बदलाव मनुष्य जीवन के विभिन्न रंग
   Date10-May-2022

dharmdhara
धर्मधारा
म नोविज्ञान कहता है कि हम नकारात्मकता की ओर तेजी से बढ़ते हैं। अच्छे विचारों की तुलना में बुरे विचार तेजी से फैलते हैं और यही कारण है कि हम सुख को भूल जाते हैं और दु:ख को देर तक पकड़े रहते हैं। इससे हमारे दिमाग में कड़वी यादें इतनी सघन हो जाती हैं कि हम बार-बार घूम-फिरकर उसी में उलझे रहते हैं। किसी भी एक अच्छे विचार को अपने मस्तिष्क में बैठाने के लिए हमें तकरीबन पांच बुरे विचारों को हटाना पड़ता है। अच्छे विचारों को बार-बार दोहराना पड़ता है, तब जाकर किसी एक अच्छे विचार की दिमाग में जगह बन पाती है। 'आर वी हार्डवायर्ड टु बी पॉजिटिव ऑर नेगेटिवÓ लेख में रे विलियम्स लिखते हैं- बड़ी बारीकी से हम मन की नकारात्मकता दूर करते चले जाते हैं और अच्छे पलों में भी बुरी या बेकार की बातें सोचते रहते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि जीवन इतना जटिल क्यों है। हर दिन सूरज उगता और ढलता है, फिर भी हर दिन यह दृश्य अलग होता है। प्रकृति तो रंगों का खजाना है। वह सहज ही हर दिन अनेक रंग बदलती है और नित-नवीन रूप में उभरकर आती है। यदि हमारे जीवन में हालात मुश्किल हों तो भी यह तय है कि वे एक से नहीं रहेंगे। दु:ख-दर्द व सुख का कोई रंग स्थायी नहीं होता, उसका बदलना तय है। इसलिए यदि विपरीत हालातों में हमें कुछ नहीं सूझ रहा, हम कुछ नहीं कर पा रहे तो हमारे पास जो भी है, उसे सहेजते हुए हमें सही रोशनी का इंतजार करना चाहिए और अनुकूल रंगों को खुद से जुड़ते हुए देखना चाहिए। जिंदगी में अपनी परिस्थितियों से बचने और डरने से कुछ हासिल नहीं होता; क्योंकि हमें अपने जीवन के वास्तविक रंगों को जीना सीखना होता है। जबरदस्ती ओढ़े हुए रंग देर तक नहीं टिकते। डरा-धमकाकर या झांसे में रखकर दूसरों को चढ़ाए रंग भी समय आने पर उतर ही जाते हैं। ऐसे रंग खिलते नहीं, बल्कि बदरंग हो जाते हैं। इसलिए यदि हम अपने जीवन के रंगों को दूसरों के जीवन में उतारना चाहते हैं, तो हमें दूसरों के रंगों को स्वीकारना भी आना चाहिए। यदि हम अपने जीवन के रंगों को उन्मुक्त भाव से जीना चाहते हैं तो हमें दूसरों के जीवन के रंगों को भी उन्हें प्रसन्न भाव से जीने के लिए स्वतंत्रता देनी चाहिए।