी लक्ष्मीबाई के साथ युद्ध के लिए देश की आजादी के लिए अड़े उनके अनुयायी, ये सभी प्रतिशोध की अग्नि में धधक रहे थे, 1857 की लड़ाई में7 इन सबका का कहना था की जो जन्म पाता है वह अवश्य मरता है, तो फिर व्यर्थ में कीर्ति को क्यों कलंकित किया जाए?(पृष्ठ:361)
हनुमान नामक शूर ब्राह्मण नेता ने एक दिन का भी विश्राम न लेकर अंग्रेजों पर हमला किया7प्रात: दस बजे से संध्या तक यह शूर पुरुष रण के आँगन में लड़ता रहा7पर अंत में